प्लास्टर, प्लेट या रॉड, टूटी हड्डी जोड़ने के लिए कौन सा तरीका बेस्ट है?
आज डॉक्टर से जानेंगे कि हड्डी टूटने पर रॉड या प्लेट क्यों लगाई जाती है. प्लास्टर, रॉड और प्लेट में क्या फर्क है. प्लेट कब लगाते हैं और रॉड कब. और क्या बाद में प्लेट या रॉड निकलवानी पड़ती है.

शरीर में कहीं फ्रैक्चर होता है. कोई हड्डी टूटती है, तो डॉक्टर सबसे पहले प्लास्टर करते हैं. लेकिन अगर हड्डी अपनी जगह से बहुत ज़्यादा खिसक जाए, तब प्लेट या रॉड लगाने की ज़रूरत पड़ सकती है. यहीं होती है सबसे ज़्यादा कन्फ्यूज़न. आखिर प्लेट कब लगती है, रॉड कब डलवाएं? अगर लगवा रहे हैं, तो कौन-सी रॉड या प्लेट बेहतर है?
आपके इन्हीं सवालों के जवाब आज डॉक्टर से जानेंगे कि हड्डी टूटने पर रॉड या प्लेट क्यों लगाई जाती है. प्लास्टर, रॉड और प्लेट में क्या फर्क है. प्लेट कब लगाते हैं और रॉड कब. और क्या बाद में प्लेट या रॉड निकलवानी पड़ती है.
हड्डी टूटने पर रॉड और प्लेट क्यों लगाई जाती है?ये हमें बताया डॉक्टर साइमन थॉमस ने.

हमारी हड्डी एक सिंगल पीस की तरह होती है. जब हड्डी टूट जाती है, तो उसमें मूवमेंट आ जाती है और वो अस्थिर हो जाती है. रॉड या प्लेट डालने का काम ठीक वैसा ही है, जैसे मोतियों को धागे में पिरोकर एक लाइन में रखा जाता है. रॉड या प्लेट हड्डी के टूटे हुए टुकड़ों को सही अलाइनमेंट में ले आती है. इसके बाद हड्डी को जोड़ने का काम शरीर अपनेआप करता है. रॉड या प्लेट का मकसद होता है कि फ्रैक्चर के दोनों हिस्सों को पास लाया जाए. उन्हें एक स्थिर (स्टेबल) कंडीशन में रखा जाए. अगर उनमें ज़्यादा मूवमेंट होगी, तो हड्डी ठीक से नहीं जुड़ेगी.
पहले के समय में प्लास्टर देने के पीछे भी यही सोच होती थी. प्लास्टर लगाने से फ्रैक्चर वाला हिस्सा इमोबिलाइज़ यानी लगभग स्थिर हो जाता था. इससे हड्डी के बीच में कैलस फॉर्मेशन होती है, यानी हड्डी जुड़ने की नेचुरल प्रक्रिया शुरू होती है. कैलस एक तरह का नेचुरल ग्लू है, जो टूटी हड्डी के हिस्सों को आपस में जोड़ देता है.
प्लास्टर vs रॉड और प्लेटप्लास्टर की दिक्कत ये है कि इससे आसपास के जोड़ की मूवमेंट भी रुक जाती है. मान लीजिए किसी व्यक्ति के हाथ की हड्डी टूट गई. प्लास्टर लगाने पर पूरा हाथ कुछ समय के लिए स्थिर हो जाएगा. ऐसे में प्लास्टर की जगह रॉड या प्लेट डाल सकते हैं. इससे जोड़ों की मूवमेंट बनी रहती है, जबकि टूटी हुई हड्डी स्थिर रहती है. इससे हड्डी जुड़ते-जुड़ते हाथ का फंक्शन भी वापस आने लगता है. हड्डी को स्थिर करने का काम रॉड और प्लेट दोनों से किया जा सकता है.

जो फ्रैक्चर जोड़ के बहुत पास होते हैं, उनमें आमतौर पर प्लेट लगाई जाती है. जो फ्रैक्चर जोड़ से दूर होते हैं, उनमें रॉड का इस्तेमाल किया जाता है. ये रॉड मेडिकल-ग्रेड टाइटेनियम की बनी होती है. इसे पूरी तरह स्टेरलाइज़ करके पैक किया जाता है. एक रॉड सिर्फ़ एक ही मरीज़ के लिए इस्तेमाल होती है. ऑपरेशन के बाद मरीज़ जल्दी ही अपने जोड़ हिलाना-डुलाना शुरू कर सकते हैं. कई मामलों में बिना वज़न डाले या हल्का वज़न डालकर चलना-फिरना भी शुरू किया जा सकता है.
क्या प्लेट या रॉड निकलवाने की ज़रूरत पड़ती है?इस तरह की सर्जरी करवाने वाले 100 में से लगभग 99 मरीज़ों को बाद में प्लेट या रॉड निकलवाने की ज़रूरत नहीं पड़ती. इम्प्लांट की वजह से परेशानी होने के चांस भी बहुत कम होते हैं. टाइटेनियम रॉड या प्लेट लगने के बाद भी शरीर के किसी भी हिस्से की MRI कराई जा सकती है. आजकल कुछ मेडिकल-ग्रेड स्टेनलेस स्टील इम्प्लांट भी आते हैं, जिन्हें LVM स्टील कहा जाता है. इनके साथ भी MRI कराना सुरक्षित माना जाता है.
एयरपोर्ट सिक्योरिटी चेक में कभी-कभी मेटल डिटेक्टर बीप कर सकता है. इसलिए मरीज़ों को एक मेडिकल सर्टिफिकेट दिया जाता है. जिससे सिक्योरिटी स्टाफ को पता चल जाता है कि शरीर में रॉड या प्लेट लगी हुई है. रॉड लगेगी या प्लेट, ये फ्रैक्चर के प्रकार और उसकी जगह पर निर्भर करता है. रॉड या प्लेट लगाना एक सुरक्षित प्रक्रिया मानी जाती है. ज़्यादातर लोगों को बाद में इम्प्लांट निकलवाने की ज़रूरत नहीं पड़ती.
(यहां बताई गई बातें, इलाज के तरीके और खुराक की जो सलाह दी जाती है, वो विशेषज्ञों के अनुभव पर आधारित है. किसी भी सलाह को अमल में लाने से पहले अपने डॉक्टर से ज़रूर पूछें. दी लल्लनटॉप आपको अपने आप दवाइयां लेने की सलाह नहीं देता.)
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