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पिता की मौत के बाद प्रियंका ने राहुल से क्या कहा?

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साल 1999. लोकसभा चुनाव का प्रचार अपने शबाब पर था. गांधी-नेहरू परिवार से जुड़ी रायबरेली सीट पर कांग्रेस ने कैप्टन सतीश शर्मा को मैदान में उतारा था. उनके सामने एक और दावेदार था जो नेहरु परिवार से ही आता था और विरोधी खेमे से खड़ा था. नाम अरुण नेहरु. राजीव के रिश्ते में भाई अरुण नेहरु. राजीव गांधी के खिलाफ वीपी सिंह के साथ मिलकर बगावत बुनने वाले अरुण नेहरु. रायबरेली की एक छोटी सी जनसभा में 27 साल की एक लड़की भाषण देने के लिए खड़ी होती है.पहला चुनावी भाषण. सूती साड़ी, बॉबकट बाल, तीखा नाक. लड़की बोलना शुरू करती है-

“यह इंदिरा जी की कर्मभूमि है. भारत की उस बेटी की कर्मभूमि है जिस पर मुझे सबसे ज्यादा गर्व है. वो सिर्फ मेरी दादी नहीं थीं. भारत की करोड़ो जनता की मां समान थीं. वो उस परिवार की सदस्य थीं जिसने आपको काम करके दिखया, जिसने आपको विकास करके दिखाया, जिसके दिल में आपके लिए दर्द था और हमेशा रहेगा. आपने एक ऐसे शख्स को अपने क्षेत्र में आने कैसे दिया? जिसने मेरे परिवार के साथ हमेशा गद्दारी की. जिसने मेरे पिताजी के मंत्रिमंडल में रहते हुए उनके खिलाफ साजिश की. जिसने कांग्रेस में रहते हुए सांप्रदायिक शक्तियों के साथ हाथ मिलाया. जिसने अपने भाई की पीठ में छुरी मारी है, वो कभी आपके लिए निष्ठा के साथ काम नहीं कर सकता. उसको पहचानिए. उसका जवाब दीजिए. मैं मांगती हूं आपसे यह जवाब.”

भाषण खत्म करते-करते लड़की सबके जेहन में छा जाती है. लड़की का नाम था प्रियंका गांधी. लेकिन लोग उसमें इंदिरा गांधी की छवि तलाशना शुरू कर चुके थे. रायबरेली में दिए गए प्रियंका के भाषण के कंटेंट से ज्यादा महत्वपूर्ण था उनका तेवर. वही तेवर जो नेहरु से इंदिरा को मिला था. अपने पिता के साथ कई दफा अमेठी का दौरा कर चुकी थीं. उनके बॉबकट बालों में लोग उनमें और राहुल में फर्क नहीं कर पाते थे. ऐसे में लोग उन्हें भी राहुल की तरह भैया कह कर बुलाया करते थे. बाद में यह नाम ‘भैया जी’ बन गया. इस भाषण के बाद वो अमेठी और रायबरेली के लोगों के लिए इंदिरा का दूसरा रूप बन गईं.

1999 में रायबरेली में प्रियंका भाषण दे रही थीं और लोग उनमें इंदिरा गांधी की छवि देख रहे थे.

अरुण नेहरु के खिलाफ कांग्रेस ने कैप्टन सतीश शर्मा को मैदान में उतारा था. सतीश शर्मा गांधी परिवार के करीबी आदमी थे. 1991 में राजीव गांधी की हत्या के बाद गांधी परिवार के प्रतिनिधि के तौर पर वो अमेठी लोकसभा का चुनाव लड़े थे. सोनिया गांधी पूरे देश में कांग्रेस का प्रचार कर रही थीं और अपनी इटलीछाप हिंदी की वजह से विरोधियों के निशाने पर थीं. उनकी बेटी प्रियंका महज 27 साल की उम्र में अमेठी और रायबरेली में कांग्रेस का चुनाव प्रचार देख रही थीं. प्रियंका ने अपने पिता और दादी को इस इलाके में चुनाव प्रचार करते हुए देखा था. उन्ही के तर्ज पर वो छोटी-छोटी जनसभाएं कर रही थीं. एक दिन में 15 से 19 सभाएं. इस मुकाबले में अरुण नेहरु को बुरी हार का सामना करना पड़ा. वो चौथे स्थान पर रहे. सतीश शर्मा बड़े आराम से चुनाव जीत गए. कहते हैं कि रायबरेली का भाषण प्रियंका गांधी का राजनीति में डेब्यू था. लेकिन सियासत के साथ उनकी पहली सीधी मुठभेड़ तो 1991 से हो गई थी.

मैं संभाल लूंगी

1991 में राजीव गांधी की मौत के बाद 10 जनपथ किसी किले में तब्दील कर दिया गया था. घर के किसी सदस्य को घर से बाहर जाने की इजाजत नहीं थी. मिलने वालों का तांता लगा हुआ था. राजीव गांधी ने हमेशा घर और दफ्तर के बीच एक दूरी बनाकर रखी थी. सोनिया गांधी 1984 के चुनाव में राजीव के साथ प्रचार के लिए अमेठी गई जरुर थीं लेकिन राजनीति से उनका दूर-दूर तक कोई नाता नहीं था. राजीव के रहने के दौरान उनकी ज्यादातर दोपहर नेशनल गैलरी ऑफ आर्ट में बीता करती थीं. सोनिया को पेटिंग में बड़ी दिलचस्पी थी. वो वहां अपनी दोस्त रुपिका के साथ फीकी पड़ रही ऑइल पेंटिंग्स में नए सिरे रंग भरा करती थीं. राजीव के जाने के बाद उनकी जिंदगी तेजी से बदल गई थी. उनके दरवाजे पर कांग्रेस कार्यकर्ताओं का तांता लगा हुआ था. इसके अलावा दुनिया के कोने-कोने से सांत्वना भरे खत आ रहे थे. सोनिया अनजान सूरतों से घिरी खड़ी थीं. भीतर से बुरी तरह टूटी हुई सोनिया. उन्हें इस हाल में सबसे ज्यादा सहारा दिया उनकी बेटी प्रियंका ने.

राजीव गांधी को आखिरी विदाई देते राहुल, सोनिया और प्रियंका.
राजीव गांधी को आखिरी विदाई देते राहुल, सोनिया और प्रियंका.

पिता की मौत ने प्रियंका के लिए सबकुछ बदल कर रख दिया. वो अखबारों में अपने पिता के बारे में छप रही एक-एक लाइन का नोट लिया करती. अमेठी से आने वाले लोगों से मिलती. अमेठी उनके लिए दूसरा घर का था. अपने पिता के साथ वो कई बार अमेठी गई थीं. वहां की कई औरतों और बच्चों को वो नाम से जानती थीं. वो अपनी मां के साथ तमाम राजनेताओं से मिलती. संवेदना से भरे खतों का जवाब लिखतीं. राहुल उस वक़्त हार्वड में पढाई कर रहे थे. पिता की मौत के बाद यह तय नहीं हो पा रहा था कि वो आगे की पढ़ाई के लिए फिर से हावर्ड लौटेंगे भी कि नहीं. प्रियंका ने उस समय जोर देकर कहा कि राहुल को पढ़ाई जारी रखनी चाहिए. उन्होंने जोर देकर कहा, “मां को मैं संभाल लूंगी.”

7 साल के भीतर गांधी परिवार के दो लोगों की हत्या हो चुकी थी. यही वो दौर था जब प्रियंका गांधी ने राजनीति में कदम ना रखने का फैसला लिया. बाद के एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा, “16-17 की उम्र में मुझे यह लगता था कि मुझे जिंदगी में राजनीति ही करनी है. लेकिन जिंदगी में इतना कुछ देखने के बाद मैंने यह तय किया कि मैं राजनीति में नहीं जाउंगी. 1999 के लोकसभा चुनाव में यह सवाल जरुर आया था कि मुझे चुनाव लड़ना चाहिए. लेकिन मैंने तय किया कि मैं राजनीति में नहीं आउंगी.”

जेल में बुनी गई साड़ी

जुलाई 1995. दिल्ली का आईटीसी मौर्या होटल. जाने-माने फैशन डिजाइनर अश्विन सोनी का फैशन शो चल रहा था. मीडिया को इस शो को कवर करने की इजाजत नहीं दी गई थी. जगदीश यादव उस समय अंग्रेजी अखबार दी टेलीग्राफ के लिए काम किया करते थे. वो अश्विनी सोनी के लिए फोटोग्राफी का काम भी किया करते थे. उन्होंने अश्विनी से कहा कि वो उनके लिए फैशन शो की फोटोग्राफी कर देंगे. जब जगदीश यादव फैशन शो में पहुंचे तो उन्हें समझ में आ गया कि क्यों इस कार्यक्रम में मीडिया को आने से रोका गया था. दर्शक दीर्घा में एक लंबी छरहरी लड़की काले सिंगलपीस लिबास में बैठी हुई थी. उनसे साथ उसके तीन दोस्त और थे. आयोजक इन चार नौजवाओं को खास तवज्जो दे रहे थे. यादव ने इन नौजवाओं के बारे में पूछताछ की. पता लगा कि काले लिबास वाली लड़की पूर्व प्रधानमन्त्री राजीव गांधी की बेटी प्रियंका गांधी हैं.

सिल्क की यह साड़ी गांधी परिवार की विरासत की पहचाना है
सिल्क की यह साड़ी गांधी परिवार की विरासत की पहचान है

“जैसे ही मैं अंदर घुसा मेरी नजर प्रियंका गांधी पर पड़ी मुझे सारा माजरा समझ में आ गया. मैंने अपना कैमरा तुरंत बैग के अंदर रख लिया. थोड़ी ही देर में फैशन शो शुरू हुआ. मेरे लिए यह सही मौका था. मैंने दोनों की नजर बचाकर उनकी तस्वीर उतार ली. वहां से मैं सीधा टेलीग्राफ के दफ्तर पहुंचा. तब तक रात हो चुकी थी. अगले दिन इतवार था. इसलिए इस फोटो को दो दिन रोककर छापा गया. सोमवार को दोनों की तस्वीर फ्रंट पेज पर छपी. इसका शीर्षक था, ‘Priyanka Gandhi with friend.’ तब तक किसी को रॉबर्ट वाड्रा के बारे में कुछ भी पता नहीं था. इसके दो दिन बाद टाइम्स ऑफ इंडिया ने फ्रंट पेज पर स्टोरी छापी, ‘Who is the boy.’ यह पहला मौका था जब लोगों ने रॉबर्ट वाड्रा के बारे में सुना.”

तो प्रियंका गांधी और और रॉबर्ट वाड्रा की प्रेम कहानी की शुरुआत कहां से हुई? इसका जवाब है स्कूल से. राजीव और संजय गांधी की स्कूली पढ़ाई प्रतिष्ठित दून स्कूल से हुई थी. राजीव प्रियंका को भी वहीं भेजना चाहते थे. काफी फुसलाने के बाद भी प्रियंका इसके लिए तैयार नहीं हुईं. जब भी राजीव उनसे बोर्डिंग स्कूल जाने के लिए कहते, उनका जवाब होता कि मेरे जाने के बाद मेरे पपी का ख्याल कौन रखेगा. आखिरकार उन्हें दिल्ली के चाणक्यपुरी स्थित ब्रिटिश स्कूल में दाखिल दिलवा दिया गया. रॉबर्ट वाड्रा और उनकी बहन मिशेल भी इसी स्कूल में पढ़ते थे. मिशेल प्रियंका की क्लास्स्मेट और अच्छी दोस्त हुआ करती थीं. उन्ही के जरिए रॉबर्ट प्रियंका से मिले. इस समय प्रियंका की उम्र महज 13 साल थी. देखते ही देखते दोनों दोस्त हो गए.

रॉबर्ट वाड्रा और प्रियंका के बीच दोस्ती का रिश्ता प्यार में कैसे बदला? एक इंटरव्यू में रॉबर्ट इसका जवाब देते हैं, “घुटनों के बल बैठकर शादी का प्रस्ताव देने जैसा कुछ नहीं था. हमने बैठकर इस बारे में बातचीत की. इसके बाद हम दोनों ने एक-दूसरे के घरवालों से बात की. सब ओके हो गया.”

रॉबर्ट ने एक इंटरव्यू में कहा था कि प्रियंका की सादगी की वजह से वो उनकी तरह खिंचते चले गए.

18 फरवरी 1997. 10 जनपथ के लिविंग हॉल में प्रियंका गांधी और रॉबर्ट वाड्रा दूल्हा-दुल्हन बने खड़े थे. उनके बाएं तरफ लाल रंग की साड़ी में सोनिया गांधी और राजीव गांधी की तस्वीर मौजूद थी. दाहिने तरफ गुलाबी रंग का साफा लगाए राहुल गांधी खड़े थे. प्रियंका ने सुनहरी-गुलाबी रंग की साड़ी पहनी हुई थी. इस साड़ी को पहनने वाली वो अपने खानदान की तीसरी पीढ़ी थीं. 26 मार्च 1942 के रोज जब इंदिरा और फ़िरोज़ की शादी हुई थी, नेहरू जेल में थे. देश के बड़े कांग्रेसी नेता की बेटी का किसी और धर्म के लड़के के साथ विवाह करना हंगामाखेज खबर थी. नेहरु भी इस शादी के लिए तैयार नहीं थे. आखिरकार महात्मा गांधी के हस्तक्षेप के बाद वो इस शादी के लिए तैयार हुए. उन्होंने जेल से इंदिरा के लिए सुनहरी-गुलाबी साड़ी बुनकर भेजी. इसी साड़ी में इंदिरा ने फ़िरोज़ से शादी की. राजीव और सोनिया की शादी के वक़्त इंदिरा ने यह साड़ी सोनिया को पहनाई. अब यही साड़ी प्रियंका गांधी पहनकर खड़ी थीं.

दूसरी इंदिरा

1999 का लोकसभा चुनाव. सोनिया गांधी कर्नाटक की बेल्लारी और उत्तर प्रदेश की अमेठी सीट से एकसाथ चुनाव लड़ रही थीं. अमेठी गांधी परिवार की परम्परागत सीट थी. इसलिए सोनिया ने अपना पूरा ध्यान बेल्लारी सीट पर लगा रखा था. बीजेपी उन्हें यहां से कड़ी चुनौती दे रही थी. बीजेपी ने सोनिया का मुकाबला करने के लिए सुषमा स्वराज को मैदान में उतारा था. एनडीटीवी की पत्रकार नुपुर बासु यह चुनाव कवर कर रही थीं. प्रियंका गांधी अपनी मां के पक्ष में प्रचार करने के लिए बेल्लारी आई हुई थीं. बेल्लारी पहुंचने के साथ ही वो एक खुली जीप में सवार होलर बेल्लारी की सड़को पर निकल गईं. उन्होंने पीली कांजीवरम साड़ी पहन रखी थी. 300 पत्रकार और सड़क के किनारे खड़े हजारों लोग उनकी एक झलक पाने के लिए कई घंटों से इंतजार कर रहे थे. नुपुर ने भीड़ में खड़ी एक बूढी महिला से पूछा कि बेल्लारी में कौन आया है? उस बूढी महिला का जवाब था, ‘इंदिरा अम्मा’.

प्रियंका के साथ सोनिया श्रीपेरंबदूर में. यहीं पर राजीव गांधी की हत्या हुई थी.
प्रियंका के साथ सोनिया श्रीपेरंबदूर में. यहीं पर राजीव गांधी की हत्या हुई थी.

प्रियंका गांधी की तुलना अक्सर इंदिरा गांधी से की जाती है. इसकी बड़ी वजह उनके नैन-नक्श और उनका पहनावा है. बचपन में इंदिरा का प्रियंका पर गहरा प्रभाव रहा. एक इंटरव्यू में प्रियंका स्वीकार करती हैं, “बचपन में मेरे पर मेरी दादी का गहरा प्रभाव रहा. वो बहुत ताकतवर महिला थीं. हमारे घर की मुखिया थीं. मैं भी उनकी तरह बनना चाहती थी. इसी वजह से लंबे समय तक मैं मेरी पहचान को लेकर उलझन में भी रही.” इंदिरा गांधी से उनकी तुलना स्वाभाविक ही थी. 1999 के लोकसभा चुनाव में अरुण नेहरु के खिलाफ दिया गया उनका भाषण तुलना की दूसरी कसौटी बना. लेकिन क्या सिर्फ हाव-भाव और भाषण शैली की वजह से उन्हें दूसरी इंदिरा कहा जा सकता है? इसका जवाब जानने के लिए आपको दो घटनाओं पर गौर करना होगा.

पहली घटना दिल्ली के संसद की है. 1969 में प्रसिद्द फोटोग्राफर रघु राय को इंदिरा गांधी के जीवन के एक दिन को कैमरे में कैद करने का मौक़ा मिला. वो इंदिरा के साथ उनके संसद स्थित दफ्तर गए. वहां इंदिरा से मिलने के लिए गुजरात के विधायकों का एक दल आया हुआ था. इन विधायकों ने इंदिरा गांधी को एक ज्ञापन सौंप दिया. रघु ने यह तस्वीर इंदिरा गांधी के कंधों के ऊपर से ली थी. बीबीसी को दिए एक इंटरव्यू में रघु याद करते हैं-

“मेरा सबसे पहले ध्यान गया उन सबके चेहरे पर आए उत्कंठा और इंतज़ार के भाव पर. ये बताता था कि कितनी शक्तिशाली थीं इंदिरा गांधी. एक भी शख़्स ने इंदिरा गाँधी से एक शब्द भी नहीं कहा कि आप ये कर दीजिए, वो कर दीजिए. वो सिर्फ़ इंतज़ार करते रहे उनके फ़ैसले का.”

दिसंबर 2018 में हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को राजस्थान, मध्य प्रदेश और छतीसगढ़ में जीत हासिल हुई. तीनों राज्यों में कांग्रेस मुख्यमंत्री का चुनाव कांग्रेस आलाकमान के लिए सिरदर्दी का सबब बन गया था. सबसे ज्यादा दिक्कत आ रही थी राजस्थान के मुख्यमंत्री के चुनाव में. मुख्यमंत्री की शपथ लेने जा रहे अशोक गहलोत को दो दफा एयरपोर्ट से बुला लिया गया. सचिन पायलट जिद्द पालकर बैठे हुए थे. आखिरकार प्रियंका गांधी ने पूरे मामले को अपने हाथ में लिया. कांग्रेस के अंदरूनी सूत्र बताते हैं कि सचिन पायलट ने मुख्यमंत्री ना बनाए जाने की सूरत में इस्तीफ़ा देने की धमकी दी थी. प्रियंका गांधी पहले उन्हें समझाने की कोशिश की. लेकिन जब पायलट अड़े रहे थे वो प्रियंका ने उन्हें पार्टी छोड़कर जाने के लिए कह दिया. इसके बाद पायलट ने अपने पांव पीछे खींच लिए.

इंदिरा गांधी के फैसले का इंतजार करता गुजरात का विधायक दल. (फोटो: रघु राय)
इंदिरा गांधी के फैसले का इंतजार करता गुजरात का विधायक दल. (फोटो: रघु राय)

राजनीति में एंट्री

‘प्रियंका गांधी सोनिया का तुरुप का पत्ता है.’ 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले रायबरेली के नेता ने फोन पर कहा. वो बता रहे थे कि कैसे प्रियंका गांधी अमेठी और रायबरेली में प्रियंका गांधी के चुनावी मैनेजमेंट पर जानकारी दे रहे थे. यह दोनों सीटें परम्परागत तौर पर गांधी परिवार से जुड़ी रही हैं. 2014 के चुनाव में उत्तर प्रदेश में यही दो सीट थीं जो कांग्रेस के खाते में गई थीं.

अगस्त 2014. लोकससभा चुनाव के नतीजे आ चुके थे. कांग्रेस ने अपने साढ़े पांच दशक के संसदीय इतिहास में सबसे कमजोर स्थिति में थी. 543 में से महज 44 सीटें. अगस्त 2014 में इलाहाबाद के सिविल लाइंस के नेताजी सुभाष चंद्र बोस चौराहे पर नुमाया हुआ. इस पोस्टर का मजमून था, “जनता का संदेश सुनो, ग्राउंड जीरो से शुरुआत करो. कांग्रेस एक इंकलाब का रथ. मइया दो आदेश. प्रियंका बढ़ाये कांग्रेस का कद. यू.पी. में अग्निपथ…अग्निपथ…अग्निपथ. आ जाओ प्रियंका. छा जाओ प्रियंका.” इस पोस्टर को लगवाने वाले थे दो स्थानीय कांग्रेस नेता हसीब अहमद और श्रीश दूबे. प्रियंका गांधी ने 23 जनवरी 2019 के रोज अधिकारिक तौर पर कांग्रेस पार्टी ज्वाइन कर ली. उन्हें आल इंडिया कांग्रेस कमिटी का महासचिव बनाया गया है. खुद को साबित करने के लिए उन्होंने पूर्वी उत्तर प्रदेश जैसा कठिन मैदान चुना है.

रायबरेली में प्रचार करती प्रियंका गांधी
रायबरेली में प्रचार करती प्रियंका गांधी

प्रियंका गांधी कांग्रेस में हैं. अब सवाल यह है कि उनकी कांग्रेस में आने की मांग कितनी पुरानी है? कई लोग माखनलाल फोतेदार की किताब ‘चिनार लीव्स’ को उनके राजनीति में आने की मांग का प्रस्थान बिंदु बता रहे हैं. फोतेदार कश्मीर में इंदिरा के नाक-कान हुआ करते थे. उन्होंने अपनी किताब में लिखा कि इंदिरा ने अपनी मौत के कुछ समय पहले ही उनके सामने प्रियंका को राजनीति में लाने की इच्छा प्रगट की थी. उस समय प्रियंका की उम्र महज 12 साल हुआ करती थी. प्रियंका ने एनडीटीवी को दिए एक इंटरव्यू में कबूला था कि 1999 में उनके सामने यह सवाल था कि वो चुनाव लड़े या नहीं. उन्होंने उस समय सक्रिय राजनीति में ना आने का फैसला किया था. प्रियंका भले ही चुनाव ना जीती हों लेकिन क्या वो राजनीति से बाहर थीं भी? सवाल का जवाब है नहीं.

याद कीजिए 2017 का उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव. समाजवादी पार्टी के कई नेता प्रेस के सामने कांग्रेस के साथ किसी भी किस्म के गठबंधन की बात को अस्वीकार कर चुके थे. जानकार बताते हैं कि सीटों के बंटवारे को लेकर दोनों पार्टी में सहमति नहीं बन पा रही थी. आखिरकार प्रियंका ने हस्तक्षेप किया. उन्होंने अखिलेश यादव से स्काइप पर लंबी वीडियो चैटिंग की. उत्तर प्रदेश में कांग्रेस-सपा में गठबंधन के लिए कांग्रेस के कई नेता प्रियंका गांधी को श्रेय देते देखे गए थे.

दिल्ली में एक पता है, 5 गुरुद्वारा रकाबगंज रोड. पत्रकार बिरादरी में ‘कांग्रेस वॉर रूम’ के तौर पर जाना जाता है. पिछले डेढ़ दशक से प्रियंका गांधी की इस पते पर नियमित आवाजाही रही है. वो कांग्रेस की चुनावी रणनीति तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती आई हैं. 2014 के लोकसभा चुनाव से ठीक पहले अर्नब गोस्वामी ने राहुल गांधी का लम्बा इंटरव्यू लिया था. पत्रकारों की चक्कलस में यह बात अक्सर सुनी जाती है कि इस इंटरव्यू में प्रियंका अपने भाई को सवालों के जवाब फ्रेम करने में मदद कर रही थीं.

प्रियंका ने 2017 के लोकसभा चुनाव में रायबरेली और अमेठी में कांग्रेस के प्रचार की कमान संभाल रखी थी. दोनों जिलों में कुल मिलाकर 10 विधानसभा सीट हैं. इसमें से 6 पर बीजेपी को जीत हसिल हुई थी. जबकि कांग्रेस और समाजवादी पार्टी को 2-2 सीटें हासिल हुई. ये आंकड़े प्रियंका के चमत्कारी व्यक्तित्व की उलटबासी हैं. यह बात सच है कि कांग्रेस कार्यकर्त्ता और कई आम लोग उनमें इंदिरा की छवि देखते हैं. लेकिन उनके लिए यह राह आसान नहीं है. खास तौर पर तब, जब कांग्रेस अपने इतिहास में सबसे कमजोर स्थिति में है. लोकप्रियता के मामले में उन्हें इंदिरा गांधी के स्तर को छूने के लिए लंबा संघर्ष करना पड़ेगा.

जाते-जाते एक बात और. 1999 के लोकसभा चुनाव में अरुण नेहरु को बुरी तरह हार का सामना करना पड़ा. वो चौथे नंबर कर रहे. सतीश शर्मा बड़े आराम से यह चुनाव जीत गए. एक उलटबासी यह है भी है कि जिन अरुण नेहरु को प्रियंका गांधी ने रायबरेली की सड़कों पर गांधी परिवार का गद्दार कहा था, जुलाई 2013 में उनकी मौत के बाद प्रियंका के बेटे रेहान ने ही उन्हें मुखाग्नि दी. सियासत इसी का नाम है.


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