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जीएमसी बालयोगी की भलमनसाहत ने कैसे वाजपेयी सरकार गिरवा दी थी?

तारीख थी 23 मार्च 1998. सुबह का वक्त. उस दिन हैदराबाद के बेगमपेट हवाई अड्डे से इंडियन एयरलाइंस की एक फ्लाइट दिल्ली के लिए टेक-ऑफ करती है. उस फ्लाइट में एक सांसद भी यात्रा कर रहा होता है जिसे नहीं पता कि अगले कुछ घंटों में उसके साथ क्या होने वाला है. कुछ देर बाद यह फ्लाइट दिल्ली के पालम हवाई अड्डे पर लैंड करती है. इसके साथ ही फ्लाइट के अंदर एक अनाउंसमेंट होती है,

“Mr Balayogi, Telugu Desam MP, please exit first. It is an emergency.”

यह सुनकर अमालापुरम से तेलुगू देशम पार्टी के सांसद जीएमसी बालयोगी हक्के-बक्के रह जाते हैं. वे घबराकर बाहर निकलते हैं. वहां उन्हें आन्ध्र भवन के रेजिडेंट कमिश्नर अपनी गाड़ी में सवार होने को कहते हैं. तब बालयोगी और घबरा जाते हैं. पूछते हैं कि आखिर माजरा क्या है. रेजिडेंट कमिश्नर उन्हें बताते हैं,

“सर, आप एनडीए और टीडीपी की तरफ से लोकसभा स्पीकर पद के उम्मीदवार हैं और मैं आपको सीधे संसद भवन लेकर चल रहा हूं. वहां आपका नामांकन होना है.”

जाहिर है बालयोगी इस सरप्राइज के लिए तैयार नहीं थे. सत्तारूढ़ भाजपा गठबंधन को भी अपने उम्मीदवार की जीत का भरोसा नहीं था. तभी तो उसने संयुक्त मोर्चे की घटक रही तेलुगु देशम पार्टी (TDP) के साथ स्पीकर के पद की सौदेबाजी की थी. इसके बदले TDP ने सरकार का समर्थन किया था. जबकि 22 मार्च तक हालत यह थी कि गृह मंत्री आडवाणी ने विपक्ष के नेता शरद पवार से बात कर कांग्रेस की ओर से स्पीकर पद के उम्मीदवार और निवर्तमान स्पीकर पीए संगमा के समर्थन की बात कर दी थी. उसी शाम संसदीय कार्य मंत्री मदन लाल खुराना ने संगमा को फोन कर बधाई तक दे दी थी. लेकिन देर रात जॉर्ज फर्नांडिस और चंद्रबाबू नायडू के बीच जो डील हुई, उसमें बालयोगी ‘मुकद्दर का सिकंदर’ बन कर उभरे. स्पीकर के चुनाव में बालयोगी चुन लिए गए और उसी दिन यह तय हो गया कि वाजपेयी सरकार विश्वास मत भी हासिल कर लेगी.

अटल बिहारी वाजपेयी और पी ए संगमा के साथ जी एम सी बालयोगी (बीच में).
अटल बिहारी वाजपेयी और पीए संगमा के साथ जीएमसी बालयोगी (बीच में).

जी हां, पाॅलिटिकल किस्सों में आज हम बात कर रहे हैं 12वीं और 13वीं लोकसभा के अध्यक्ष रहे गंती मोहन चंद्र बालयोगी की. शार्ट में कहें तो जीएमसी बालयोगी, जिनकी आज पुण्यतिथि है. वे दलित समाज से आने वाले पहले नेता थे जो लोकसभा अध्यक्ष की कुर्सी तक पहुंचे. लेकिन उनके करियर की शुरुआत सियासत के साथ नहीं हुई. वे तो कानून की पढ़ाई पूरी करने के बाद अपने गृह जिले ईस्ट गोदावरी के हेडक्वार्टर काकीनाडा में वकालत कर रहे थे. साथ ही जैसे लाॅ किए आम लड़के करते हैं वैसे ही जुडिशियल सर्विस के एक्जाम की तैयारी भी करने लगे. 1985 में वे जुडिशियल सर्विस के लिए सिलेक्ट भी हो गए और बतौर मजिस्ट्रेट 1 बरस काम भी किया.

लेकिन बनना तो उन्हें नेता था. इसलिए मजिस्ट्रेट की नौकरी छोड़ दी और काकीनाडा में कोऑपरेटिव की नेतागिरी करने लगे. कुछ दिनों तक ईस्ट गोदावरी जिला कोऑपरेटिव के उपाध्यक्ष के तौर पर भी काम किया. लेकिन वह दौर फिल्मी दुनिया से आकर आन्ध्र प्रदेश की राजनीति में जड़ें जमा रहे एनटी रामाराव और उनकी तेलुगू देशम पार्टी का था. बालयोगी भी काकीनाडा में तेलुगू देशम से जुड़ गए. फिर 1987 में वे जिला परिषद के लिए चुन लिए गए. उस दौर में आन्ध्र प्रदेश में तेलुगू देशम का राज था.

जाहिर सी बात है कि जमीनी स्तर पर सपोर्ट था तभी राज्य की बागडोर भी पार्टी के हाथ में थी. सो तेलुगू देशम ने इस दौर में ईस्ट गोदावरी जिला परिषद की अधिकांश सीटें जीतीं. जब जिला परिषद का अध्यक्ष बनाने की बारी आई तो सदस्यों के बीच बालयोगी को सबसे काबिल पाया गया. जुडिशियल मजिस्ट्रेट का अनुभव, कोऑपरेटिव का अनुभव- ये सब उनके काम आया और वे जिला परिषद के अध्यक्ष चुन लिए गए. इससे उनका रुतबा भी अब अपने इलाके में बढ़ गया था. लेकिन इसी बीच TDP 1989 के विधानसभा चुनावों में राज्य की सत्ता गंवा बैठी. एनटी रामाराव भूतपूर्व मुख्यमंत्री हो गए. इसके बाद रामाराव अपने चैतन्य रथ पर सवार होकर आंध्र प्रदेश के दूरस्थ इलाकों की खाक छानने लगे. वे पार्टी के काम के लिए नए और ऊर्जावान लोगों की तलाश करने लगे. इसी दरम्यान उनकी नजर ईस्ट गोदावरी जिला परिषद के अध्यक्ष जीएमसी बालयोगी पर पड़ी.

फिर आया 1991 का लोकसभा चुनाव. एनटी रामाराव ने अमालापुरम की सुरक्षित सीट से बालयोगी पर दांव लगाने का फैसला किया. 40 बरस के बालयोगी के लिए यह बड़ा राजनीतिक ब्रेक था. उन्होंने इस मौके को भुना लिया. वे TDP के उन 13 ख़ुशनसीब उम्मीदवारों में से एक थे, जो राजीव गांधी की हत्या से कांग्रेस के पक्ष में उपजी सहानुभूति लहर में भी संसद पहुंचने में कामयाब रहे थे.

लेकिन खुशनसीब केवल बालयोगी नहीं थे. एक और तेलुगू बिड्डा (बच्चा) था. पीवी नरसिंह राव. आंध्र प्रदेश के पूर्व कांग्रेसी मुख्यमंत्री. जो लगभग रिटायरमेंट के मोड में जा चुकने के बाद भी देश के प्रधानमंत्री बन गए. उनके पीएम बनने से कांग्रेस विरोध की बुनियाद पर खड़ी तेलुगू देशम को भी लोकसभा में अपना स्टैंड बदलना पड़ा. एक तेलुगू प्रधानमंत्री का समर्थन करना पड़ा. लेकिन इस समर्थन के बावजूद तेलुगू देशम के कुछ सांसदों ने सदन में अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज करवाई. कई मुद्दों पर सरकार को घेरने का काम किया. इन सांसदों में जीएमसी बालयोगी सबसे आगे थे.

फिर 1996 का लोकसभा चुनाव हुआ. बालयोगी यह चुनाव हार गए. हालांकि तब तक वे TDP के नए नेता और मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू के साथ पटरी बिठाने में कामयाब हो चुके थे. इसलिए चुनाव हारने के बाद भी नायडू ने उन्हें निराश नहीं किया और अपनी सरकार में एडजस्ट कर दिया. बालयोगी को हायर एजुकेशन मिनिस्टर बनाया गया था.

चंद्रबाबू नायडू (बाएं) के साथ जी एम सी बालयोगी. फ़ोटो क्रेडिट : gettyimage
चंद्रबाबू नायडू (बाएं) के साथ जी एम सी बालयोगी. फ़ोटो क्रेडिट : gettyimage

लेकिन 1996 वाली लोकसभा 2 साल भी पूरे नहीं कर पाई. कांग्रेस पार्टी ने संयुक्त मोर्चे के दोनों प्रधानमंत्रियों (देवेगौड़ा और गुजराल) को टिकने नहीं दिया. 1998 आते-आते मध्यावधि चुनाव की नौबत आ गई. यह चुनाव बालयोगी के लिए किस्मत का दरवाजा खोलने वाला साबित हुआ. वे अमालापुरम से एक बार फिर लोकसभा पहुंचे. इसके बाद वह परिस्थिति आ गई जिसका जिक्र इस किस्से की शुरुआत में किया गया था.

लेकिन चंद्रबाबू नायडू ने लोकसभा अध्यक्ष बनाने के लिए बालयोगी का ही सिलेक्शन क्यों किया, जबकि उनकी पार्टी से के येरन नायडू जैसे वरिष्ठ लोग भी लोकसभा पहुंचे थे? इस सवाल के जवाब में हैदराबाद के वरिष्ठ पत्रकार टीएस सुधीर कहते हैं,

“आंध्र प्रदेश में एक धारणा है कि जो ईस्ट गोदावरी जिले में जीत हासिल करता है, राज्य की सत्ता उसे ही मिलती है. बालयोगी भी ईस्ट गोदावरी से आते थे और चंद्रबाबू नायडू इस जिले में पार्टी को मजबूत करना चाहते थे. बालयोगी के सिलेक्शन के पीछे दूसरी वजह थी कि वे दलित समाज से आते थे और उनके समाज का वोट चंद्रबाबू नायडू के लिए महत्वपूर्ण था. तीसरी वजह थी कि बालयोगी कभी चंद्रबाबू नायडू को चैलेंज नहीं कर सकते थे. वे संसद की राजनीति में ख़ुद को सिमटाए रखने वाले आदमी थे.”

अटल बिहारी वाजपेयी एवं अन्य नेताओं के साथ जी एम सी बालयोगी (वाजपेयी के बगल में).
अटल बिहारी वाजपेयी एवं अन्य नेताओं के साथ जी एम सी बालयोगी (वाजपेयी के बगल में).

जब बालयोगी के ‘फैसले’ ने वाजपेयी सरकार गिरवाई

किस्से को एक साल और आगे ले जाते हैं. साल था 1999. तारीख 17 अप्रैल. अन्नाद्रमुक सुप्रीमो जयललिता ने केंद्र की अटल बिहारी वाजपेयी सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया था. तब वाजपेयी को लोकसभा में विश्वास प्रस्ताव पेश करना पड़ गया था. दोपहर का वक्त था. डेढ़ दिनों से विश्वास प्रस्ताव पर चल रही बहस अब अपने अंतिम दौर में थी. इसके बाद वोटिंग होनी थी. तभी अचानक उड़ीसा के नवनियुक्त मुख्यमंत्री गिरधर गमांग सदन में उपस्थित हो गए. गमांग ने अभी अपनी कोरापुट लोकसभा सीट छोड़ी नहीं थी. लेकिन उन्हें सदन में देख कर ट्रेजरी बेंच के सदस्य हल्ला मचाने लगे. उनका तर्क था कि राज्य के पाॅलिटिकल सिस्टम में जा चुका आदमी अब संसद की बैठक में कैसे शामिल हो सकता है.

उधर, विपक्ष के सांसदों का तर्क था कि चूंकि गमांग ने अभी लोकसभा से इस्तीफा नहीं दिया है इसलिए वे अभी भी संसद के सदस्य हैं और वोटिंग कर सकते हैं. उन्होंने संविधान का हवाला दिया. कहा, ‘संविधान भी यही कहता है कि संसद से राज्य के सिस्टम में जाने वाला व्यक्ति जब तक विधायक नहीं बन जाता या राज्य में उसे कोई पद संभाले 6 महीने पूरे नहीं हो जाते (दोनों में जो पहले हो) तब तक वह संसद का सदस्य बना रह सकता है.’

जुडिशियल मजिस्ट्रेट रह चुके स्पीकर बालयोगी ने दोनों पक्षों को गंभीरता से सुना और उसके बाद विश्वास प्रस्ताव पर गमांग के वोटिंग करने या न करने का फैसला उनकी ‘अंतरात्मा’ पर छोड़ दिया.

उड़ीसा के मुख्यमंत्री बन चुके गिरधर गमांग ने मुख्यमंत्री पद पर रहते हुए बतौर सांसद लोकसभा की वोटिंग में हिस्सा लिया और 1 वोट से वाजपेयी सरकार गिरा दी थी.
उड़ीसा के मुख्यमंत्री बन चुके गिरधर गमांग ने मुख्यमंत्री पद पर रहते हुए बतौर सांसद लोकसभा की वोटिंग में हिस्सा लिया और 1 वोट से वाजपेयी सरकार गिरा दी थी.

इसके बाद गमांग ने सदन में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन से वोट किया. लेकिन मशीन गलत आंकड़े दिखाने लगी. उसमें विश्वास प्रस्ताव के पक्ष में 256 और विरोध में 270 मत दिखे. यह देख सत्ता पक्ष का चेहरा फक्क पड़ गया और विपक्ष के सांसद गदगद होकर एक-दूसरे को बधाई देने में लग गए.

लेकिन अभी मामले में और ट्विस्ट आना था. और यह ट्विस्ट आया स्पीकर बालयोगी के बयान से. उन्होंने जब सदन में बोलना शुरू किया तो सांसदों को लगा कि वे इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन में दिख रहे आंकड़ों की औपचारिक घोषणा करेंगे. लेकिन बालयोगी ने एक अलग ही घोषणा कर दी. उन्होंने कहा,

“विश्वास मत पर हुई वोटिंग में 539 सदस्यों ने हिस्सा लिया है जबकि इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन के आंकड़े सिर्फ 526 सदस्यों (270+256) की गिनती दिखा रहे हैं. मशीन ठीक से काम नहीं कर रही है. लिहाजा अब मैन्युअल प्रोसेस से वोटिंग होगी.”

इसके बाद सत्ता पक्ष में राहत का भाव दिखाई दिया. लेकिन यह राहत सिर्फ पौने घंटे की ही थी. मैन्युअल वोटिंग की पर्चियों को इकठ्ठा कर उनकी गिनती कराई गई. और गिनती पूरी होने के बाद सब लोग स्पीकर बालयोगी की तरफ देखने लगे. क्योंकि यह इलेक्ट्रॉनिक मशीन का नतीजा नहीं था, जो सबको दिखाई पड़ता. अंतिम नतीजे सिर्फ पर्चियों की गिनती करनेवाले कर्मचारियों और स्पीकर बालयोगी को ही पता थे.

लगभग सवा दो बजे स्पीकर बालयोगी ने बोलना शुरू किया. सांसदों समेत टीवी-रेडियो से चिपका पूरा देश नतीजों के इंतजार में बालयोगी के एक-एक शब्द पर कान लगाए हुए था. बालयोगी ने भर्राई आवाज में सिर्फ 3 लाइनें बोली,

“Voting process on trust motion have been completed. In favour of Ayes 269 while in favour of NOs 270. Trust motion has been defeated by 1 vote and now house is adjourned sine die.”

(विश्वास प्रस्ताव पर वोटिंग की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है. पक्ष में 269 और विपक्ष में 270 वोट पड़े हैं. अतः विश्वास प्रस्ताव 1 वोट से गिर गया है और अब सदन को अनिश्चित काल के लिए स्थगित किया जाता है.)

बालयोगी ने सत्ता पक्ष की आपत्ति के बावजूद गिरधर गमांग के वोट करने का फैसला उनकी अंतरात्मा पर छोड़ दिया, जो वाजपेयी सरकार पर भारी पड़ गया था. एक मुख्यमंत्री के वोट ने एक प्रधानमंत्री की सरकार गिरा दी थी.

लोकसभा अध्यक्ष के तौर पर सदन का संचालन करते जी एम सी बालयोगी.
लोकसभा अध्यक्ष के तौर पर सदन का संचालन करते जी एम सी बालयोगी.

इसके बाद लोकसभा चुनाव हुए. अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में नेशनल डेमोक्रेटिक एलायंस (NDA) को पूर्ण बहुमत मिला. इस बार भी NDA की ओर से बालयोगी को ही लोकसभा स्पीकर बनाया गया. बतौर स्पीकर अपने दूसरे कार्यकाल में बालयोगी को एकसाथ कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा. अटल बिहारी वाजपेयी ने सदन के बाहर 24 पार्टियों के NDA गठबंधन को बरकरार रखने की चुनौतियों का सामना करने के लिए NDA संयोजक जार्ज फर्नांडिस को तैनात कर रखा था. तब भी सदन के अंदर पार्टियों के आपसी झगड़े उभर ही आते थे. कई बार उनकी ख़ुद की पार्टी तेलुगू देशम भी इस कंट्राडिक्शंस का हिस्सा होती थी. लेकिन बालयोगी ने ऐसी परिस्थितियों को बखूबी हैंडल किया.

हेलिकॉप्टर दुर्घटना

27 फरवरी 2002 को गोधरा रेलवे स्टेशन पर साबरमती एक्सप्रेस के एस-6 कोच को जला दिया गया. इसमें सवार ज्यादातर लोग जिंदा जल गए. 28 फरवरी को संसद में भारी हंगामा हुआ. जबकि उस दिन बजट पेश होना था. हंगामे के बीच वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा ने बजट पेश किया. उसके बाद हंगामा बढ़ता देख बालयोगी ने सदन को दिन भर के लिए स्थगित कर दिया. उस 28 फरवरी को शुक्रवार था. लिहाजा संसद की अगली बैठक सोमवार यानी 3 मार्च को होनी थी. लेकिन बालयोगी के जीवन में फिर स्पीकर की कुर्सी पर बैठने का अवसर नहीं आया क्योंकि नियति को कुछ और ही मंजूर था.

लोकसभा स्थगित होने के बाद बालयोगी अपने गृह राज्य आंध्र प्रदेश के लिए रवाना हो गए. वहां वे रविवार को अपने इलाके भीमावरम गए. वहां से उन्हें सोमवार यानी 3 मार्च की सुबह पास के इलेरू रेलवे स्टेशन से हैदराबाद के लिए ट्रेन पकड़नी थी ताकि वे समय से दिल्ली पहुंच कर लोकसभा की बैठक को संचालित कर सकें. पर समय बचाने के ख्याल से बालयोगी ने ट्रेन की बजाए डेक्कन एविएशन कंपनी के Bell 206 B3 हेलिकाॅप्टर से हैदराबाद जाना ज्यादा उचित समझा. वे अपने सहायक सत्तीराजू के साथ भीमावरम से हेलीकाॅप्टर में सवार हुए. लेकिन उड़ने के बाद चालक को कोहरे के कारण विजिबिलिटी की दिक्कत आ रही थी. साथ ही कुछ टेक्नीकल दिक्कतों की बात भी कही जाती है.

यह सब देखकर पायलट ने हेलिकाॅप्टर को बीच में ही लैंड कराने का फैसला किया. तब तक हेलिकाॅप्टर कृष्णा जिले की सीमा में आ चुका था. यह कैकालुर का इलाका था जहां लैंडिंग की कोशिश के दौरान लो विजिबिलिटी के कारण पायलट केवी मेनन एक बड़े तालाब को फील्ड समझ बैठे. वहां लैंड कराने की कोशिश में हेलिकाॅप्टर नारियल के एक पेड़ से टकराकर दुर्घटनाग्रस्त हो गया और तालाब में जा गिरा.

इस दुर्घटना में हेलिकाॅप्टर में सवार तीनों लोगों (लोकसभा स्पीकर जीएमसी बालयोगी, उनके सहायक सत्तीराजू और पायलट केवी मेनन) की मौत हो गई. हेलिकाॅप्टर के मलबे में सबके शव इतने क्षत-विक्षत अवस्था में थे कि बालयोगी की पहचान नहीं हो पा रही थी. तब उनके शव को उनकी रूद्राक्ष की माला से पहचाना जा सका था.

जी एम सी बालयोगी के दुर्घटनाग्रस्त हेलीकाॅप्टर का मलबा. फ़ोटो क्रेडिट : gettyimage.
जी एम सी बालयोगी के दुर्घटनाग्रस्त हेलीकाॅप्टर का मलबा. फ़ोटो क्रेडिट : gettyimage.

बालयोगी की मौत ऐसे समय हुई थी जब केंद्र सरकार आतंकवाद निरोधक कानून पोटा को पास करवाने के लिए संसद के दोनों सदनों की संयुक्त बैठक बुलाने की तैयारी में थी. इससे पहले पोटा विधेयक पर लोकसभा और राज्यसभा की राय बंट गई थी. लोकसभा में जहां यह विधेयक पास हो गया था, वहीं राज्यसभा ने इसे खारिज कर दिया था. लिहाजा सरकार को संयुक्त बैठक बुलानी पड़ गई. वह भी अध्यक्ष के बिना. तब स्पीकर बालयोगी की अनुपस्थिति में उपाध्यक्ष पीएम सईद ने संयुक्त बैठक की अध्यक्षता की और पोटा विधेयक पास करवाया. इसके बाद शिवसेना सेना मनोहर जोशी को अगला लोकसभा अध्यक्ष चुना गया. लेकिन सरकार ने बालयोगी की यादों को संजोकर रखने की भी पूरी कोशिश की. उनकी याद में संसद परिसर के एक सभागार का नाम जीएमसी बालयोगी सभागार कर दिया गया है.


विडियो : बलराज मधोक का अटल बिहारी वाजपेयी से क्या झगड़ा था?

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