The Lallantop
Advertisement
  • Home
  • Lallankhas
  • 16 female infants found left orphaned, found battling for life in rajasthan

उन बच्चियों के नाम, जो कचरे में फेंकी गईं, 'पराई' बताकर ब्याही गईं

लोग हजार कारण ढूंढ सकते हैं बेटियों को मारने के. लेकिन न मारने का एक ही कारण है, बेटियां भी इंसान होती हैं.

Advertisement
Img The Lallantop
Symbolic image Source- Reuters
pic
प्रतीक्षा पीपी
15 जून 2016 (अपडेटेड: 15 जून 2016, 01:20 PM IST)
font-size
Small
Medium
Large
font-size
Small
Medium
Large
whatsapp share
पिछले एक महीने में राजस्थान के जयपुर, उदयपुर, सवाई माधोपुर, कोटा, श्रीगंगानगर, सीकर और धौलपुर में 16 बच्चियां पैदा होने के बाद फेंक दी गईं है. कहीं रेलवे ट्रैक पर, कहीं पूजा की टोकरी में, कहीं सड़क के किनारे.
Image embed
ये वो बच्चियां हैं, जो फेंकने के बावजूद बच गई हैं. अक्सर ऐसी बच्चियां मर जाया करती हैं.
इंडिया टुडे की 5 साल पुरानी एक गैरसरकारी रिपोर्ट के मुताबिक राजस्थान में हर दिन 2500 बच्चियां मारी जाती हैं. इसमें नवजात और भ्रूण हत्याएं शामिल हैं.
अस्पतालों में आए दिन लावारिस बच्चियों को पहुंचाया जाता है. डॉक्टर कहते हैं, 10 में से दो बच्चियां तो ऐसी हालत में आती हैं, कि उन्हें बचाया ही नहीं जा सकता है. जब ये बच्चियां ठीक हो जाती हैं, इन्हें अनाथालयों में भेज दिया जाता है. अनाथलयों में ये किस तरह बड़ी होती हैं, इनका कैसा ख़याल रखा जाता है, मालूम नहीं. राजस्थान महिला आयोग का कहना है कि सरकार ने गर्भ में भ्रूण जांच को रोकने का जो अभियान चलाया है, उसी वजह से लड़कियों के सड़कों पर फेंकने की घटनाएं बढ़ी हैं. लोग गर्भ में लिंग का पता नही लग पाने की वजह से बच्चे तो पैदा कर रहे हैं. लेकिन जब पता चलता है कि वो लड़की है, तो सड़क पर फेंक देते हैं.
दिल्ली जैसे शहरों में हम औरतों को मनचाहे कपड़े पहनने, अपनी मर्ज़ी से शादी करने और मनमर्जी से बाहर घूमने के लिए लड़ाई करते हैं. आप छोटे शहरों की तरफ जाएं तो लड़कियां अपनी पढ़ाई पूरी करने के लिए तरसती हैं. लेकिन गांवों में तो मानो एक पैरेलल दुनिया है. जिसमें लड़कियां अपने होने, अपने शारीरिक अस्तित्व और सामाजिक पहचान के लिए तरसती हैं.
उस उम्र में, जब बच्चा, बच्चा ही होता है, वो न औरत होता है, न पुरुष. उसे मां के शरीर की गर्माहट और उसका दूध चाहिए होता है. ऐसी उम्र में बड़ी क्रूरता से लड़कियों की पहचान कर उन्हें मार डालना, ये अमानवीय है. हम वही लोग हैं, जो अखबारों में प्राकृतिक आपदाओं और मरे हुए लोगों के बारे में पढ़कर दुखी होते हैं. उन बॉलीवुड फिल्मों को सुपरहिट बनाते हैं, जिनमें लड़कियां मनमर्जी से जीती हैं, भाग के शादी करती हैं. फिर एक समाज के तौर पर हम इतने सालों में लड़कियों को क्यों नहीं अपना पाए हैं?
Image embed
लोग हजार कारण ढूंढ सकते हैं बेटियों को मारने के. लेकिन न मारने का एक ही कारण है. जो हर दूसरे कारण को मात देता है. वो ये, कि बेटियां भी इंसान होती हैं. उन्हें उसी तरह बड़ा करिए, जैसे अपने बेटों को करते हैं. और आप पाएंगे कि दोनों में कोई फर्क नहीं होता.
बच्चियों की हत्याओं और इन्हें इस तरह लावारिस छोड़ने को कैसे रोका जाए, ये एक कॉम्प्लेक्स सवाल है. अगर लड़कियों की जांच भ्रूण में ही हो जाती है, तो उन्हें गर्भ में ही मार दिया जाता है. अगर पैदा हो जाएं, तो पैदा होने के बाद मार दिया जाता है. और अगर तब भी न मारा जाए, तो लावारिस छोड़ दिया जाता है, जिससे वो खुद ही मर जाएं.
डॉक्टर कहते हैं कि लावारिस मिलने वाले बच्चों की संख्या कम होती नहीं दिखती. साल 2015 में राजस्थान में करीब 18 बच्चियां लावारिस मिली थी. और साल 2016 में 6 महीने के अंदर ही लावारिस मिलने वाली बच्चियों की संख्या 16 पहुंच गई है. जयपुर के जे.के. लोन अस्पताल में हर हफ्ते एक से दो लावारिस बच्चे आते हैं. जिसमें 90 फीसदी बच्चियां होती हैं. डॉक्टर्स कहते हैं कि अस्पताल में आने वाले केसेज में बच्चियों की हालत इतनी खराब होती है कि जिंदा रखने के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ती है.
Image embed

कागज़ बताते हैं कि सरकार कोशिश करती है. राजस्थान सरकार ने पिछले पांच सालों में अब तक 60 डाक्टरों के लाईसेंस कैंसल किए हैं. 150 से ज्यादा सोनोग्राफी सेंटरों पर कार्रवाई हुई है. अस्पतालों से बच्चियों के रिकॉर्ड रखने को कहा गया है. फिलहाल पूरे राजस्थान में 150 पालना-गृह के मुकाबले हर जिले में 700 पालना-गृह बनाने का प्लान है. इस तरह की नर्सरी और अनाथालय खुल जाने से शायद लोग बेटियों को फेंकना बंद कर, यहां छोड़ना शुरू कर दें. लेकिन उस मानसिकता का क्या, जो इन्हें बच्चियों को छोड़ने पर मजबूर करती है?

Advertisement

Advertisement

()