दिनभर सोए फिर भी आती है नींद, कहीं नार्कोलेप्सी तो नहीं
जिन लोगों को भी नार्कोलेप्सी बीमारी होती है, वो कहीं भी सो सकते हैं. खाना खाते हुए. बात करते हुए. गाड़ी चलाते हुए. कहीं भी, कभी भी. इन लोगों को नींद के ऐसे अटैक पड़ते हैं. जिसे वो चाहकर भी रोक नहीं पाते.

एक 42 साल का आदमी. बड़ा परेशान. वजह- नींद. इस नींद के चक्कर में उसके बहुत एक्सीडेंट हुए. खूब चोटें लगीं. कई बार हॉस्पिटल जाना पड़ा. और ऐसा नहीं था कि इस आदमी की नींद पूरी नहीं होती थी. वो रोज़ 7 से 8 घंटे, या इससे ज़्यादा ही सोता था. पर फिर भी वो हमेशा नींद में ही रहता. ऐसा उसके साथ बचपन से था. किसी आदत की तरह नींद उसके साथ चिपकी हुई थी. टेंशन में है, नींद आ गई. टेंशन दूर, फिर नींद आ गई. जब एक रोड एक्सीडेंट के बाद डॉक्टर ने उसकी ये बातें सुनीं, तो कुछ मेडिकल टेस्ट कराए. पता चला कि इस आदमी को नार्कोलेप्सी नाम की बीमारी है.
ये केस स्टडी छपी है क्यूरियस जर्नल ऑफ मेडिकल साइंस में.
जिन लोगों को भी नार्कोलेप्सी बीमारी होती है, वो कहीं भी सो सकते हैं. खाना खाते हुए. बात करते हुए. गाड़ी चलाते हुए. कहीं भी, कभी भी. इन लोगों को नींद के ऐसे अटैक पड़ते हैं. जिसे वो चाहकर भी रोक नहीं पाते. आज इसी बीमारी के बारे में हम आपको बताएंगे. डॉक्टर से जानेंगे कि नार्कोलेप्सी क्या है. ये क्यों होती है. इसके मुख्य लक्षण क्या हैं. ये शरीर के किन-किन हिस्सों पर असर डालती है. नार्कोलेप्सी की जांच कैसे होती है. इसका इलाज क्या है और इसे कंट्रोल कैसे करें.
नार्कोलेप्सी क्या है? ये क्यों होता है?ये हमें बताया डॉक्टर नमिता कौल ने.

नार्कोलेप्सी एक न्यूरोलॉजिकल स्लीप डिसऑर्डर है. इसमें दिमाग को समझने में दिक्कत होती है कि शरीर को कब सोना है और कब जागना है. इसका एक बड़ा कारण दिमाग में ओरेक्सिन नाम के केमिकल की कमी होना है. ओरेक्सिन हमें जागे रहने में मदद करता है. इसकी कमी होने पर दिमाग सही तरीके से ये सिग्नल नहीं दे पाता कि कब सोना है और कब जागना है. नार्कोलेप्सी के पीछे ऑटोइम्यून और जेनेटिक कारण सबसे आम माने जाते हैं. ओरेक्सिन केमिकल क्यों नहीं बनता और इसके सेल्स खत्म क्यों हो जाते हैं, इसका साफ़ कारण अभी पता नहीं चल सका है. हालांकि, इसे आमतौर पर ऑटोइम्यून डिसऑर्डर से जुड़ी बीमारी माना जाता है.
नार्कोलेप्सी के मुख्य लक्षणनार्कोलेप्सी के चार मुख्य लक्षण होते हैं. नार्कोलेप्सी का पहला लक्षण दिन में बहुत ज़्यादा नींद आना है. व्यक्ति दिन में बार-बार झपकियां लेता है, उसे खूब नींद आती है. ये नींद व्यक्ति के कंट्रोल में नहीं होती और उसके रुटीन पर असर डालती है. इसे नार्कोलेप्सी का सबसे ज़रूरी लक्षण माना जाता है. बाकी तीन लक्षण हर मरीज़ में हों, ये ज़रूरी नहीं है.
दूसरा अहम लक्षण है कैटैप्लेक्सी. इसमें शरीर की मांसपेशियों में अचानक कमज़ोरी आ जाती है. ये कमज़ोरी कुछ सेकंड से लेकर एक मिनट तक रह सकती है. ये अक्सर अचानक आए किसी इमोशन से ट्रिगर होती है. जैसे बहुत हंसी आना, मज़ाक होना या किसी बात से ज़्यादा इमोशनल हो जाना. इनसे कैटैप्लेक्सी ट्रिगर हो सकती है. कैटैप्लेक्सी का एक असामान्य लक्षण ये भी हो सकता है कि अचानक घुटने मुड़ जाएं या शरीर में कमज़ोरी महसूस होने लगे. कई बार अचानक गर्दन झुक जाती है, जिसे नेक ड्रॉप कहते हैं. कुछ लोगों में पलकों का झुक जाना भी देखा जाता है. कई मरीज़ों को ये लक्षण समझने में सालों लग जाते हैं. कैटैप्लेक्सी को नार्कोलेप्सी टाइप-1 का एक बहुत अहम लक्षण माना जाता है.
तीसरा लक्षण हैं स्पष्ट सपने. इसे हिप्नोगॉगिक या हिप्नोपोमिक हैलुसिनेशन भी कहते हैं. यानी सोते समय या नींद से जागते वक्त सपना और हकीकत के बीच जैसा अनुभव होना. कई बार व्यक्ति को समझ नहीं आता कि जो महसूस हुआ वो सपना था या सच. जैसे कई बार आप नींद में होते हैं और अचानक आपकी नींद खुल जाती है, क्योंकि आपको लगता है कि दरवाज़े की घंटी बजी है. इसे ही हिप्नोपोमिक हैलुसिनेशन कहते हैं. ये एक आम लक्षण है, किसी को भी हो सकता है. पर अगर ऐसा बार-बार हो रहा है, तो ये नार्कोलेप्सी का संकेत हो सकता है.
नार्कोलेप्सी का चौथा अहम लक्षण स्लीप पैरालिसिस है. इसमें व्यक्ति नींद से जागते समय कुछ सेकंड या करीब एक मिनट तक खुद को पैरालाइज़ महसूस करता है. उसे घुटन महसूस होती है और वो हिल नहीं पाता है. ये स्थिति आमतौर पर एक मिनट से ज़्यादा नहीं रहती. इसके बाद व्यक्ति अचानक पूरी तरह जाग जाता है. इसे स्लीप पैरालिसिस कहते हैं. स्लीप पैरालिसिस और हिप्नोपोमिक हैलुसिनेशन जैसे लक्षण नींद की कमी होने से कुछ लोगों को हो सकते हैं. लेकिन अगर ये बार-बार होने लगें, तो ये नार्कोलेप्सी का संकेत हो सकता है.

नार्कोलेप्सी सिर्फ ज़्यादा नींद आने की बीमारी नहीं है. इसका असर व्यक्ति की पूरी जिंदगी पर पड़ सकता है. नार्कोलेप्सी से व्यक्ति आत्मविश्वास, मेंटल हेल्थ, मूड, रिश्ते और करियर सब प्रभावित हो सकता है. इसलिए इसकी पहचान करना बहुत ज़रूरी है. नार्कोलेप्सी के मरीज़ों में मोटापा भी आमतौर पर देखा जाता है. ये सिर्फ स्लीप डिसऑर्डर नहीं है, बल्कि ये पूरी ज़िंदगी को प्रभावित करता है. दिन में बार-बार नींद आने की वजह से फोकस, याद्दाश्त, गाड़ी चलाने और रोज़ के कामों पर असर पड़ सकता है.
नार्कोलेप्सी की जांच और इलाजनार्कोलेप्सी में सबसे बड़ी चुनौती इसकी सही पहचान करना है. कई बार लोगों को इसका पता चलने में सालों लग जाते हैं. ये बीमारी आमतौर पर 10 से 35 साल के लोगों में ज़्यादा देखी जाती है. अक्सर लोगों को लगता है कि व्यक्ति मोबाइल ज़्यादा चला रहा है या रात में ठीक से सो नहीं रहा है. इसलिए लंबे समय तक मरीज़ को सिर्फ सलाह दी जाती रहती है और बीमारी की पहचान नहीं हो पाती. कई मरीजों में एंग्ज़ायटी जैसी दिक्कतें भी देखने को मिलती हैं. नार्कोलेप्सी की पहचान मरीज की हिस्ट्री और स्लीप स्टडी के ज़रिए की जाती है.
स्लीप स्टडी में दो चरण होते हैं. पहला है पॉलीसोम्नोग्राफी, जिसमें रात के समय नींद की जांच की जाती है. दूसरा टेस्ट अगले दिन किया जाता है, जिसे MSLT यानी मल्टीपल स्लीप लेटेंसी टेस्ट कहते हैं. इन टेस्ट्स से नार्कोलेप्सी की पुष्टि की जा सकती है. कुछ रेयर मामलों में, जब साफ़ डायग्नोसिस नहीं हो पाता. तब CSF यानी दिमाग और स्पाइनल कॉर्ड के फ्लूइड की जांच की जाती है. इसमें ओरेक्सिन के लेवल चेक किए जाते हैं. अगर समय पर बीमारी की पहचान हो जाए, तो इसका इलाज संभव है.
इलाज का पहला हिस्सा दवाइयां होती हैं. स्लीप हाइजीन सुधारना भी ज़रूरी है. मरीज़ को तय समय पर सोने और जगने को कहा जाता है. ये तरीके नार्कोलेप्सी के लक्षणों को कंट्रोल करने में काफी मदद करते हैं. डॉक्टर की निगरानी में इस बीमारी को लंबे समय तक अच्छी तरह मैनेज किया जा सकता है.
(यहां बताई गई बातें, इलाज के तरीके और खुराक की जो सलाह दी जाती है, वो विशेषज्ञों के अनुभव पर आधारित है. किसी भी सलाह को अमल में लाने से पहले अपने डॉक्टर से ज़रूर पूछें. दी लल्लनटॉप आपको अपने आप दवाइयां लेने की सलाह नहीं देता.)
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