युवाओं को क्यों हो रहा स्ट्रोक? कैसे पता चले कोई इसकी चपेट में है?
स्ट्रोक तब होता है, जब दिमाग में खून की सप्लाई अचानक रुक जाती है या खून की नस फट जाती है.

‘स्ट्रोक सिर्फ बुज़ुर्गों को होता है.’ पहले ऐसा ही माना जाता था. लेकिन अब तस्वीर बदल चुकी है. आज 18 साल के युवाओं में भी स्ट्रोक के मामले सामने आ रहे हैं. Indian Council of Medical Research यानी ICMR के नए एनालिसिस के मुताबिक, देश में हर 7 में से 1 स्ट्रोक पेशेंट 18 से 44 साल के बीच है. यानी स्ट्रोक अब युवाओं में भी तेज़ी से बढ़ रहा है. स्ट्रोक तब होता है, जब दिमाग में खून की सप्लाई अचानक रुक जाती है या खून की नस फट जाती है. ICMR की रिपोर्ट ये भी बताती है कि करीब 5 में से 2 मरीज़ लक्षण शुरू होने के 24 घंटे बाद ही अस्पताल पहुंचते हैं. इतनी ज़्यादा देरी रिकवरी को और मुश्किल बना देती है. पर सबसे बड़ा सवाल तो यही है कि आखिर युवाओं में स्ट्रोक के मामले बढ़ क्यों रहे हैं.
आज डॉक्टर से जानेंगे युवाओं में स्ट्रोक के मामले बढ़ने की वजहें. ये भी पता करेंगे कि स्ट्रोक होने से पहले कौन-से लक्षण दिखते हैं. स्ट्रोक होने के बाद शुरुआती कुछ घंटों में क्या करें. स्ट्रोक का इलाज क्या है और इससे बचाव कैसे करें.
युवाओं में स्ट्रोक के मामले क्यों बढ़ रहे हैं?ये हमें बताया डॉक्टर प्रवीण गुप्ता ने.

युवाओं में स्ट्रोक के मामले तेज़ी से बढ़ रहे हैं. ये बहुत चिंता की बात है. इसकी सबसे बड़ी वजह बदलती हुई लाइफस्टाइल है. कई ऐसी बीमारियां जो पहले बुज़ुर्गों में होती थीं, वो अब युवाओं में भी हो रही हैं. जैसे हाइपरटेंशन (हाई ब्लड प्रेशर) और डायबिटीज़ के मामले युवाओं में तेज़ी से बढ़ रहे हैं. ये दोनों ही स्ट्रोक के बड़े रिस्क फैक्टर हैं.
बुजुर्ग आमतौर पर रेगुलर चेकअप कराते हैं. लेकिन युवा अक्सर खुद को हेल्दी मानकर जांच नहीं कराते. कई बार स्ट्रोक होने के बाद ही पता चलता है कि व्यक्ति को पहले से डायबिटीज़ या हाइपरटेंशन था.
खानपान की आदतें बदलने से युवाओं में कोलेस्ट्रॉल लेवल बढ़ा है. सुस्त लाइफस्टाइल की वजह से उनमें मोटापा भी बढ़ रहा है. ये सभी मिलकर स्ट्रोक का ख़तरा बढ़ाते हैं. सिगरेट, शराब और रीक्रिएशनल ड्रग्स भी स्ट्रोक के बड़े कारण हैं. इनकी आदत छोड़ने से स्ट्रोक का रिस्क काफ़ी कम किया जा सकता है. नींद की कमी, लगातार स्ट्रेस में रहना और प्रदूषण भी स्ट्रोक के रिस्क फैक्टर्स हैं.

- स्ट्रोक से पहले कभी-कभी कुछ लक्षण दिखाई दे सकते हैं.
- जैसे आवाज़ का तुतलाना.
- चेहरे का एक तरफ़ हल्का लटक जाना.
- हाथ में सुन्नपन या कमज़ोरी महसूस होना.
- पैर में हल्का असंतुलन.
- देखने में परेशानी, जैसे डबल विज़न या धुंधलापन.
- अचानक भूलने की समस्या.
- व्यवहार में अचानक बदलाव आना.
- ये सभी दिमाग के सही तरीके से काम न करने के संकेत हो सकते हैं.
स्ट्रोक पड़ने के शुरुआती घंटों में क्या करें?अगर स्ट्रोक के शुरुआती कुछ घंटों में मरीज़ अस्पताल पहुंच जाए, तो तुरंत जांच करना बहुत ज़रूरी है. समय पर पहचान होने पर ऐसे इंजेक्शन दिए जा सकते हैं, जो स्ट्रोक को पूरी तरह रिवर्स कर सकते हैं. जो मरीज़ ये इंजेक्शन नहीं ले पाते. उनमें कुछ मामलों में तार के ज़रिए दिमाग तक पहुंचकर क्लॉट (खून का थक्का) निकाला जा सकता है. साथ ही, ब्लड प्रेशर, शुगर और कोलेस्ट्रॉल का इलाज करके दिमाग में खून का थक्का बढ़ने से रोक सकते हैं. इससे दिमाग को हुए नुकसान की रिकवरी में मदद मिल सकती है. इसके अलावा, फिज़ियोथेरेपी, स्पीच थेरेपी और साइकोथेरेपी भी स्ट्रोक के बाद रिकवरी में अहम भूमिका निभाती हैं.

- अपना लाइफस्टाइल बदलें.
- रोज 30 मिनट एक्सरसाइज़ करें.
- सिगरेट, शराब न पिएं.
- रीक्रिएशनल ड्रग्स और फैट बर्नर जैसी चीज़ों का इस्तेमाल न करें.
- ब्लड प्रेशर और डायबिटीज़ को कंट्रोल में रखें.
- पर्याप्त नींद लें.
- स्ट्रेस मैनेज करें और रेगुलरली हेल्थ चेकअप कराते रहें.
- खानपान पर भी ध्यान दें.
- तला-भुना कम खाना खाएं.
- बहुत ज़्यादा कार्बोहाइड्रेट न खाएं.
- नमक कम इस्तेमाल करें.
- अगर आप ये एहतियात बरतेंगे तो स्ट्रोक का रिस्क 50% से भी कम कर सकते है.
स्ट्रोक पड़ने के अगले कुछ घंटे बहुत कीमती होते हैं. इस दौरान आप मरीज़ को जितना जल्दी अस्पताल लेकर जाएंगे. उसके ठीक होने का चांस उतना ही बढ़ जाएगा.
(यहां बताई गई बातें, इलाज के तरीके और खुराक की जो सलाह दी जाती है, वो विशेषज्ञों के अनुभव पर आधारित है. किसी भी सलाह को अमल में लाने से पहले अपने डॉक्टर से ज़रूर पूछें. दी लल्लनटॉप आपको अपने आप दवाइयां लेने की सलाह नहीं देता.)
वीडियो: सेहत: कम उम्र में ही क्यों पड़ रहा स्ट्रोक?

