'वहां हमारी आवाज़ नहीं थी!'... UGC पर SC के फैसले के खिलाफ सड़कों पर उतरे छात्र क्या बोले
छात्र संगठन AISA ने कहा कि विश्वविद्यालयों में जातिगत भेदभाव के कारण ही रोहित वेमुला, दर्शन सोलंकी, पायल तड़वी जैसे छात्रों को मजबूर होकर आत्महत्या करनी पड़ी. छात्रों ने UGC के नए नियमों को दोबारा लागू करने की मांग की है.

यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (UGC) के ‘इक्विटी रेगुलेशंस 2026’ पर सुप्रीम कोर्ट के रोक लगाने के फैसले के विरोध में छात्र संगठन सड़कों पर उतर आए हैं. उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में उन्होंने नए UGC नियमों पर सर्वोच्च अदालत के आदेश का कड़ा विरोध किया. शांतिपूर्वक प्रदर्शन कर रहे छात्रों ने नए UGC नियमों को दोबारा लागू करने की मांग की. उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में लैंगिक और जातिगत भेदभाव को खत्म करने के लिए ये जरूरी हैं.
शनिवार, 31 जनवरी को छात्र संगठन समाजवादी छात्र सभा और ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश का विरोध किया और UGC के नए नियमों को बहाल करने की मांग की. छात्रों ने प्रयागराज के जिलाधिकारी के दफ्तर पर प्रदर्शन किया. अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST), अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) छात्र समेत छात्राओं ने भी प्रदर्शन में हिस्सा लिया.
AISA ने प्रयागराज DM के जरिए राष्ट्रपति के नाम एक ज्ञापन जिला प्रशासन को सौंपा. इसमें UGC के ‘इक्विटी रेगुलेशंस 2026’ को दोबारा लागू करने की अपील की गई है. समाजवादी छात्र सभा, समाजवादी पार्टी का छात्र संगठन है, जबकि AISA भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) लिबरेशन CPI(ML)(L) का स्टूडेंट विंग है.
AISA ने अपने ज्ञापन में सुप्रीम कोर्ट पर फैसले में विश्वविद्यालयों में लैंगिक और जातिगत भेदभाव के बढ़ते मामलों के तथ्यों को अनदेखा करने का आरोप लगाया. UGC पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश से खफा एक छात्र ने कहा,
ये जो UGC की गाइडलाइन रुकी है, साफ-साफ बताती है कि UGC का नियम क्यों जरूरी था. तीन दिन के विरोध प्रदर्शन में (नियम) वापस लेना पड़ गया क्योंकि हमारा वहां (सुप्रीम कोर्ट) रिप्रेजेंटेशन नहीं था. लड़ने वाले उनके थे. दलील पेश करने वाले उनके थे और जवाब में सुनवाई करने वाले भी उनके थे. तो मैं वही कहूंगा कि ये भीड़ देखकर हमें घबराना नहीं है..."
AISA से जुड़े छात्रों ने कहा कि खुद केंद्र सरकार की रिपोर्ट में सामने आया है कि विश्वविद्यालयों में जातिगत भेदभाव और उत्पीड़न के मामले 118 फीसदी बढ़ गए हैं. छात्र संगठन ने ज्ञापन में लिखा,
सुप्रीम कोर्ट द्वारा लगाई गई यह रोक ठीक अनुसूचित जाति-जनजाति एक्ट के फैसले में किए गए बदलाव की तरह है, जिसके खिलाफ पूरे देश में आंदोलन हुआ था और जिसको सरकार को फिर वापस लेना पड़ा था.

AISA ने शायद 2018 के सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले का जिक्र किया, जिसमें अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार रोकथाम) कानून के तहत तुरंत गिरफ्तारी पर रोक लगा दी गई थी. उस समय SC/ST समुदाय ने इस फैसले का कड़ा विरोध किया था. बाद में केंद्र सरकार ने कानून में बदलाव किया और सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलट दिया.
ज्ञापन में आगे लिखा है,
यूनिवर्सिटी कैंपस में फैले जातिगत भेदभाव के मामले लगातार बढ़ रहे हैं. जातिगत भेदभाव के कारण ही रोहित वेमुला, दर्शन सोलंकी, पायल तड़वी जैसे छात्रों को मजबूर होकर आत्महत्या करनी पड़ी.
AISA ने आगे कहा कि राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के अनुसार छात्रों के आत्महत्या के बहुत मामले हैं, जिसमें बड़ी संख्या दलित, पिछड़े वर्ग से आने वाले छात्रों की है.
13 जनवरी को UGC ने विश्वविद्यालयों और कॉलेजों के लिए ‘इक्विटी रेगुलेशंस 2026’ लागू किए थे. इसमें अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST), अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC), महिला और विकलांग छात्रों के खिलाफ भेदभाव से निपटने की व्यवस्था की गई थी. इसमें झूठी शिकायत पर सजा के प्रावधान को हटा दिया गया था.
पूरी ग्राउंड रिपोर्ट यहां देखिएः
सवर्ण वर्ग के छात्रों ने UGC के नए नियम का कड़ा विरोध किया. बाद में मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा. 29 जनवरी को सुनवाई करते हुए सर्वोच्च अदालत ने कहा कि फ्रेमवर्क “पहली नजर में साफ नहीं है.” फिर कोर्ट ने UGC के ‘इक्विटी रेगुलेशंस 2026’ पर रोक लगा दी.
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