स्टेंट डलवाने के बाद भी दिल में दोबारा ब्लॉकेज कैसे हो जाता है?
दिल की धमनियों में केवल कोलेस्ट्रॉल के चलते ब्लॉकेज नहीं होता. कैल्शियम भी जमा होता है, जिसकी वजह से धमनियां ब्लॉक हो जाती हैं.

आजकल दिल की धमनी यानी कोरोनरी आर्टरी में ब्लॉकेज होना बहुत आम बात हो गई है. ख़राब खानपान, खराब आदतों और सुस्त लाइफस्टाइल की वजह से दिल की मांसपेशियों तक कम खून पहुंच रहा है. नतीजा? दिल की तमाम बीमारियां होने का रिस्क. हार्ट अटैक का रिस्क.
डराने वाली बात ये है कि दिल की धमनियों में केवल कोलेस्ट्रॉल के चलते ब्लॉकेज नहीं होता. कैल्शियम भी जमा होता है, जिसकी वजह से धमनियां ब्लॉक हो जाती हैं. ऐसा क्यों होता है, ये जानेंगे आज. साथ ही समझेंगे कि स्टेंट डलवाने के बाद भी दिल की नसों में दोबारा ब्लॉकेज क्यों हो जाता है. यहां तक कि, एक्सरसाइज़ करने वालों के दिल में भी ब्लॉकेज क्यों हो रहे हैं.
दिल की धमनियों में कैल्शियम क्यों जमता है?ये हमें बताया डॉक्टर ब्रजेश कुमार मिश्रा ने.

दिल की धमनियों में कैल्शियम जमना पुरानी बीमारी या पुराने ब्लॉकेज के मामलों में देखा जाता है. अगर किसी मरीज़ को डायबिटीज़, क्रोनिक किडनी डिज़ीज़ या किडनी से जुड़ी कोई दूसरी बीमारी है. मरीज़ को इंफ्लेमेटरी डिसऑर्डर्स, कैल्शियम के मेटाबॉलिज़्म से जुड़ी बीमारी या विटामिन D के रेगुलेशन में दिक्कत है. तब ऐसे मरीज़ों की धमनियों में कैल्शियम जमा होने का ख़तरा बढ़ जाता है.
अगर धमनियों में कैल्शियम ज़्यादा जमा हो जाए, तो ऐसे ब्लॉकेज बहुत सख़्त हो जाते हैं. ऐसे सख़्त ब्लॉकेज को तोड़ना या खोलना मुश्किल हो जाता है. ऐसे में अगर मरीज़ को एंजियोप्लास्टी की ज़रूरत पड़ती है. तब स्टेंट डालने से पहले कैल्शियम मॉडिफ़िकेशन तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है. इनमें रोटा एब्लेशन, IVL (इंट्रावैस्कुलर लिथोट्रिप्सी) और कटिंग बैलून जैसी तकनीकें शामिल हैं. कैल्शियम को सही से मॉडिफ़ाई करने के बाद ही स्टेंट डाला जा सकता है.
जिन धमनियों में कैल्शियम जमा होता है, उनमें स्टेंट थोड़ा कम असरदार होता है. इसलिए, ब्लड शुगर लेवल कंट्रोल में रखें. किडनी से जुड़ी समस्याओं को समय पर मैनेज करें. इंफ्लेमेटरी डिसऑर्डर्स को कंट्रोल में रखें. तब दिल की धमनियों में कैल्शियम को जमने से काफी हद तक रोका जा सकता है.

कई बार दिल की नसों में ब्लॉकेज, एंजाइना या एक्यूट हार्ट अटैक के दौरान स्टेंट डाला जाता है. लेकिन, कुछ मामलों में स्टेंट डलवाने के बाद भी उसी नस में दोबारा ब्लॉकेज बन जाता है. इसलिए, सेकेंडरी प्रिवेंशन बहुत ज़रूरी है. यानी जब दिल में एक बार ब्लॉकेज हो जाए या मरीज़ को हार्ट अटैक हो चुका हो. तब दोबारा उससे बचने के लिए रोकथाम करना. इसे ही सेकेंडरी प्रिवेंशन कहते हैं.
सेकेंडरी प्रिवेंशन में सबसे ज़रूरी ये जानना है कि आपको क्या-क्या करना है. कुछ रिस्क फैक्टर्स ऐसे होते हैं, जिन्हें बदला नहीं जा सकता. जैसे उम्र बढ़ना, पुरुष होना, पहले से दिल की बीमारी का इतिहास. लेकिन, कई रिस्क फैक्टर्स ऐसे हैं जिन्हें कंट्रोल किया जा सकता है. जैसे ब्लड प्रेशर, ब्लड शुगर, कोलेस्ट्रॉल और मोटापा.
अगर सुस्त लाइफस्टाइल है, तो रोज़ एक्सरसाइज़ कर सकते हैं. इसके अलावा अच्छी डाइट, योग और ध्यान करना भी मददगार होता है. इन सबसे दोबारा ब्लॉकेज बनने का रिस्क कम होता है. लेकिन, अगर कोई व्यक्ति स्मोकिंग जारी रखता है. लाइफस्टाइल में बदलाव नहीं करता, तो दोबारा ब्लॉकेज बनने का ख़तरा बढ़ जाता है.

कोरोनरी आर्टरी डिज़ीज़ के कई कारण होते हैं. इसमें जेनेटिक फैक्टर भी अहम हैं. कुछ फैक्टर्स को आप कंट्रोल नहीं कर सकते. जैसे उम्र बढ़ना, पुरुष होना, दिल की बीमारी का इतिहास होना. लेकिन, कुछ रिस्क फैक्टर्स ऐसे हैं जिन्हें कंट्रोल किया जा सकता है. जैसे हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज़, स्मोकिंग, सुस्त लाइफस्टाइल, ज़्यादा तनाव और गलत खान-पान. अगर इन बातों पर ध्यान न दिया जाए, तो मरीज़ में ब्लॉकेज हो सकता है.
जो लोग जिम जाते हैं या रोज़ एक्सरसाइज़ करते हैं, उनमें ब्लॉकेज का सबसे बड़ा कारण स्मोकिंग है. ऐसे लोगों में बनने वाले ब्लॉकेज अक्सर थ्रोम्बोटिक होते हैं यानी अचानक खून का थक्का जमने से बनने वाले ब्लॉकेज. जो ब्लॉकेज धीरे-धीरे बनते हैं, वो आमतौर पर एथेरोस्क्लेरोटिक होते हैं और समय के साथ बढ़ते हैं.
एक्सरसाइज़ करने वाले लोगों में ब्लॉकेज ज़्यादातर स्मोकिंग की वजह से देखे जाते हैं. इसलिए, जिम और एक्सरसाइज़ के अलावा लाइफस्टाइल पर ध्यान देना बहुत ज़रूरी है. ये कोरोनरी आर्टरी डिज़ीज़ की रोकथाम और इलाज के लिए सबसे ज़रूरी है.
(यहां बताई गई बातें, इलाज के तरीके और खुराक की जो सलाह दी जाती है, वो विशेषज्ञों के अनुभव पर आधारित है. किसी भी सलाह को अमल में लाने से पहले अपने डॉक्टर से ज़रूर पूछें. दी लल्लनटॉप आपको अपने आप दवाइयां लेने की सलाह नहीं देता.)
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