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मध्य प्रदेश में गुलियन बैरे सिंड्रोम से दो बच्चों की मौत, जानें क्या है ये बीमारी

मध्य प्रदेश के नीमच में गुलियन बैरे सिंड्रोम की वजह से दो बच्चों की मौत हो गई है. एक बच्चे की उम्र 6 साल थी और दूसरे की 15 साल. दोनों की मौत 11 से 13 जनवरी के बीच हुई.

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Guillain-Barre Syndrome GBS outbreak in MP its causes symptoms prevention & treatment
गुलियन बैरे सिंड्रोम एक रेयर डिसऑर्डर है (सांकेतिक तस्वीर)
20 जनवरी 2026 (Updated: 20 जनवरी 2026, 07:10 PM IST)
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मध्य प्रदेश का ज़िला नीमच. यहां गुलियन बैरे सिंड्रोम यानी GBS की वजह से दो बच्चों की मौत हो गई है. एक बच्चे की उम्र 6 साल थी और दूसरे की 15 साल. दोनों की मौत 11 से 13 जनवरी के बीच हुई. ये दोनों बच्चे नीमच ज़िले के मनासा एरिया के रहने वाले थे. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, मध्य प्रदेश में गुलियन बैरे सिंड्रोम के अब तक करीब 18 मामले सामने आ चुके है. जिसके बाद प्रशासन अलर्ट मोड पर है.  

मनासा की सब-डिविज़नल मजिस्ट्रेट किरण आंजना ने द हिंदू से बातचीत में बताया कि नए मरीज़ों के लिए सिविल हॉस्पिटल में एक स्पेशल वॉर्ड बनाया गया है. वहीं, पहले से भर्ती मरीज़ों को आसपास के बड़े अस्पतालों में रेफर किया गया है. साथ ही, अब तक इलाके में डोर-टू-डोर स्क्रीनिंग के दो राउंड हो चुके हैं. इस काम के लिए स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी, आशा और आंगनवाड़ी वर्कर्स की 15 टीम्स को लगाया गया है. लगभग 150 लोगों में सर्दी-खांसी के लक्षण पाए गए हैं. उनकी सेहत पर लगातार नज़र रखी जा रही है. ताकि पता चल सके कि उनमें GBS से जुड़े कोई लक्षण तो नहीं हैं.

इससे पहले 17 जनवरी को राज्य के डिप्टी सीएम राजेंद्र शुक्ला ने मनासा का दौरा किया. पत्रकारों से बातचीत में उन्होंने बताया कि वॉटर प्यूरिफिकेशन प्लांट और दूसरी जगहों से लिए गए सैंपल्स में कोई गंदगी नहीं मिली है. यानी वो दूषित नहीं हैं. ऐसा शुरुआती जांच में पता चला है. मरीज़ों के खून के सैंपल्स, खाने के आइटम्स और दूसरी कई चीज़ों के सैंपल्स जांच के लिए हैदराबाद, कोलकाता और पुणे भेजे गए हैं.

वहीं, Integrated Disease Surveillance Program यानी IDSP के एक्सपर्ट्स और World Health Organization की टीम अभी नीमच ज़िले में मौजूद है. वो GBS आउटब्रेक पर नज़र रख रहे हैं और एडवांस्ड टेस्टिंग के लिए सैंपल्स इकट्ठे कर रहे हैं.

जिस गुलियन बैरे सिंड्रोम के मामले मध्य प्रदेश में बढ़ रहे हैं, वो है क्या? इसके कारण, लक्षण और इलाज के बारे में हमने पूछा आकाश हेल्थकेयर में न्यूरोलॉजी डिपार्टमेंट के डायरेक्टर और हेड डॉक्टर मधुकर भारद्वाज से.

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डॉ. मधुकर भारद्वाज, डायरेक्टर एंड हेड, न्यूरोलॉजी, आकाश हेल्थकेयर

डॉक्टर मधुकर बताते हैं कि गुलियन बैरे सिंड्रोम या GBS एक ऑटोइम्यून डिसऑर्डर है. यानी बीमारियों से बचाने वाली शरीर की इम्यूनिटी, शरीर पर ही हमला बोल देती है. इम्यून सिस्टम गलती से पेरिफेरल नर्व्स पर हमला कर देता है. पेरिफेरल नर्व्स वो नसें हैं, जो दिमाग और स्पाइनल कॉर्ड से मिलने वाले सिग्नल्स को शरीर के बाकी हिस्सों तक पहुंचाती हैं. जब इन नसों को नुकसान पहुंचता है, तो मांसपेशियों तक सिग्नल ठीक तरह नहीं पहुंच पाता, जिससे हाथ-पैरों में कमज़ोरी आने लगती है.

गुलियन बैरे सिंड्रोम एक रेयर डिसऑर्डर है. यानी आमतौर पर इसके मामले नहीं देखे जाते. गुलियन बैरे सिंड्रोम होने की सटीक वजह अब तक पता नहीं चल सकी है. लेकिन, ज़्यादातर मामलों में ये किसी वायरल या बैक्टीरियल इंफेक्शन के कारण ही होता है. बीते कुछ सालों में कोरोना वायरस और ज़ीका वायरस जैसे वायरल इंफेक्शन GBS की वजह बने हैं. कैम्पिलोबैक्टर बैक्टीरिया, जो अक्सर दस्त और पेट से जुड़ी परेशानियां पैदा करता है, उसकी वजह से भी GBS हो सकता है.

गुलियन बैरे सिंड्रोम होने पर अचानक हाथ-पैरों में कमज़ोरी महसूस होती है. शुरुआत अक्सर पैरों से होती है. फिर हाथों और कभी-कभी गर्दन की मांसपेशियों पर भी असर पड़ने लगता है. कुछ मरीज़ों को सांस लेने में दिक्कत हो सकती है. गंभीर मामलों में उन्हें वेंटिलेटर की ज़रूरत पड़ सकती है.

gullian barre syndrome
गुलियन बैरे सिंड्रोम होने पर अचानक हाथ-पैरों में कमज़ोरी महसूस होती है (फोटो: Freepik)

गुलियन बैरे सिंड्रोम का तुरंत इलाज कराना बहुत ज़रूरी है. वर्ना ये ख़तरनाक और जानलेवा हो सकता है. इसका इलाज घर पर नहीं किया जा सकता. हॉस्पिटल जाना ही पड़ता है. वहां दो तरीकों से मरीज़ का इलाज किया जाता है. पहला तरीका है इंट्रावीनस इम्युनोग्लोबुलिन या IVIG. इसमें नसों में इम्युनोग्लोबुलिन देकर नुकसानदेह एंटीबॉडीज़ को रोका जाता है.

दूसरा तरीका है प्लाज़्मा-फेरेसिस यानी प्लाज़्मा एक्सचेंज. इसमें खून से हानिकारक एंटीबॉडीज़ निकाली जाती हैं. इसलिए, अगर हाथ-पैरों में कमज़ोरी महसूस हो रही है. खासकर किसी इंफेक्शन या दस्त के बाद. कमजोरी बढ़ती जा रही है, तो तुरंत किसी न्यूरोलॉजिस्ट को दिखाएं. समय पर इलाज से ज़्यादातर मरीज़ पूरी तरह ठीक हो जाते हैं.

जहां तक बात बचाव की है, तो गुलियन बैरे सिंड्रोम से पूरी तरह बचाव मुमकिन नहीं है. लेकिन इसका रिस्क कम किया जा सकता है. इसके लिए हाइजीन का ध्यान रखें. साफ खाना और पानी लें. फूड पॉइज़निंग से बचें. और, कोई भी इंफेक्शन होने पर तुरंत इलाज करवाएं.

(यहां बताई गई बातें, इलाज के तरीके और खुराक की जो सलाह दी जाती है, वो विशेषज्ञों के अनुभव पर आधारित है. किसी भी सलाह को अमल में लाने से पहले अपने डॉक्टर से ज़रूर पूछें. दी लल्लनटॉप आपको अपने आप दवाइयां लेने की सलाह नहीं देता.)

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