The Lallantop
Advertisement
  • Home
  • India
  • Supreme Court Stays UGC Equity Regulations 2026 says Capable Of Misuse, Vague

UGC इक्विटी रेगुलेशन्स पर सुप्रीम कोर्ट की रोक, CJI सूर्य कांत बोले- अस्पष्ट हैं नियम

Supreme Court में CJI Surya Kant की अगुवाई वाली खंडपीठ ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से जवाब मांगा और सुझाव दिया कि एक कमेटी बनाई जाए जिसमें 2-3 प्रतिष्ठित जज या विशेषज्ञ हों. जो सामाजिक मूल्यों और समाज की समस्याओं को समझते हों. तब तक 2026 के नियमों पर स्टे लगा दिया गया है.

Advertisement
Supreme Court Stays UGC Equity Regulations 2026 says Capable Of Misuse, Vague
2012 के पुराने नियम लागू रहेंगे. मामले की अगली सुनवाई 19 मार्च को होगी. (फोटो- PTI)
pic
प्रशांत सिंह
29 जनवरी 2026 (अपडेटेड: 29 जनवरी 2026, 02:43 PM IST)
font-size
Small
Medium
Large
font-size
Small
Medium
Large
whatsapp share

सुप्रीम कोर्ट ने UGC के नई 'इक्विटी रेगुलेशन्स 2026' पर रोक लगाने का फैसला किया है. चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत और जस्टिस जोयमलया बागची की बेंच ने गुरुवार, 29 जनवरी को तीन याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए ये आदेश दिया. याचिकाकर्ताओं ने UGC के रेगुलेशन्स के खिलाफ याचिकाएं डाली थीं.

कोर्ट ने नियमों को प्रथम दृष्टया अस्पष्ट बताया, और कहा कि इनका गलत इस्तेमाल हो सकता है. CJI सूर्यकांत ने कहा,

"ये भाषा पूरी तरह अस्पष्ट है. इसका दुरुपयोग हो सकता है. ये समाज को बांट सकती है."

उन्होंने पूछा कि क्या हम जाति-रहित समाज की दिशा में पीछे जा रहे हैं? जस्टिस बागची ने कहा कि 2012 के नियम अधिक समावेशी थे, जबकि नए नियम रिग्रेशन (पीछे जाना) जैसे लगते हैं. कोर्ट ने अलग-अलग जातियों के लिए अलग हॉस्टल जैसे प्रावधानों पर आपत्ति जताई और कहा,

"भगवान के लिए ऐसा मत करो! हम सब साथ रहते थे... अंतरजातीय विवाह भी होते हैं."

कोर्ट ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से जवाब मांगा और सुझाव दिया कि एक कमेटी बनाई जाए जिसमें 2-3 प्रतिष्ठित जज या विशेषज्ञ हों. जो सामाजिक मूल्यों और समाज की समस्याओं को समझते हों. तब तक 2026 के नियमों पर स्टे लगा दिया गया है. और 2012 के पुराने नियम लागू रहेंगे. मामले की अगली सुनवाई 19 मार्च को होगी.

मामले की सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से CJI ने कहा,

“हम आपका जवाब सुनना चाहेंगे. आज हम कोई ऑर्डर पास नहीं करना चाहते. कोई कमेटी तो होनी चाहिए, जिसमें कुछ नामी-गिरामी जज या कानून के जानकार हों. 2-3 ऐसे लोग जो समाज के मूल्यों को समझते हों, समाज में जो बीमारियां/समस्याएं चल रही हैं उन्हें जानते हों. पूरी समाज को कैसे आगे बढ़ना चाहिए. अगर हम ऐसा कुछ क्रिएट कर देंगे तो कैंपस के बाहर लोग कैसे बिहेव करेंगे. इन सब पर उन्हें गहराई से सोचना होगा और दिमाग लगाना होगा.”

CJI ने उठाए कई सवाल

वकील विष्णु शंकर जैन सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हुए. उन्होंने रेगुलेशन 3(1)(c) में दी गई "जाति-आधारित भेदभाव" की परिभाषा का हवाला दिया. इस परिभाषा के अनुसार, जाति-आधारित भेदभाव का मतलब है, "केवल जाति या जनजाति के आधार पर अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और अन्य पिछड़े वर्गों के सदस्यों के खिलाफ भेदभाव करना". जैन ने कहा कि इस परिभाषा में सामान्य वर्ग के व्यक्तियों के खिलाफ भेदभाव को शामिल नहीं किया गया है. उन्होंने अपनी दलील देते हुए कहा कि चूंकि रेगुलेशन 3(1)(e) में पहले से ही "भेदभाव" (discrimination) की परिभाषा दी जा चुकी है, इसलिए "जाति-आधारित भेदभाव" की अलग से कोई खास परिभाषा देने की जरूरत ही नहीं थी.

CJI ने इस पर पूछा कि क्या रेगुलेशन 3(e) से सभी तरह की भेदभाव वाली स्थितियां कवर हो जाएंगी? उन्होंने कहा,

"मान लीजिए दक्षिण भारत का कोई छात्र उत्तर भारत के किसी संस्थान में एडमिशन लेता है, या इसके उलट. वहां उस छात्र के साथ तंज कसने वाले, अपमानजनक या नीचा दिखाने वाले कमेंट्स किए जाते हैं. लेकिन पीड़ित और हमलावर दोनों की जाति के बारे में कोई जानकारी नहीं है. क्या ये प्रावधान (रेगुलेशन 3(e)) ऐसी स्थिति को भी संभाल लेगा?"

इस पर जैन ने कहा कि हां, बिल्कुल ये कवर हो जाएगा.

CJI ने ये भी कहा कि अनुसूचित जातियों (Scheduled Castes) में भी ऐसे लोग हैं जो आर्थिक रूप से काफी समृद्ध हो चुके हैं. उन्होंने कहा,

"जितना हमने एक जाति-रहित समाज बनाने में हासिल किया है, क्या अब हम पीछे की ओर जा रहे हैं? क्या हम regressive हो रहे हैं?"

CJI ने सॉलिसिटर जनरल ऑफ इंडिया तुषार मेहता से ये सवाल किया. CJI ने रेगुलेशन्स में प्रस्तावित सुधारात्मक प्रावधान पर भी सवाल उठाया, जिसमें अलग-अलग जातियों के लिए अलग हॉस्टल बनाने की बात थी. वो बोले,

"भगवान के लिए ऐसा मत करो! हम सब एक साथ रहते थे. इंटर-कास्ट मैरिज भी होती हैं."

जस्टिस बागची ने जोड़ा कि "भारत की एकता" को शिक्षण संस्थानों में भी दिखना चाहिए. उन्होंने कहा,

"एक बात तो ये है कि अनुच्छेद 15(4) राज्य को SCs, STs के लिए विशेष कानून बनाने की शक्ति देता है. लेकिन अगर 2012 के रेगुलेशन्स में ज्यादा व्यापक और समावेशी नीति की बात थी, तो सुरक्षात्मक और सुधारात्मक ढांचे में ये पीछे क्यों जाना? नॉन-रिग्रेशन का सिद्धांत भी लागू होता है."

बता दें कि UGC के ये रेगुलेशन्स 2019 में सुप्रीम कोर्ट में दायर एक PIL के बाद आए थे. ये PIL राधिका वेमुला और आबेदा सलीम तड़वी (राहुल वेमुला और पायल तड़वी की माताओं) ने दाखिल की थी. दोनों छात्रों की मौत कथित तौर पर जाति-आधारित भेदभाव के कारण सुसाइड से हुई थी.

2025 की शुरुआत में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा कि वो कैंपसों में इन घटनाओं से निपटने के लिए मजबूत और ठोस व्यवस्था बनाना चाहता है. कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं और अन्य पक्षकारों को UGC के ड्राफ्ट रेगुलेशन्स में सुझाव देने की छूट दी थी. सभी सुझावों पर विचार करने के बाद UGC ने जनवरी 2026 में ये रेगुलेशन्स आधिकारिक तौर पर नोटिफाई कर दिए. जिसके बाद से इसको लेकर देशभर में विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं.

वीडियो: दी लल्लनटॉप शो: UGC नियमों का चिट्ठा खुल गया, क्या वाकई BJP फंस गई है?

Advertisement

Advertisement

()