अपने विरोधियों से “मौन” उपनाम पाने वाले मनमोहन सिंह के काम बोलते हैं!
Manmohan Singh अब नहीं रहे. अपने विरोधियों से “मौनमोहन” उपनाम पाने वाले, मनमोहन सिंह ने भारत में "लाइसेंस राज" को खत्म किया. मजबूत अर्थव्यवस्था की नींव रखी. उनके पहले बजट के बाद शेयर बाजार में उछाल आया. लेकिन 2G, राष्ट्रमंडल खेल और कोयला ब्लॉक आवंटन घोटाले ने उनके रास्तों को मुश्किल बनाया.

साल 1991, भारत में आर्थिक संकट का दौर. भारत ही नहीं दुनिया के लिए एक मुश्किल दौर. कारण था, गल्फ वॉर यानी खाड़ी युद्ध. इस साल अमेरिका ने इराक पर हमला किया. ये ऐसा पहला युद्ध था, जिसको टीवी पर लाइव दिखाया गया. इस युद्ध के कारण भारत में तेल की भारी कमी हो गई. नतीजतन क्रूड ऑयल की कीमत आसमान छूने लगी. भारत के पास पैसा नहीं था, बस काम चलाने भर ही बचा था. जाहिर है, भारत भारी इकॉनोमिक क्राइसिस का सामना कर रहा था. संकट इतना गहरा था कि भारत को चोरी-छिपे अपना सोना गिरवी रखना पड़ा.
केंद्र में नरसिम्हा राव की सरकार थी. 1991 के जून महीने में उन्होंने मनमोहन सिंह को अपना वित्त मंत्री चुना. और जुलाई महीने में रुपया सिर्फ लुढ़का ही नहीं बल्कि लोट गया. बल्कि उससे भी बुरा हुआ. रुपये का मूल्य 18 % गिर गया. मनमोहन सिंह ने इसकी जिम्मेदारी लेते हुए राव के सामने अपना इस्तीफा पेश किया. लेकिन राव ने इसे स्वीकार नहीं किया.
1991 Economic Reformउस साल का बजट मनमोहन सिंह ने तैयार किया. राव की बायोग्राफी ‘दि मैन हू रिमेड इंडिया’ में विनय सीतापति बताते हैं कि सिंह ने बजट का जो पहला ड्राफ्ट तैयार किया था, राव उससे खुश नहीं हुए. इसके बाद उन्होंने दूसरा ड्राफ्ट बनाया. 24 जुलाई को सिंह ने अपना बजट भाषण दिया. इस बजट में कुछ बड़े फैसले लिए गए.
- आयात शुल्क को 300% से घटाकर 50% कर दिया गया.
- सीमा शुक्ल को 220% से घटाकर 150% कर दिया गया.
- आयात के लिए लाइसेंस प्रक्रिया को आसान बनाने का प्रावधान भी इस बजट में था.
- बजट में उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण यानी LPG (लिबरलाइजेशन, प्राइवेटाइजेशन और ग्लोबलाइजेशन) की बात की गई थी.
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इस बजट को उनके समर्थक और आलोचक दोनों ही सराहते हैं. लेकिन ये इतना आसान भी नहीं था. सरकार के सभी लोग इससे संतुष्ट नहीं थे. मसलन कि खुद राव भी इसको लेकर आशंका में थे. मनमोहन सिंह ने जब उनको इस बात का भरोसा दिलाया तो राव ने कहा,
“अगर सब ठीक रहा तो हम इसका क्रेडिट मिलकर लेंगे. लेकिन अगर चीजें सही नहीं हुई तो मैं सारा ठीकरा तुम्हारे सिर फोड़ दूंगा”
इसके अलावा विपक्ष ने भी संसद में खूब बवाल काटा. लेकिन ऐसी तमाम बातों को धता बताते हुए सिंह की नीति ने कमाल कर दिया. 1991 में भारत की अर्थव्यवस्था थी, 266 बिलियन डॉलर. अगले 30 सालों में ये 4 ट्रिलियन के आंकड़े को छू गई. अर्थशास्त्रियों ने इतिहास को दो चरणों में बांट दिया. एक 1991 के पहले और एक उसके बाद. लेकिन ये बातें सिर्फ अर्थशास्त्रियों या राजनेताओं तक ही सीमित नहीं रहीं. आम लोगों ने भी राहत महसूस की. कुख्यात "लाइसेंस राज" खत्म हो गया. केबल टीवी आया, फोन का इस्तेमाल आम हो गया, प्राइवेट बैंक खुले, जेट एयरवेज और सहारा एयरलाइंस के आने से आम आदमी हवाई उड़ान के बारे में ‘कम से कम सोच’ सकता था.
वित्त मंत्री बनने से पहले मनमोहन सिंह 1972 से 1976 तक भारत सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार रह चुके थे. 1982 से 1985 तक भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर रहे. और 1985 से 1987 तक योजना आयोग के अध्यक्ष रहे थे.
मनमोहन सिंह: प्रधानमंत्री2004 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को सबसे अधिक सीटें आईं. NDA का कार्यकाल खत्म हुआ और UPA का गठन हुआ. कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार चुना. ये जानते हुए कि उन्होंने प्रत्यक्ष रूप से कोई बड़ा चुनाव नहीं जीता था. हालांकि, उनकी छवि एक स्वच्छ और ईमानदार राजनेता की थी इसलिए उन्हें स्वीकार किया गया. 22 मई 2004 को उन्होंने भारत के प्रधानमंत्री पद की शपथ ली. और 2009 में भी प्रधानमंत्री बनें. अर्थव्यवस्था की नीति में सुधार लाने वाले सिंह अब विदेश नीति पर काम में लग गए.
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Nuclear Civil Dealराजनीतिक दलों के कड़े विरोध के बावजूद सिंह ने भारत-अमेरिका असैन्य परमाणु समझौते को आगे बढ़ाया. 2008 के इस समझौते से भारत को परमाणु उर्जा की जरूरतों को पूरा करने में अमेरिका का सहयोग मिला. लेकिन इसके कारण मनमोहन सिंह घेर लिए गए. तत्कालीन राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम की मदद से कुछ पार्टियों को मनाया गया. लेकिन विपक्षी दलों ने तो हंगामा किया ही वाम दलों ने भी सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया. मनमोहन फिर भी अड़े रहे. नतीजतन, सिंह की सरकार को विश्वास की परीक्षा से गुजरना पड़ा और वो 275-256 मतों से जीत गई.
सिंह और तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश ने 18 जुलाई 2005 को समझौते की रूपरेखा पर एक संयुक्त घोषणा की. और ये औपचारिक रूप से अक्टूबर 2008 में लागू हुआ. परमाणु समझौते पर सिंह ने जो कड़ा रुख अपनाया, उससे भारत-अमेरिका संबंध घनिष्ठ हुए. उन्होंने भारत को परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में सर्वोच्च स्थान दिलाया. इसके बाद जिस तरह सिंह ने 2008 की आर्थिक मंदी के दौरान देश को संभाला, चुनाव में लोगों ने उन्हें इनाम दिया.
सिंह ने बेहतर नीतियां तो बनाई ही लेकिन अपने ही नेताओं की पुरानी नीतियों की आलोचना करने में संकोच नहीं किया. उनके पहले बजट ने भारत के आधुनिक शेयर बाजार में उछाल की नींव रखी थी. क्योंकि उन्होंने निवेशकों के हितों की रक्षा के लिए भारतीय प्रतिभूति विनिमय बोर्ड (SEBI) के गठन की घोषणा की थी.
मनमोहन के अपने कार्यकाल के अधिकांश समय में देश की GDP 8.5 प्रतिशत के आसपास रही. लेकिन 2G, राष्ट्रमंडल खेल और कोयला ब्लॉक आवंटन घोटाले ने उनके रास्तों को मुश्किल बनाया.
इसके अलावा सिंह को राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (NREGA), सूचना का अधिकार (RTI), आधार योजना, डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT) और किसान कर्ज माफी के लिए भी जाना जाता है.
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Manmohan Singh: एक कमजोर प्रधानमंत्री?मनमोहन सिंह ने 1991 में अपने बजट भाषण को इस तरह से खत्म किया,
“धरती पर कोई भी ताकत उस विचार को नहीं रोक सकती जिसका समय आ गया है. मैं इस सदन को सुझाव देता हूं कि विश्व में एक प्रमुख आर्थिक शक्ति के रूप में भारत का उदय ऐसे ही विचारों में से एक है.”
मनमोहन सिंह के कार्यकाल के कई सालों बाद दुनिया की नजर भारतीय बाजार पर पहले से ज्यादा केंद्रित है. भारत दुनिया भर की अर्थव्यवस्था का प्रमुख केंद्र बन गया है.
अपने विरोधियों से “मौनमोहन” उपनाम पाने वाले, सिंह अपने बारे में एक ईमानदार विचार रखते थे. प्रधानमंत्री पद छोड़ने से कुछ महीने पहले जनवरी 2014 में उन्होंने कहा था,
“मैं नहीं मानता कि मैं एक कमजोर प्रधानमंत्री रहा हूं. मैं ईमानदारी से मानता हूं कि इतिहास मेरे प्रति, मीडिया या विपक्ष की तुलना में अधिक दयालु होगा. राजनीतिक मजबूरियों को देखते हुए, मैंने वो सर्वश्रेष्ठ किया है जो मैं कर सकता था.”
मनमोहन सिंह अब नहीं रहे. 26 दिसंबर 2024 को दिल्ली स्थित AIIMS में उन्होंने अंतिम सांस ली.
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