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खराब पेरेंटिंग से होता है ऑटिज़्म, कहीं ऑटिज़्म से जुड़े मिथकों को आप भी तो सच नहीं मानते?

ऑटिज़्म एक जन्मजात कंडिशन है. इसे ऑटिज़्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर भी कहा जाता है. ऑटिज़्म के लक्षण हल्के से लेकर गंभीर तक हो सकते हैं.

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myths related to autism in hindi
मां-बाप के डांटने से ऑटिज़्म नहीं होता है
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अदिति अग्निहोत्री
28 जनवरी 2025 (अपडेटेड: 28 जनवरी 2025, 03:07 PM IST)
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आपने ऑटिज़्म के बारे में सुना है? ये एक डेवलपमेंटल कंडिशन है. जिसकी वजह से लोगों के व्यवहार, उनके सीखने की क्षमता और दूसरों से बातचीत करने के तरीके पर असर पड़ता है. यानी इससे पीड़ित लोगों को दूसरों से बातचीत करने में परेशानी होती है. वो आंख से आंख मिलाकर बात नहीं कर पाते. बार-बार एक ही बात को रिपीट करते हैं. या एक ही कम लगातार करते रहते हैं. इसके अलावा, रोशनी, आवाज़ या टच उन्हें परेशान कर सकता है. 

ऑटिज़्म एक जन्मजात कंडिशन है. इसे ऑटिज़्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर यानी ASD भी कहा जाता है. ऑटिज़्म के लक्षण हल्के से लेकर गंभीर तक हो सकते हैं. अब ऑटिज़्म को लेकर कई सारे मिथ चलते रहते हैं. इससे जुड़े कुछ खास मिथकों के बारे में हमें बताया डॉक्टर हिमानी नरुला ने. 

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डॉ. हिमानी नरुला, डेवलपमेंटल एंड बिहेवियरल पेडियाट्रिशियन, डायरेक्टर एंड को-फाउंडर, कंटीनुआ किड्स

पहला मिथ, ऑटिज़्म एक बीमारी है. डॉक्टर हिमानी कहती हैं कि ऑटिज़्म कोई बीमारी नहीं है. ये एक तरह की कंडिशन है. विज्ञान की भाषा में कहें तो न्यूरो-डेवलपमेंटल डिसऑर्डर. ऑटिस्टिक होने का मतलब ये नहीं है कि व्यक्ति बीमार है. बल्कि इसका मतलब है कि उनके दिमाग का विकास और काम करने का तरीका दूसरों से अलग है. हां, उन्हें दूसरों से बातचीत करने, कुछ समझने या बर्ताव करने में थोड़ी दिक्कतें आ सकती हैं. लेकिन, वो पूरी तरह स्वस्थ होते हैं. और, एक अच्छी ज़िंदगी जी सकते हैं. 

दूसरा मिथ, ऑटिज़्म खराब पेरेंटिंग की वजह से होता है. ये बात बिल्कुल भी सही नहीं है. ऑटिज़्म होने का सटीक कारण अभी तक पता नहीं चल सका है. लेकिन, ये जेनेटिक वजहों और इनवायरमेंटल फैक्टर्स की वजह से हो सकता है. इसमें खराब पेरेंटिंग का कोई रोल नहीं है. मगर ये खराब पेरेंटिंग वाली बात आई कहां से? साल 1943 में चाइल्ड साइकेट्रिस्ट लिओ कैनर ने ‘रेफ्रिजरेटर मदर थ्योरी’ दी थी. इसके मुताबिक, जब मां भावनात्मक रूप से बच्चे की उपेक्षा करती है, तब बच्चा ऑटिस्टिक हो जाता है. हालांकि, ये थ्योरी पूरी तरह से फर्जी है. ऑटिज़्म खराब पेरेंटिंग की वजह से नहीं होता.

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किसी भी तरह की वैक्सीन से ऑटिज़्म नहीं होता है

तीसरा मिथ, ऑटिज़्म बचपन में दी जाने वाली वैक्सीन की वजह से होता है. डॉक्टर हिमानी कहती हैं कि इस बात का कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है. दरअसल, लेट 90s में एक जर्नल में एक रिसर्च पेपर छपा. इसमें वैक्सीन और ऑटिज़्म के बीच एक संबंध दिखाने की कोशिश की गई. फिर जब इस रिसर्च को जांचा गया तो पता चला कि इसमें अपनाई गई प्रक्रिया ‘रिसर्च के मानकों’ पर खरी नहीं उतरती है. इसमें सिर्फ हवा-हवाई बातें थीं. इस रिसर्च को पूरी तरह खारिज कर दिया गया और रिसर्चर का मेडिकल लाइसेंस भी छीन लिया गया. यानी ऑटिज़्म किसी वैक्सीन को लगवाने की वजह से नहीं होता है. 

चौथा मिथ, ऑटिज़्म ठीक हो सकता है. ये बात सही नहीं है. ऑटिज़्म पूरे जीवन रहने वाली कंडीशन है. इसका कोई इलाज नहीं है. हालांकि कई सारी थेरेपीज़ हैं. जिन्हें देकर मरीज़ का जीवन और बेहतर बनाया जा सकता है. जैसे बिहेवियर थेरेपी, स्पीच थेरेपी वगैरह वगैरह. बस ज़रूरी है कि ऑटिज़्म के लक्षणों को जल्दी से जल्दी पहचान लिया जाए. 

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ऑटिज़्म से जुड़े बच्चे सीखना-पढ़ना कर सकते हैं 

पांचवा मिथ, ऑटिज़्म से पीड़ित लोग कुछ सीख नहीं सकते. ये बिल्कुल भी सच नहीं है. हम सभी के सीखने-समझने की क्षमता अलग-अलग होती है. ऑटिज़्म से प्रभावित लोग भी सीख सकते हैं. हां, मगर उनके सीखने का तरीका और स्पीड दूसरों से अलग हो सकती है.

(यहां बताई गई बातें, इलाज के तरीके और खुराक की जो सलाह दी जाती है, वो विशेषज्ञों के अनुभव पर आधारित है. किसी भी सलाह को अमल में लाने से पहले अपने डॉक्टर से जरूर पूछें. ‘दी लल्लनटॉप ’आपको अपने आप दवाइयां लेने की सलाह नहीं देता.)

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