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सुरक्षा मांगने गए कपल से इलाहाबाद HC ने कहा, 'मर्जी से शादी की तो समाज का सामना भी करें'

इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस सौरभ श्रीवास्तव की पीठ ने यह टिप्पणी की है. उन्होंने कहा कि ऐसे समय में जोड़ों को एक-दूसरे का समर्थन करना चाहिए. उन्हें खुद समाज का सामना करना सीखना चाहिए.

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16 अप्रैल 2025 (अपडेटेड: 17 अप्रैल 2025, 08:05 AM IST)
no right to security after eloping for marriage says allahabad high court
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि भाग कर शादी करने पर सुरक्षा का अधिकार नहीं. (तस्वीर-इंडिया टुडे)
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इलाहाबाद हाई कोर्ट एक बार फिर अपनी टिप्पणी को लेकर चर्चा में है. उसने कहा है कि जो युवा अपने माता-पिता की इच्छा के विरुद्ध अपनी इच्छा से विवाह करते हैं, वे ‘अधिकार के रूप में' तब तक पुलिस सुरक्षा का दावा नहीं कर सकते जब तक कि उनके जीवन और स्वतंत्रता पर कोई खतरा न हो. कोर्ट ने आगे कहा कि ऐसे समय में जोड़ों को एक-दूसरे का समर्थन करना चाहिए और खुद समाज का सामना करना सीखना चाहिए.

लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस सौरभ श्रीवास्तव की पीठ ने यह टिप्पणी की है. वह चित्रकूट की श्रेया केसरवानी और उनके पति की याचिका पर सुनवाई कर रहे थे. उन्होंने पुलिस सुरक्षा की मांग की थी. याचिका में लड़की के परिवार वालों को उसके वैवाहिक जीवन में हस्तक्षेप न करने का निर्देश देने की भी मांग की गई थी. 

सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का हवाला देते हुए कहा, "माननीय सुप्रीम कोर्ट ने लता सिंह बनाम यूपी स्टेट के मामले में कहा था कि अदालतें ऐसे युवाओं को सुरक्षा देने के लिए नहीं हैं जिन्होंने अपनी मर्जी के मुताबिक भागकर शादी की है, लिहाजा इस केस में इन्हें (याचिकाकर्ताओं) सुरक्षा प्रदान करने की कोई जरूरत नहीं है."

अदालत ने आगे कहा कि सुरक्षा की गुहार लगाने के लिए उन्हें वास्तविक खतरा होना चाहिए.

रिपोर्ट के मुताबिक कोर्ट ने आगे कहा कि मामले में ऐसा कोई तथ्य या कारण नहीं मिला जिससे लगे कि याचिकाकर्ताओं का जीवन और स्वतंत्रता खतरे में है. इस बात के कोई भी सबूत नहीं हैं. वहीं परिवार या रिश्तेदारों द्वारा किसी शारीरिक या मानसिक प्रताड़ना के भी कोई प्रमाण नहीं हैं. 

कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ताओं ने परिवार द्वारा मानसिक प्रताड़ना के ठोस सबूत नहीं दिए हैं. दूसरे पक्ष की तरफ से याचियों पर शारीरिक या मानसिक हमला करने का कोई सबूत नहीं है. उन्होंने विरोधी पक्ष के किसी आचरण को लेकर FIR दर्ज करने के लिए पुलिस को कोई अर्जी नहीं दी है, इसलिए पुलिस सुरक्षा देने का कोई केस नहीं बनता.

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कोर्ट ने कहा कि याचिका में ऐसा कोई सबूत नहीं है कि BNS की धारा 175(3) के तहत कोई कार्रवाई की गई है. कोर्ट ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ताओं ने एसपी चित्रकूट को प्रार्थना पत्र दिया है. पुलिस वास्तविक खतरे की स्थिति को देखकर कानून के मुताबिक आवश्यक कदम उठाएगी.

कोर्ट ने कहा कि यदि संबंधित पुलिस को कोई खतरा महसूस होता है, तो वह कानून के अनुसार आवश्यक कार्रवाई करेगी. कोर्ट ने आगे कहा कि यदि कोई उनके साथ मारपीट या दुर्व्यवहार करता है, तो उनकी सहायता के लिए कोर्ट और पुलिस मौजूद हैं. कोर्ट ने याचिका का निपटारा करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता अधिकार के रूप में सुरक्षा का दावा नहीं कर सकते.

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