महिलाओं की कॉमन प्रॉब्लम PCOS को 'PMOS' क्यों किया गया?
PCOS का नाम बदलने के लिए पिछले चौदह साल से कोशिशें हो रही थीं. इसके लिए बहुत बड़ी और गंभीर प्रक्रिया चलाई गई. कई डॉक्टर्स, रिसर्चर्स, पेशेंट्स और छप्पन संस्थाओं ने मिलकर काम किया. साढ़े 14 हज़ार से ज़्यादा लोगों की राय ली गई. इसमें PCOS से पीड़ित महिलाएं और अलग-अलग देशों के डॉक्टर व हेल्थ प्रोफेशनल्स शामिल थे.

महिलाओं से जुड़ी एक बहुत ही कॉमन प्रॉब्लम है PCOS. यानी पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम. अब इसी PCOS का नाम बदलकर PMOS कर दिया गया है. PMOS यानी पॉलीएंडोक्राइन मेटाबॉलिक ओवरी सिंड्रोम. नाम बदलने का ऐलान 12 मई 2026 को प्राग में हुआ. यूरोपियन कांग्रेस ऑफ एंडोक्रिनोलॉजी की मीटिंग में. इससे जुड़ी जानकारी मेडिकल जर्नल The Lancet में छपी है.
PCOS का नाम बदलने के लिए पिछले चौदह साल से कोशिशें हो रही थीं. इसके लिए बहुत बड़ी और गंभीर प्रक्रिया चलाई गई. कई डॉक्टर्स, रिसर्चर्स, पेशेंट्स और छप्पन संस्थाओं ने मिलकर काम किया. साढ़े 14 हज़ार से ज़्यादा लोगों की राय ली गई. इसमें PCOS से पीड़ित महिलाएं और अलग-अलग देशों के डॉक्टर व हेल्थ प्रोफेशनल्स शामिल थे.
दुनियाभर में हर 8 में से 1 महिला PMOS से जूझती है. ये कोई नई बीमारी नहीं है. ये वही कंडीशन है, जिसे पहले PCOS कहा जाता था. लेकिन इसका नया नाम रखने की ज़रूरत क्यों पड़ी? PCOS और PMOS का मतलब क्या है? क्या PMOS में कुछ नए लक्षण जोड़े गए हैं? और PMOS का इलाज कैसे होगा? ये सारे सवाल हमने पूछे अपोलो हॉस्पिटल्स, बेंगलुरु में कंसल्टेंट ऑब्स्टेट्रिशियन एंड गायनेकोलॉजिस्ट, डॉ. साहना के.पी. से.

डॉक्टर साहना कहती हैं कि PCOS शब्द को भ्रम फैलाने वाला माना जाता था. क्योंकि इससे ऐसा लगता था, जैसे ओवरी यानी अंडाशय में सिस्ट होना ही इस बीमारी की सबसे अहम पहचान है. सिस्ट एक तरह की गांठें होती हैं. लेकिन हकीकत ये है कि PCOS से पीड़ित कई महिलाओं की ओवरी में सिस्ट होते ही नहीं हैं. जो छोटे-छोटे दाने अल्ट्रासाउंड में दिखते हैं, वो असल में Immature Egg Follicles यानी अधपके अंडाणु होते हैं. जो हॉर्मोन्स के असंतुलन की वजह से पूरी तरह विकसित नहीं हो पाते. अब इस गलतफहमी की वजह से कई बार PCOS पहचानने में देरी होती थी. क्योंकि कई बार महिलाओं को सिर्फ इसलिए PCOS नहीं माना जाता था. क्योंकि उनके स्कैन नॉर्मल आते थे.
इसके अलावा, PCOS नाम की वजह से ये सिर्फ फर्टिलिटी से जुड़ी दिक्कत लगती थी. जबकि असल में ये हॉर्मोन और शरीर के मेटाबॉलिज़्म से जुड़ी जटिल बीमारी है. जो पूरे शरीर पर असर डालती है. इसलिए PCOS का नाम बदलकर PMOS किया गया.
PCOS शब्द सिर्फ ओवरीज़ यानी अंडाशय पर फोकस करता था. जबकि PMOS इस कंडीशन की एक बड़ी तस्वीर दिखाता है. PMOS में P का मतलब है- पॉलीएंडोक्राइन. पॉली यानी कई. और एंडोक्राइन यानी हॉर्मोन बनाने वाली ग्रंथियां. तो पॉलीएंडोक्राइन का मतलब हुआ कि इस कंडीशन में हॉर्मोन बनाने वाले कई सिस्टम शामिल हैं.
PMOS में M का मतलब है- मेटाबॉलिक. जो मेटाबॉलिज़्म से जुड़ी दिक्कतों पर ज़ोर देता है. जैसे मोटापा. टाइप-2 डायबिटीज़. हाई कोलेस्ट्रॉल. हाई बीपी. इंसुलिन रेज़िस्टेंस. फैटी लिवर और दिल की बीमारियां.
PMOS में O का मतलब ओवरी से है. यानी इसमें अभी भी ओवरी से जुड़ी दिक्कतें शामिल की गई हैं. जैसे पीरियड्स इर्रेगुलर होना. ओव्यूलेशन से जुड़ी दिक्कतें और इनफर्टिलिटी.
PMOS में S- सिंड्रोम को दर्शाता है. सिंड्रोम का मतलब है लक्षणों और संकेतों का एक समूह, जो साथ मिलकर किसी खास बीमारी की ओर इशारा करता है.
PMOS को ज़्यादा सटीक नाम माना जा रहा है, क्योंकि ये बताता है कि ये कंडीशन सिर्फ ओवरीज़ तक सीमित नहीं है. इसका असर मेटाबॉलिज़्म, हॉर्मोन्स, मेंटल हेल्थ, स्किन और लंबे समय में दिल की सेहत पर भी पड़ता है. यानी अब फोकस सिर्फ फर्टिलिटी नहीं, बल्कि ओवरऑल हेल्थ पर है.
PMOS के लक्षण वही रहेंगे, जो PCOS के थे. लेकिन अब डॉक्टर उन्हें ज़्यादा बड़े रूप में देखेंगे. PMOS के आम लक्षण हैं- इर्रेगुलर पीरियड्स आना. एक्ने होना. चेहरे और शरीर पर ज़्यादा बाल आना. बाल पतले होना या बाल झड़ना. वज़न बढ़ना. वज़न घटाने में कठिनाई होना. इनफर्टिलिटी. इंसुलिन रेज़िस्टेंस. स्किन पर गहरे धब्बे होना. लगातार थकान रहना. मूड स्विंग्स होना. एंग्ज़ायटी और डिप्रेशन होना. ठीक से नींद न आना. ब्रेन फॉग होना यानी ध्यान लगाने और सोचने में परेशानी होना.
PMOS में भले कोई नया लक्षण न जोड़ा गया हो. लेकिन ये ब्लड शुगर की गड़बड़ी, कोलेस्ट्रॉल की दिक्कत, स्लीप एपनिया, दिल की बीमारी का खतरा और मेंटल हेल्थ से जुड़ी समस्याओं को शुरू से ही ज़्यादा गंभीरता से शामिल करता है.
जहां तक बात इलाज की है, तो PMOS का फोकस सिर्फ़ पीरियड्स या फर्टिलिटी से जुड़ी दिक्कतों तक सीमित नहीं होता. बल्कि पूरी कंडीशन को मैनेज करने पर होता है. सबसे पहले लाइफस्टाइल सुधारने को कहा जाता है. यानी वज़न कंट्रोल करना. रोज़ एक्सरसाइज़ करना. हेल्दी खाना. अच्छी नींद लेना और स्ट्रेस कम करना. इससे डायबिटीज़ और दिल की बीमारियों का रिस्क कम होता है.
फिर हॉर्मोन्स का बैलेंस सुधारा जाता है. पीरियड साइकिल सही करने, एक्ने और हेयर ग्रोथ कम के लिए दवाइयां दी जाती हैं. इसके साथ ही, डॉक्टर्स ब्लड शुगर लेवल, इंसुलिन रेज़िस्टेंस, कोलेस्ट्रॉल, थायरॉइड फंक्शन और विटामिंस की कमी भी जांचते हैं. फिर जो भी दिक्कत निकलती है, उस हिसाब से दवाएं दी जाती हैं. PMOS में एंग्ज़ायटी, डिप्रेशन, अपने शरीर को लेकर परेशान होना और इमोशनल स्ट्रेस काफी आम है. इसलिए मेंटल हेल्थ सुधारना भी उपचार का अहम हिस्सा माना जाता है.
PMOS में इलाज का मकसद सिर्फ लक्षणों को कंट्रोल करना नहीं है. बल्कि आगे होने वाली कॉम्प्लिकेशंस को रोकना भी है. जैसे टाइप-2 डायबिटीज़, दिल से जुड़ी बीमारियां, इनफर्टिलिटी से जुड़ी दिक्कतें, प्रेग्नेंसी से जुड़ी जटिलताएं और एंडोमेट्रियल कैंसर.
वीडियो: सेहत: ज़्यादा पेनकिलर्स, स्टेरॉयड खाने से आंतों में सूजन हो सकती है!

