जवानी में ये काम कर लिए तो बुढ़ापे में भी यंग रहेंगे मसल्स
सार्कोपेनिया में उम्र बढ़ने के साथ मांसपेशियां कमज़ोर हो जाती हैं. अक्सर मांसपेशियों की कमज़ोरी हड्डियों की कमज़ोरी से भी जुड़ी होती है. इसलिए एक नया शब्द प्रचलन में है- ऑस्टियोसार्कोपेनिया.
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बुढ़ापे में हड्डियां कमज़ोर हो जाती हैं. ये सबको पता है. पर सिर्फ हड्डियां ही कमज़ोर नहीं होतीं. मसल्स यानी मांसपेशियां भी धीरे-धीरे कमज़ोर होने लगती हैं. जैसे ही 30-35 की उम्र पार होती है, मसल लॉस शुरू हो जाता है. इसे सार्कोपेनिया कहते हैं. यानी उम्र बढ़ने के साथ-साथ मांसपेशियों का कमज़ोर और कम हो जाना. जब मसल्स की ताकत घटती है, तब उठने-बैठने, चलने, सीढ़ियां चढ़ने और यहां तक कि कुर्सी से खड़े होने तक में दिक्कत होने लगती है.
पर आखिर मसल्स कमज़ोर क्यों होने लगती हैं? ये जानेंगे आज. डॉक्टर से समझेंगे कि 30 की उम्र के बाद सार्कोपेनिया क्यों होने लगता है. मसल्स कमज़ोर होने के लक्षण क्या हैं. इससे बचाव कैसे किया जाए और इसका इलाज क्या है.
सार्कोपेनिया क्या होता है?ये हमें बताया डॉक्टर अतुल कक्कड़ ने.
सार्कोपेनिया में उम्र बढ़ने के साथ मांसपेशियां कमज़ोर हो जाती हैं. आजकल मांसपेशियों और हड्डियों को एक यूनिट की तरह देखा जाता है. अक्सर मांसपेशियों की कमज़ोरी हड्डियों की कमज़ोरी से भी जुड़ी होती है. इसलिए एक नया शब्द प्रचलन में है- ऑस्टियोसार्कोपेनिया. ऑस्टियोसार्कोपेनिया यानी जब हड्डियां और मांसपेशियां दोनों एक साथ कमज़ोर होने लगें.
सार्कोपेनिया होने के कारण- डायबिटीज़.
- लंबे समय से चले आ रहे इंफेक्शन.
- कैंसर.
- पेट की कोई बीमारी.
- कुपोषण.
- एक्सरसाइज़ की कमी.
इनकी वजह से मांसपेशियां और हड्डियां दोनों कमज़ोर हो सकते हैं. ये बीमारी आमतौर पर बढ़ती उम्र के साथ ज्यादा देखी जाती है. डायबिटीज़ के मरीज़ों में भी सार्कोपेनिया का ख़तरा रहता है.
- मांसपेशियों का आकार (मसल मास) कम हो जाता है.
- मरीज़ को उठने-बैठने में दिक्कत होती है.
- कुर्सी से बिना सहारे खड़े होना मुश्किल हो जाता है.
- सीढ़ियां चढ़ने में दिक्कत आती है.
- इनसे पता चलता है कि मांसपेशियां कमज़ोर हो रही हैं.
- ऐसे मरीज़ों के लिए इंडियन टॉयलेट इस्तेमाल करना मुश्किल हो जाता है.
- यानी नीचे बैठने की पोज़ीशन से बिना सहारे खड़े होना उनके लिए कठिन होता है.
सार्कोपेनिया से बचाव और इलाजसार्कोपेनिया का पता लगाने के लिए कुछ आसान-से टेस्ट किए जाते हैं. जैसे मरीज़ को चलाकर देखना या कुर्सी से बिना सहारे खड़े होने को कहना. लैब में भी इसकी जांच की जा सकती है. बॉडी कंपोजिशन टेस्ट से पता चलता है कि शरीर में मांसपेशियां और हड्डियां कैसी हैं. Whole Body DEXA Scan से पता चलता है कि मांसपेशियों का नुकसान तो नहीं हो रहा. इसके अलावा, मांसपेशियों और नसों की खास जांच अस्पताल में की जा सकती है.
सार्कोपेनिया से बचने के लिए रोज़ एक्सरसाइज़ करना बहुत ज़रूरी है. मसल टोनिंग और मसल स्ट्रेंथनिंग एक्सरसाइज करें. कोर एक्सरसाइज भी मांसपेशियों को मज़बूत बनाने में मदद करती है. साथ ही, अपनी डाइट में पर्याप्त प्रोटीन शामिल करें. आपके खाने में कैल्शियम, विटामिन D और मैग्नीशियम होना चाहिए. शराब न पिएं क्योंकि इससे मांसपेशियां कमज़ोर हो सकती हैं. यानी सार्कोपेनिया से बचने के लिए रोज़ एक्सरसाइज़ करना, पर्याप्त प्रोटीन लेना और स्ट्रेंथनिंग एक्सरसाइज़ करना बहुत ज़रूरी है.
(यहां बताई गई बातें, इलाज के तरीके और खुराक की जो सलाह दी जाती है, वो विशेषज्ञों के अनुभव पर आधारित है. किसी भी सलाह को अमल में लाने से पहले अपने डॉक्टर से ज़रूर पूछें. दी लल्लनटॉप आपको अपने आप दवाइयां लेने की सलाह नहीं देता.)
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