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सिरफुटव्वल की वो कहानी, जिसके बाद भारतीय जनता पार्टी बनाने की नौबत आई

तारीख- 6 अप्रैल 1980. स्थान- दिल्ली का फिरोजशाह कोटला मैदान. लेकिन उस दिन यहां कोई क्रिकेट मैच नहीं हो रहा था. कुछ नेता इकठ्ठा हुए थे. ये 2 दिन पहले ही अपनी पार्टी से निकाले गए थे. ये नेता अपनी नई पार्टी खड़ी करने के इरादे से इकठ्ठा हुए थे. इस मीटिंग में पहुंचने वालों में 2 बड़े वकील थे, एक ‘महारानी’ थीं, जनता पार्टी की सरकार में मंत्री रहे 4 बड़े नेता थे. और साथ में था कार्यकर्ताओं का हुजूम. परदे के पीछे से इस मीटिंग को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) का भी आशीर्वाद प्राप्त था. बैठक शुरू हुई तो इस नवगठित पार्टी के अध्यक्ष ने नया राग अलाप दिया. ‘गांधीवादी समाजवाद’ का राग. यह राग RSS की स्थापित सोच से एकदम अलग था. लेकिन सब चुप रहे, क्योंकि इस ये मुद्दा उठाने वाले नेता का कद बहुत बड़ा था. वो नेता जो उस पार्टी का पोस्टर ब्वाय था. इसी चेहरे को, के.एन. गोविंदाचार्य के शब्दों में कहें तो मुखौटे, को आगे रखकर अगले ढाई दशक तक सियासत की जानी थी.

ये चेहरा कौन था, ये जानने के लिए थोड़ा सब्र रखें. लेकिन इतना तो जान ही गए होंगे कि हम बात कर रहे हैं भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की. भाजपा, जिसने 6 अप्रैल 2021 को अपने 41 साल पूरे कर लिए हैं. इन 41 बरसों में इस पार्टी ने लोकसभा में 2 सीटों से शुरू करके 303 तक पहुंचने का सफर तय किया है. इस पार्टी की नर्सरी से अब तक 1 राष्ट्रपति, 2 उपराष्ट्रपति, 2 प्रधानमंत्री और 3 नेता प्रतिपक्ष निकल चुके हैं. लेकिन आज हम सबसे पहले चर्चा करेंगे उन परिस्थितियों की, जिसके कारण भारतीय जनता पार्टी बनाने की नौबत आई थी.

राजनारायण-शांता कुमार विवाद से शुरुआत हुई

बात 1978 की है. केन्द्र में जनता पार्टी की सरकार थी. जनता पार्टी मतलब सोशलिस्ट, जनसंघ, स्वतंत्र पार्टी और पुराने कांग्रेसियों का एक मिला-जुला स्वरूप. इस पार्टी की ओर से मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री थे. उनकी सरकार और पार्टी में सभी घटकों को प्रतिनिधित्व मिला हुआ था. सोशलिस्ट खेमे से आने वाले राजनारायण स्वास्थ्य मंत्री थे, जबकि जनसंघ घटक के शांता कुमार हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री. दोनों में ठन गई. वजह थी शांता कुमार सरकार की ओर से शिमला के रिज़ मैदान में राजनारायण को सभा करने की इजाजत न देना. बावजूद इसके राजनारायण ने 25 जून 1978 को रिज़ मैदान में सभा की. इस सभा के बाद जनता पार्टी के अंदर सोशलिस्टों और जनसंघ के बीच मतभेद गहराते चले गए. नतीजा ये हुआ कि 29 जून को राजनारायण की केन्द्रीय मंत्रिमंडल से रुख़सती हो गई.

राजनारायण (बाएं) और मधु लिमये (दाएं) की वजह से जनसंघ घटक के लोगों का जनता पार्टी में रहना मुश्किल हो गया था.
कहा जाता है कि राजनारायण (बाएं) और मधु लिमये (दाएं) की वजह से जनसंघ घटक के लोगों का जनता पार्टी में रहना मुश्किल हो गया था.

मधु लिमये का दोहरी सदस्यता पर सवाल

रिज़ मैदान प्रकरण और राजनारायण को कैबिनेट से हटाए जाने के कुछ ही दिनों बाद सोशलिस्ट नेता मधु लिमये ने एक नया विवाद शुरू कर दिया. मधु लिमये ने जनता पार्टी के भीतर मांग रख दी कि पार्टी का कोई भी सदस्य RSS जैसे सांप्रदायिक संगठन के कोई ताल्लुक नहीं रख सकता. जनता पार्टी और RSS- दोनों की दोहरी सदस्यता नहीं चलेगी. उनकी इस मांग को उन जनता नेताओं का भी समर्थन मिलने लगा, जो प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई और पार्टी अध्यक्ष चंद्रशेखर से असंतुष्ट चल रहे थे. नतीजा जुलाई 1979 आते-आते जनता पार्टी भरभरा कर गिर गई.

ऐसी गिरी कि 1980 के लोकसभा चुनाव में उसे सिर्फ 31 सीटें मिलीं. इंदिरा गांधी साढ़े तीन सौ सीटों के साथ सत्ता में वापस आ चुकी थीं. इसके बाद जनता पार्टी के भीतर वही कहानी शुरू हुई, जो अक्सर राजनीतिक दलों के बीच चुनाव हारने पर होती है. जनसंघ घटक के लोगों को बलि का बकरा बनाए जाने की कोशिशें शुरू हो गईं. इस घटक के लोगों को लेकर जनता पार्टी में आपसी सिरफुटव्वल इस कदर बढ़ गई कि 25 फरवरी, 1980 को जगजीवन राम ने पार्टी अध्यक्ष चंद्रशेखर को एक पत्र लिखकर दोहरी सदस्यता के मसले पर चर्चा कराने की मांग कर दी. इसके साथ ही यह तय हो गया कि अब जनसंघ से आए लोगों का जनता पार्टी में बने रहना मुश्किल है.

4 अप्रैल 1980 को जनसंघ घटक के अधिकांश लोगों को पार्टी से निकाल दिया गया. साथ ही, जनता पार्टी की ओर से एक बयान जारी किया गया कि पार्टी का कोई भी व्यक्ति किसी अन्य संगठन (RSS सहित) का सदस्य नहीं हो सकता. इन निकाले गए लोगों ने अपने पाॅलिटिकल फ्यूचर की तलाश शुरू कर दी. इन फैक्ट, निकाले जाने से पहले से ही ऐसी तलाश शुरू हो गई थी. लालकृष्ण आडवाणी और सुंदर सिंह भंडारी ने फरवरी-मार्च में ही देश के अलग-अलग हिस्सों का दौरा करके अपने समर्थकों का मूड भांपना शुरू कर दिया था. इन लोगों को लगने लगा था कि अपनी हिंदुत्व की विचारधारा के साथ आगे बढ़ने के लिए एक अलग पार्टी होनी चाहिए, जैसे जनता पार्टी में मर्जर से पहले जनसंघ हुआ करता था.

पार्टी से निकाले जाने के बाद क्या हुआ?

पार्टी से निकाले जाने के अगले ही दिन यानी 5 अप्रैल 1980 को दिल्ली के फिरोज शाह कोटला मैदान में बैठक बुलाई गई. ग्वालियर एस्टेट की राजमाता विजयराजे सिंधिया की अध्यक्षता में. बैठक में पूर्व विदेश मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी, पूर्व सूचना-प्रसारण मंत्री लालकृष्ण आडवाणी, सिकंदर बख्त, शांति भूषण और राम जेठमलानी जैसे लोग शरीक हुए. तय किया गया कि नई पार्टी बनाई जाएगी. इस प्रस्तावित पार्टी को RSS का भी आशीर्वाद प्राप्त था. क्योंकि इसमें अधिकांश वही लोग आ रहे थे, जो RSS की नर्सरी से निकले थे और पूर्ववर्ती जनसंघ का हिस्सा रहे थे.

अटल बिहारी वाजपेयी और विजयराजे सिंधिया.
अटल बिहारी वाजपेयी और विजयराजे सिंधिया.

अगले दिन 6 अप्रैल 1980 को नई पार्टी की घोषणा कर दी गई. नाम रखा गया भारतीय जनता पार्टी. अटल बिहारी वाजपेयी को इसका अध्यक्ष चुना गया. नई पार्टी में विजयराजे सिंधिया और राम जेठमलानी उपाध्यक्ष बनाए गए. लालकृष्ण आडवाणी, सिकंदर बख्त और सूरज भान को महासचिव बनाया गया. 6 अप्रैल की ही शाम को नवगठित पार्टी की ओर से प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई गई. लेकिन आश्चर्यजनक रूप से इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में नवनियुक्त पार्टी अध्यक्ष अटल बिहारी वाजपेयी ने हिंदुत्व या आरएसएस-जनसंघ की किसी भी प्रचलित शब्दावली से परहेज रखा. उनका पूरा फोकस जयप्रकाश नारायण की संपूर्ण क्रांति के लक्ष्यों के इर्द-गिर्द था. वाजपेयी ने गांधीवादी समाजवाद की स्थापना को अपनी पार्टी का प्रमुख लक्ष्य घोषित किया.

‘अंधेरा छंटेगा, सूरज निकलेगा, कमल खिलेगा’

दिसंबर 1980 में मुंबई के बांद्रा-कुर्ला कॉम्प्लेक्स में भाजपा का पहला अधिवेशन बुलाया गया. 50 हजार से ज्यादा पार्टी कार्यकर्ता इसमें शरीक हुए. इसी अधिवेशन में पार्टी नेताओं के साथ बंबई हाई कोर्ट के रिटायर्ड चीफ जस्टिस और पूर्व विदेश मंत्री एम.सी. छागला भी मंच पर दिखाई दिए. बिल्कुल पार्टी अध्यक्ष वाजपेयी के बांयी तरफ बैठे हुए. अधिवेशन के आखिरी दिन यानी 29 दिसंबर 1980 को जनसभा हुई. इसमें बोलते हुए जस्टिस छागला ने कहा,

“मुझे उम्मीद है कि मेरे बगल में बैठे अटल बिहारी वाजपेयी आने वाले समय में देश के प्रधानमंत्री होंगे.”

उनके इतना कहते ही अधिवेशन स्थल पर वाजपेयी के समर्थन में जोर-जोर से नारे गूंजने लगे. इस अधिवेशन के माध्यम से भाजपा ने राष्ट्रीय राजनीति में अपनी दमदार उपस्थिति का संकेत दे दिया था. सबसे आखिर में बोलते हुए वाजपेयी ने लोगों की तालियों की गड़गड़ाहट के बीच कहा,

“अंधेरा छंटेगा, सूरज निकलेगा और कमल खिलेगा.”

लेकिन संसद की ट्रेजरी बेंच की सीटों पर कमल खिलने में अभी 16 साल का वक्त और लगना था. और इन 16 सालों में पार्टी को वाजपेयी के रुख से इतर जाकर अपने पितृ संगठन RSS के हिंदुत्व की लाइन भी पकड़नी थी.

भाजपा का सांगठनिक ढांचा तैयार करने में RSS की महत्वपूर्ण भूमिका रही है.
भाजपा का सांगठनिक ढांचा तैयार करने में RSS की महत्वपूर्ण भूमिका रही है.

सुषमा स्वराज, जो कभी भाजपा की मुखर विरोधी थीं

1989 में भारतीय जनता पार्टी के उभार से लेकर अगले ढाई दशकों तक जब भी यह चर्चा हुई कि अटल-आडवाणी के बाद पार्टी की अगली जमात का नेतृत्व कौन करेगा, तो सबके जेहन में जो पहला नाम आता था वह सुषमा स्वराज का था. हालांकि दूसरी पांत में प्रमोद महाजन, वेंकैया नायडू, अरुण जेटली, राजनाथ सिंह, अनंत कुमार जैसे तमाम लोग थे. लेकिन सुषमा स्वराज जैसी देशव्यापी पहचान किसी की नहीं थी. पार्टी के अंदर उन्हें अटल बिहारी वाजपेयी के बाद सबसे बेहतरीन वक्ता और भीड़ खींचने वाली नेता माना जाता था.

लेकिन यही सुषमा स्वराज पार्टी में उस वक्त नहीं आईं, जब भाजपा का गठन हो रहा था. सुषमा स्वराज जनता पार्टी में ही रहीं. मार्च 1981 में सारनाथ में जब जनता पार्टी का अधिवेशन हो रहा था, तब सुषमा स्वराज ने भी वहां भाषण दिया. इस दौरान उन्होंने उन लोगों की खूब आलोचना की, जिन्होंने पार्टी से निकाले जाने की परिस्थितियां पैदा कीं, और निकाले जाने के बाद भारतीय जनता पार्टी बनाई. सुषमा जनता पार्टी में इसके अगले 3 साल तक बनीं रहीं. वह जनता पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में भी रहीं. लेकिन 1984 के लोकसभा चुनाव के ठीक पहले उन्होंने भाजपा ज्वाइन कर ली. वही भाजपा, जिसकी वह अक्सर आलोचना किया करती थीं. भाजपा के टिकट पर करनाल लोकसभा सीट से चुनाव लड़ीं लेकिन 2 बार (1984 और 89) चुनाव भी हारीं. इसके बावजूद उनका कद बढ़ता गया. पार्टी ने उन्हें दिल्ली की मुख्यमंत्री और कई दफा केन्द्रीय मंत्री भी बनाया. यहां तक कि 14वीं लोकसभा में वह नेता प्रतिपक्ष भी रहीं.

भाजपा में शामिल होने के बाद से सुषमा स्वराज को लालकृष्ण आडवाणी का करीबी माना जाता रहा.
भाजपा में शामिल होने के बाद से सुषमा स्वराज को लालकृष्ण आडवाणी का करीबी माना जाता रहा.

लेकिन फिर 2013 का दौर आया. पार्टी कार्यकारिणी की गोवा में बैठक हुई. इसके बाद मंज़र बदल गया. सबकुछ मोदीमय हो गया. हालांकि इस बैठक से कुछ दिन पहले ही सुषमा स्वराज ने पीएम पद के लिए अपनी आकांक्षा का सार्वजनिक रूप से इजहार भी किया था. कहा था, ‘वेस्टमिंस्टर मॉडल (ब्रिटिश संसदीय व्यवस्था) में नेता प्रतिपक्ष ही प्रधानमंत्री पद का स्वाभाविक उम्मीदवार होता है.’

84 की हार – क्या वाजपेयी गलत थे?

नई पार्टी के तौर पर आकार लेने के बाद 1984 का लोकसभा चुनाव भाजपा का पहला बड़ा इम्तिहान था. यही वह चुनाव था, जिसके ठीक पहले हिंदुत्ववादी संगठनों ने अयोध्या विवाद को गर्माना शुरू कर दिया था. बिहार के सीतामढ़ी से अयोध्या होते हुए दिल्ली तक राम-जानकी यात्रा निकाली गई. वैसे इस यात्रा में आधिकारिक तौर पर भाजपा की कोई सक्रियता नहीं थी लेकिन फिर भी इसमें भाजपा के कार्यकर्ता बड़ी संख्या में शामिल हुए. शायद इस यात्रा का सियासी मुहूर्त ठीक नहीं था. 31 अक्टूबर 1984 को यात्रा के दिल्ली पहुंचने का कार्यक्रम था. लेकिन सब जानते हैं कि उस दिन क्या हुआ था. उस दिन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या कर दी गई. उस हत्या से उपजे माहौल में राम-जानकी यात्रा से जुड़ी सारी प्लानिंग धरी की धरी रह गई. देश का माहौल दूसरी ही दिशा में घूम गया. सिर्फ और सिर्फ इंदिरा गांधी और उनकी शहादत की चर्चा हो रही थी. डेढ़ महीने बाद होने वाले लोकसभा चुनावों पर भी इस हत्याकांड की छाया साफ नजर आई. ऐसी सहानुभूति लहर चली कि समूचे विपक्ष का सूपड़ा साफ हो गया. अटल बिहारी वाजपेयी भी चुनाव हार गए. उन्हें ग्वालियर सीट पर माधव राव सिंधिया ने हराया. भाजपा की तो हालत ऐसी कि कुल 2 सीटें ही मिलीं. एक आन्ध्र प्रदेश की नांदयाल और दूसरी गुजरात की मेहसाणा. इन चुनाव परिणामों पर प्रतिक्रिया देते हुए पार्टी महासचिव लालकृष्ण आडवाणी ने कहा था,

“यह लोकसभा का नहीं बल्कि ‘शोकसभा’ का चुनाव था इसलिए ऐसा नतीजा देखने को मिला है.”

लेकिन क्या भाजपा के अंदर भी इस हार को ऐसे ही सामान्य तरीके से लिया गया था, जैसा आडवाणी ने कहा था?

नहीं. ऐसा बिल्कुल नहीं था. हार को लेकर पार्टी में निराशा व्याप्त थी. सवाल पूछे जा रहे थे. जवाबदेही तय करने की बातें हो रही थी. कई तरफ से अटल बिहारी वाजपेयी की नीतियों पर सवाल खड़े किए जा रहे थे. उनके द्वारा चुनावी सभाओं में बार-बार गांधीवादी समाजवाद और ‘नेहरूवियन साइंटिफिक टेंपरामेंट’ (नेहरू की वैज्ञानिक सोच) का मुद्दा उठाए जाने पर सवाल खड़े किए जा रहे थे. इन सबके बीच हार के कारणों की जांच करने और जवाबदेही तय करने के लिए पार्टी नेता कृष्ण लाल शर्मा के नेतृत्व में एक कमेटी बनाई गई. लेकिन जब इस कमेटी की रिपोर्ट आई, तब उसमें वाजपेयी और उनकी नीतियों को हार का कारण मानने के तर्कों को सिरे से खारिज कर दिया गया.

आडवाणी-गोविंदाचार्य युग की शुरुआत

1986 का साल था. अटल बिहारी वाजपेयी बतौर भाजपा अध्यक्ष 6 बरस बिता चुके थे. उनके नेतृत्व में पार्टी को कोई खास सफलता नहीं मिल रही थी. यहां तक कि 1983 का दिल्ली म्युनिसिपल इलेक्शन भी पार्टी हार गई थी. ऐसे में पार्टी में शीर्ष स्तर पर बदलाव की मांग जोर पकड़ रही थी. मार्च 1986 में यह बदलाव हुआ भी, जब लालकृष्ण आडवाणी को नया पार्टी अध्यक्ष बनाया गया. यहां से पार्टी में आडवाणी युग की शुरुआत हो गई. आडवाणी युग की शुरुआत को पार्टी में RSS और हिंदुत्ववादी ताकतों की पकड़ मजबूत होने की निशानी माना गया. सिर्फ माना ही नहीं गया बल्कि व्यवहारिकता में भी ऐसा ही देखा गया. RSS से भाजपा में भेजे गए पार्टी महासचिव के.एन. गोविंदाचार्य ने जिस प्रकार पार्टी संगठन पर कब्जा जमाया, उससे वाजपेयी किनारे लगते चले गए. वाजपेयी की मर्जी के खिलाफ जाकर पार्टी ने अयोध्या आंदोलन से भी ख़ुद को जोड़ लिया. 1989 के लोकसभा चुनाव के समय तक तो ऐसी नौबत भी आ गई, जब भाजपा कार्यकर्ताओं ने राम मंदिर और हार्डकोर के मुद्दे पर आक्रामक रुख अपनाने की मांग करते हुए वाजपेयी के साथ अशिष्ट व्यवहार तक कर दिया. इस पर बिफरे वाजपेयी ने यहां तक कह दिया,

“1952 और 1984 की तरह 2 सीटों पर ही सिमटने की इच्छा हो तो करो यही सब काम.”

जाहिर सी बात है कि उस समय तक पार्टी पर वाजपेयी की पकड़ ढीली हो चुकी थी. उनके गांधीवादी समाजवाद को पार्टी किनारे लगा चुकी थी. राम मंदिर और हिंदुत्व पार्टी का घोषित एजेंडा बन चुका था.

आडवाणी युग में भाजपा ने 2 लोकसभा सीटों से सत्ता तक का सफर तय किया.
आडवाणी युग में भाजपा ने 2 लोकसभा सीटों से सत्ता तक का सफर तय किया.

वाजपेयी चुनाव क्यों नहीं लड़े?

1989 का साल था. 9वीं लोकसभा के चुनाव हो रहे थे. इस चुनाव में कांग्रेस का मुकाबला करने के लिए एक यूनीक स्ट्रैटजिक अलायंस अस्तित्व में आ चुका था. यूनीक इसलिए क्योंकि इसमें एक तरफ लेफ्ट (कम्युनिस्ट) था तो दूसरी तरफ राइट (भाजपा). लेफ्ट और राइट के इस विरोधाभासी रणनीतिक गठबंधन को लीड कर रहा था जनता दल. बोफोर्स का बवाल अपने चरम पर था. इसी बवाल के बूते विपक्षी दलों को लग रहा था कि कांग्रेस को हराया जा सकता है. लिहाजा सभी दलों में सीटें फाइनल होने लगीं. भाजपा भी अपने उम्मीदवार घोषित करने लगी. लेकिन जब भाजपा की फाइनल लिस्ट आ गई, तब लोगों को यह देखकर बहुत आश्चर्य हुआ कि लिस्ट में अटल बिहारी वाजपेयी का नाम नदारद है. कहा गया कि उन्हें इसलिए चुनाव नहीं लड़ाया गया ताकि वे ज्यादा से ज्यादा सीटों पर प्रचार कर सकें. लेकिन इस मुद्दे पर करीबी नजर रखने वाले राजनीतिक जानकारों के मुताबिक, यह वाजपेयी को किनारे लगाने की कोशिश थी. पार्टी का नया नेतृत्व (आडवाणी-गोविंदाचार्य) उन्हें अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा के रास्ते में बाधा के तौर पर देखते थे.

अटल बिहारी वाजपेयी और नरेन्द्र मोदी के रूप में भाजपा ने अबतक देश को 2 प्रधानमंत्री दिए हैं.
अटल बिहारी वाजपेयी और नरेन्द्र मोदी के रूप में भाजपा ने अब तक देश को 2 प्रधानमंत्री दिए हैं.

इसके बाद की कहानी से तो कमोबेश सभी परिचित हैं. जनता दल के साथ 1989 के स्ट्रैटजिक एलायंस के कारण भाजपा की लोकसभा सीटें 2 से बढ़कर 86 हो गईं. फिर चंद्रशेखर के प्रधानमंत्रित्व काल में मुख्य विपक्षी पार्टी का दर्जा हासिल हो गया. लाल कृष्ण आडवाणी विपक्ष के नेता बने. इसके बाद 1996 में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में पहली बार केन्द्र की सत्ता हासिल हुई. लेकिन भाजपा को अकेले दम पर बहुमत पहली बार 2014 में मिला, और नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री बने. 2019 के लोकसभा चुनाव में तो भाजपा ने 300 सीटों का आंकड़ा भी पार कर लिया. तब से लेकर अब तक अपने दम पर केन्द्र में सरकार चला रही है. भाजपा के सदस्य रह चुके रामनाथ कोविंद मौज़ूदा समय में राष्ट्रपति हैं. 2 लोग, भैरों सिंह शेखावत और एम. वेकैंया नायडू उपराष्ट्रपति पद तक पहुंच चुके हैं. 2 लोग, अटल बिहारी वाजपेयी और नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री पद तक पहुंचे हैं. 3 लोग- अटल, आडवाणी और सुषमा स्वराज लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष की जिम्मेदारी संभालने चुके हैं.


विडियो : बलराज मधोक से वाजपेयी का क्या झगड़ा था?

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