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चाय-बिस्कुट घर ले गया तो 17 साल पुराने चपरासी को नौकरी से निकाला, अब हाई कोर्ट ने किया न्याय

Jharkhand High Court ने चाय-बिस्कुट चोरी के आरोपी कर्मचारी की बर्खास्तगी रद्द कर दी है. कोर्ट ने सजा को ज्यादा कठोर माना. हालांकि कोर्ट ने अपना फैसला पूरी तरह से चपरासी के हक में नहीं दिया है.

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विकास वर्मा
| अर्पित कटियार
30 जून 2026 (पब्लिश्ड: 11:29 AM IST)
peon fired for stealing tea and biscuits, Jharkhand High Court
हाई कोर्ट ने चाय-बिस्कुट चोरी के आरोपी कर्मचारी को बड़ी राहत दी है. (सांकेतिक फोटो: AI)
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झारखंड हाई कोर्ट ने सरकारी दफ्तर के एक कर्मचारी को नौकरी पर वापस रखने का आदेश दिया है. उसे चार साल पहले ऑफिस से चाय पत्ती और बिस्कुट चुराने के आरोप में नौकरी से निकाल दिया गया था. कोर्ट ने प्रशासन को फटकार लगाते हुए कहा कि यह सजा बहुत ज्यादा कठोर और गलत थी. 

क्या है पूरा मामला?

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, मामला झारखंड के बोकारो जिले की जिला ग्रामीण विकास एजेंसी (DRDA) का है. रणजीत कुमार हिमांशु साल 2005 से यहां कॉन्ट्रैक्ट पर चपरासी के तौर पर काम कर रहे थे. करीब 17 साल तक नौकरी करने के बाद मार्च 2022 में उन्हें कारण बताओ नोटिस मिला और दो महीने बाद नौकरी से हटा दिया गया.

लेकिन इस नोटिस में एक बड़ी खामी थी. वो ये क‍ि नोट‍िस में ये तक नहीं बताया गया था कि आखिर उन्होंने ऑफिस का कौन-सा सामान लिया था. सिर्फ इतना लिखा गया कि सरकारी सामान निजी इस्तेमाल के लिए ले लिया गया है. बाद में सुनवाई के दौरान साफ हुआ कि मामला ऑफिस में बची हुई चाय पत्ती और कुछ बिस्कुट का था. कर्मचारी की तरफ से ये भी कहा गया कि वो सामान बाद में वापस कर दिया गया था.

हिमांशु ने पहले इस फैसले को झारखंड हाई कोर्ट की सिंगल बेंच में चुनौती दी, लेकिन वहां राहत नहीं मिली. इसके बाद उन्होंने डिवीजन बेंच का दरवाजा खटखटाया. यहीं से मामले ने नया मोड़ लिया. 

कोर्ट ने विभाग पर उठाए सवाल

सुनवाई के दौरान कोर्ट ने विभाग की कार्रवाई पर एक के बाद एक कई सवाल उठाए. सबसे पहला सवाल कारण बताओ नोटिस पर था. कोर्ट ने कहा कि नोटिस इतना अस्पष्ट था कि कर्मचारी ये तक नहीं समझ सकता था कि उस पर आरोप किस बात का है. जब आरोप ही स्पष्ट नहीं होगा, तो कोई अपना बचाव कैसे करेगा? 

दूसरा सवाल विभाग की जांच प्रक्रिया को लेकर था. अदालत ने कहा कि नौकरी से निकालने के आदेश में यह कहीं नहीं बताया गया कि कर्मचारी का जवाब क्यों खारिज किया गया. विभाग ने उनके 17 साल के सर्विस रिकॉर्ड और पहले मिले प्रशंसा पत्र (Appreciation Letter) पर विचार नहीं किया. हिमांशु के वकील कृष्ण प्रजापति ने कोर्ट को बताया कि इससे पहले उनके खिलाफ कभी कोई शिकायत नहीं दर्ज हुई थी.

तीसरा और सबसे अहम सवाल सजा को लेकर था. हाई कोर्ट ने कहा कि अगर एक पल के लिए यह मान भी लिया जाए कि कर्मचारी ने चाय पत्ती और बिस्कुट लिए थे, तब भी नौकरी से निकाल देना जरूरत से कहीं ज्यादा कठोर सजा है. अदालत ने अपने फैसले में इस कार्रवाई को ‘अंतरात्मा को झकझोर देने वाली’ बताया.

नौकरी छूटने के समय रणजीत कुमार हिमांशु का मासिक वेतन सिर्फ 9,950 रुपए था. परिवार में पत्नी, तीन बेटियां और छोटी बहन है. नौकरी जाने के बाद पूरा परिवार आर्थिक संकट से गुजर रहा था. उनके वकील ने यह भी बताया कि 17 साल तक सेवा देने के बावजूद हिमांशु संविदा कर्मचारी ही बने रहे.

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नौकरी बहाली का आदेश

झारखंड हाई कोर्ट के चीफ जस्ट‍िस एमएस सोनक और जस्ट‍िस राजेश शंकर की डि‍वीजन बेंच ने 2022 के नौकरी बर्खास्तगी आदेश को रद्द कर दिया. कोर्ट ने निर्देश दिया कि रणजीत कुमार हिमांशु को 1 जुलाई तक दोबारा नौकरी पर बहाल किया जाए. साथ ही 31 जुलाई तक उन्हें 50 प्रतिशत बकाया वेतन भी दिया जाए. 

बेंच ने यह भी कहा क‍ि बहाली और बकाया भुगतान के बाद बोकारो के ड‍िप्टी कम‍िश्नर, कोर्ट में एफि‍डेव‍िट भी दाखिल करें. अदालत ने बाकी 50 प्रतिशत बकाया वेतन देने का आदेश नहीं दिया. कोर्ट का कहना था कि यही कटौती कथित गलती के लिए पर्याप्त सजा मानी जा सकती है.

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