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संतान के लिए गर्भाशय भी किया जा सकता है ट्रांसप्लांट, जानें क्या है प्रोसेस

वूम्ब ट्रांसप्लांट सर्जरी में किसी महिला का यूटेरस यानी गर्भाशय निकालकर दूसरी महिला में लगा दिया जाता है. ये बहुत ही जटिल प्रक्रिया है.

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how womb or uterus transplantation is done in india
वूम्ब ट्रांसप्लांट ज़िंदगीभर के लिए नहीं होता (फोटो:Getty Images)
1 मई 2025 (पब्लिश्ड: 05:31 PM IST)
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27 फ़रवरी, 2025. लंदन में एक बच्ची पैदा हुई. बच्ची के जन्म ने खूब सुर्खियां बटोरीं. वजह? बच्ची की मां का वूम्ब ट्रांसप्लांट (Womb Transplant) हुआ था. यानी उनके शरीर में किसी और महिला का गर्भाशय लगाया गया था. जैसे किडनी ट्रांसप्लांट, लिवर ट्रांसप्लांट. वैसे ही वूम्ब ट्रांसप्लांट.

बच्ची की मां का नाम ग्रेस डेविडसन है. ग्रेस को उनकी बहन ने साल 2023 में अपना वूम्ब यानी गर्भाशय डोनेट किया था. उनकी वूम्ब ट्रांसप्लांट सर्जरी 8 घंटों तक चली थी. अब 2025 में बच्ची का जन्म हुआ है.

वैसे आपको बता दें. भारत में भी वूम्ब ट्रांसप्लांट हो चुके हैं. साल 2017 में पुणे के गैलेक्सी केयर हॉस्पिटल के सर्जन्स ने लगातार दो दिन, देश का पहला दूसरा वूम्ब ट्रांसप्लांट किया था. पहला ट्रांसप्लांट एक 21 साल की महिला में 18 मई को हुआ. ये महिला बिना गर्भाशय के पैदा हुई थी. उसे उसकी मां ने अपना गर्भाशय दिया था. दूसरा ट्रांसप्लांट, इसके अगले ही दिन 19 मई को हुआ. 24 साल की एक महिला को उसकी 45 साल की मां ने अपना गर्भाशय डोनेट किया था. 17 महीने बाद, 18 अक्टूबर 2018 को भारत में पहला ऐसा बच्चा पैदा हुआ, जिसकी मां का वूम्ब ट्रांसप्लांट हुआ था.

अब तक दुनिया में 100 से ज़्यादा वूम्ब ट्रांसप्लांट किए जा चुके हैं. इन ट्रांसप्लांट से लगभग 50 बच्चे पैदा हो चुके हैं.

वूम्ब ट्रांसप्लांट सर्जरी को यूटेराइन ट्रांसप्लांट सर्जरी भी कहा जाता है. मगर ये क्या होती है, कैसे की जाती है. इसके बारे में हमने सबकुछ पूछा क्लाउडनाइन हॉस्पिटल में कंसल्टेंट गायनेकोलॉजिस्ट डॉक्टर शैली शर्मा से.

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डॉ. शैली शर्मा, कंसल्टेंट गायनेकोलॉजिस्ट, क्लाउडनाइन हॉस्पिटल, फरीदाबाद

डॉक्टर शैली बताती हैं कि वूम्ब ट्रांसप्लांट सर्जरी में किसी महिला का यूटेरस यानी गर्भाशय निकालकर दूसरी महिला में लगा दिया जाता है. ये बहुत ही जटिल प्रक्रिया है. वूम्ब ट्रांसप्लांट की ज़रूरत उन महिलाओं को होती है जो बिना गर्भाशय के पैदा हुई हैं. जिनका गर्भाशय किसी बीमारी की वजह से निकाल दिया गया है, या फिर जिनका गर्भाशय ठीक से काम नहीं करता.

जिस महिला का गर्भाशय लिया जाता है. उसे डोनर कहा जाता है. ये डोनर ज़िंदा भी हो सकती है और मृत भी. हालांकि ज़िंदा डोनर से गर्भाशय लेना ज़्यादा आम है. ये ज़्यादातर करीबी रिश्तेदार ही होती हैं. जैसे मां या बहन. वहीं, जिस महिला में गर्भाशय ट्रांसप्लांट किया जाता है, उसे रिसीपिएंट कहा जाता है.

वूम्ब ट्रांसप्लांट में डोनर के शरीर से गर्भाशय निकाला जाता है. फिर इसे सर्जरी के ज़रिए रिसीपिएंट के शरीर में ट्रांसप्लांट कर दिया जाता है. कुछ महीनों बाद, जब शरीर इस अंग को अपना लेता है. तब IVF के ज़रिए भ्रूण यानी एम्ब्रयो को महिला के गर्भाशय में डाल दिया जाता है. अगर सब ठीक रहता है, तो महिला एक स्वस्थ बच्चे को जन्म देती है.

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वूम्ब ट्रांसप्लांट करना आसान नहीं है (फोटो: Getty Images)

हालांकि, वूम्ब ट्रांसप्लांट का क्राइटेरिया बहुत स्ट्रिक्ट है. जैसे डोनर की उम्र 30 से 50 साल के बीच होनी चाहिए. वो पूरी तरह स्वस्थ होनी चाहिए. उसका BMI 30 से कम होना चाहिए. BMI यानी बॉडी मास इंडेक्स. ये एक तरह का स्केल है, जिससे पता चलता है किसी इंसान का वज़न उसकी हाइट और उम्र के हिसाब से सही है या नहीं. इसके अलावा, डोनर को डायबिटीज़, HIV, हेपेटाइटिस B, C या फिर STDs यानी सेक्स से फैलने वाली बीमारियां भी नहीं होनी चाहिए. माने कुल मिलाकर उसे कोई बड़ी गंभीर बीमारी नहीं होनी चाहिए.

वूम्ब ट्रांसप्लांट किसी स्पेशलाइज़्ड ट्रांसप्लांट सर्जन द्वारा ही किया जाना चाहिए. सर्जरी के बाद, प्रेग्नेंट होने से पहले महिला को ठीक होने का पूरा समय मिलना चाहिए. कम से कम 6 महीने. इस ट्रांसप्लांट के बाद होने वाली डिलीवरी आमतौर पर, सी-सेक्शन के ज़रिए ही होती हैं.

वूम्ब ट्रांसप्लांट को टेम्पररी ट्रांसप्लांट माना जाता है. ये ज़िंदगीभर के लिए नहीं होता. आमतौर पर, 1-2 डिलीवरी के बाद गर्भाशय को निकाल दिया जाता है. अगर ऐसा नहीं किया जाएगा, तो महिला को ज़िंदगीभर कुछ ऐसी दवाएं खानी पड़ेंगी, जिससे इंफेक्शंस का रिस्क बढ़ जाएगा. इन दवाओं को इम्यूनोसप्रेसेंट कहते हैं.

वूम्ब ट्रांसप्लांट हर हॉस्पिटल में नहीं किया जाता. कुछ गिने-चुने अस्पतालों में ही होता है. ये बहुत महंगा भी होता है. हमारे देश में इसकी कीमत 10 से 25 लाख के बीच है. लेकिन अक्सर ये खर्च बढ़ जाता है. मरीज़ किस शहर के किस हॉस्पिटल में इलाज करा रहा है. उसकी हालत कैसी है. ये सारे फैक्टर खर्चा बढ़ा देते हैं.

(यहां बताई गई बातें, इलाज के तरीके और खुराक की जो सलाह दी जाती है, वो विशेषज्ञों के अनुभव पर आधारित है. किसी भी सलाह को अमल में लाने से पहले अपने डॉक्टर से ज़रूर पूछें. दी लल्लनटॉप आपको अपने आप दवाइयां लेने की सलाह नहीं देता.)

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