'AI के जमाने में नई नौकरी कहां मिलेगी?' कोर्ट ने सफाईकर्मियों को बैंक से दिलवाए 40 लाख
कोर्ट ने पाया कि दोनें सफाईकर्मी दिहाड़ी पर काम कर रहे थे. वे सबसे पहले 1999 में हाई कोर्ट गए और शिकायत की थी. उनका कहना था कि कि इतने सालों तक काम करने के बावजूद, SBI ने न तो उन्हें रेगुलर किया और न ही उन्हें अस्थायी कर्मचारियों को मिलने वाले फायदे दिए.

ओडिशा हाईकोर्ट ने स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की एक ब्रांच में दिहाड़ी पर काम करने वाले दो सफाई कर्मचारियों को 40 लाख रुपये देने का आदेश बैंक को दिया है. कोर्ट ने कहा कि इन लोगों ने 30 साल तक खून-पसीना बहाकर काम किया. लगभग तीन दशक तक छोटे-मोटे काम करने के बाद AI के इस दौर में उन्हें नई नौकरी मिलने की संभावना कम है. ऐसे में कोर्ट ने बैंक को उन्हें रेगुलर नौकरी देने के बजाय हर एक को 20 लाख रुपये देने का निर्देश दिया है.
30 साल तक किया कामइस मामले में SBI में 30 साल तक दिहाड़ी पर सफाई कर्मचारी के तौर पर काम करने वाले दो लोगों मायाधर नायक और बैना नायक ने हाईकोर्ट में अपील की थी. इन दोनों ने भुवनेश्वर में SBI की सरकारी ट्रेजरी ब्रांच में लगभग 30 साल तक काम किया था. इन्होंने रेगुलराइजेशन, बोनस, बकाया राशि और सर्विस से जुड़े दूसरे फायदों के लिए अपनी मांग खारिज करने वाले सिंगल जज के 20 जून, 2025 के फैसले के खिलाफ अपील की थी. हाईकोर्ट में इनकी याचिका पर जस्टिस कृष्णा एस दीक्षित और जस्टिस चित्तरंजन दास की डिवीजन बेंच ने सुनवाई की. कोर्ट ने कहा,
अपील करने वाले जिन्होंने अपना खून-पसीना बहाया है, वे अपनी बढ़ती उम्र में कहीं और अच्छी नौकरी नहीं ढूंढ सकते. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के दौर में, हमें यकीन नहीं है कि वे अपनी आजीविका चला पाएंगे, क्योंकि उन्होंने इतने सालों तक अपनी जवानी का सबसे अच्छा समय छोटे-मोटे काम में बिताया है.
जजों ने कहा कि बैंक की ओर से हर एक को 5 लाख रुपये देने का प्रस्ताव बहुत ही कम था. खासकर ऐसे समय में जब खून से ज्यादा महंगी रोटी हो गई है.
1990 से चल रहा है मामलाइंडियन एक्सप्रेस के रिपोर्ट के मुताबिक, यह विवाद 1990 के दशक का है. उस समय मायाधर और बैना नायक को दिहाड़ी पर सफाईकर्मी के तौर पर रखा गया था. 1999 से इस मामले में कानूनी पेच शुरू हुआ. लंबी कानूनी लड़ाई और हाई कोर्ट के पहले के आदेशों के बावजूद उन्हें न नौकरी पर रखा गया. न ही न्यूनतम वेतन दिया गया. उन्हें कभी रेगुलर नहीं किया गया और आखिरकार जुलाई 2025 में उन्हें नौकरी से निकाल दिया गया. इसके बाद दोनों ने कोर्ट में अपील की.
कोर्ट ने पाया कि मायाधर और बैना 1994 और 1995 से दिहाड़ी सफाईकर्मी के तौर पर काम कर रहे थे. वे सबसे पहले 1999 में हाई कोर्ट गए और शिकायत की थी. उनका कहना था कि इतने सालों तक काम करने के बावजूद SBI ने न तो उन्हें रेगुलर किया और न ही उन्हें अस्थायी कर्मचारियों को मिलने वाले फायदे दिए. इसके बाद जुलाई 2007 में हाईकोर्ट ने बैंक को निर्देश दिया कि अगर सफाईकर्मी के पद पर भर्तियां की जाती हैं तो उनके मामलों पर विचार किया जाए.
बाद में, दिसंबर 2008 में एक और याचिका का निपटारा करते हुए कोर्ट ने कहा कि जब तक काम उपलब्ध हो, उन्हें नौकरी पर बनाए रखा जाए और न्यूनतम वेतन अधिनियम के तहत सैलरी दी जाए. कोर्ट का निर्देश था तो SBI ने इसका पालन करते हुए सितंबर 2021 में दोनों को अप्रैल 2017 से जून 2021 का बकाया वेतन 1,61,619 रुपये दिए.
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बातचीत से नहीं सुलझा मामलाअपील पर फैसला करने से पहले डिवीजन बेंच ने सोचा कि बातचीत के जरिए मामला सुलझाया जाए. बेंच ने मई 2026 में बेंच ने दोनों पक्षों को रेगुलराइजेशन, सर्विस बेनिफिट्स और बोनस जैसे मुद्दों पर आपसी सहमति से समझौता करने को कहा. लेकिन कोर्ट की ये कोशिश नाकाम रही. बेंच ने अपने फैसले में कहा कि SBI ने विवाद को खत्म करने के लिए वन-टाइम सेटलमेंट के तौर पर हर कर्मचारी को 5 लाख रुपये देने का प्रस्ताव दिया था. अपील करने वालों ने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया और बेंच से कहा कि अगर उन्हें 25 लाख रुपये प्रति व्यक्ति दिए जाएं तो वे खुशी-खुशी मामले को सुलझा लेंगे. बैंक के प्रस्ताव को पूरी तरह से अपर्याप्त बताते हुए बेंच ने कहा,
बैंक की ओर से मुआवजे के तौर पर दिया गया 5 लाख रुपये का प्रस्ताव इतना कम है कि उसका जिक्र करना भी ठीक नहीं है. जब रोटी खून से ज्यादा महंगी हो और आजकल रुपये की कीमत घट रही हो तो यह रकम बहुत कम है.
जजों ने पाया कि कर्मचारियों ने सिर्फ झाड़ू-पोछा करने का काम किया था. उनकी शिक्षा और सामाजिक स्थिति सीमित थी और उन्होंने बैंक की सेवा में लगभग तीन दशक बिताए थे. इसलिए उनसे कोई दूसरा रोजगार पाने की उम्मीद करना अवास्तविक था. अदालत ने कहा कि एक कोऑपरेटिव बैंक से जुड़े पिछले मामले में दिए गए 10 लाख रुपये के मुआवजे को भी सही पैमाना नहीं माना जा सकता, क्योंकि अपील करने वालों की सेवा की अवधि काफी ज्यादा थी. कोर्ट ने कहा कि SBI एक नेशनलाइज्ड बैंक है. साथ ही, अदालत ने यह भी माना कि कर्मचारियों की 25 लाख रुपये प्रति व्यक्ति की मांग कुछ ज्यादा थी.
दोनों को मिला 20 लाख मुआवजापूरा मामला देखने के बाद कोर्ट ने पाया कि इस केस में मुआवजा ही सबसे सबसे बेहतर विकल्प है. डिवीजन बेंच ने कर्मचारियों की रेगुलर होने की मांग की जगह एक बड़ी रकम मुआवजे के तौर पर देने का आदेश दिया. कोर्ट ने कहा,
हमारी राय में हर कर्मचारी को एकमुश्त 20 लाख रुपये देने से दोनों पक्षों के साथ पूरा न्याय होगा.
इसके साथ ही डिवीजन बेंच ने सिंगल जज के फैसले को रद्द कर दिया. कोर्ट ने SBI को आठ हफ्तों के अंदर यह रकम चुकाने का निर्देश दिया, जिससे कुल मुआवजा 40 लाख रुपये हो गया. बेंच ने यह भी कहा कि पेमेंट में देरी होने पर पहले महीने के लिए 1 प्रतिशत प्रति महीना और उसके बाद 2 प्रतिशत प्रति महीने की दर से ब्याज लगेगा.
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