विदेशी मदद में कटौती से अगले 5 सालों में 2 करोड़ मौतें हो सकती हैं! ये स्टडी डरा देगी
पिछले कुछ वक्त में कई देशों ने विदेशी सहायता में कटौती की है. जैसे अमेरिका ने 2025 में USAID बंद कर दिया. अमेरिका WHO से भी बाहर हो गया. जर्मनी, स्वीडन और ब्रिटेन जैसे देश भी विदेशी सहायता पर हो रहे अपने खर्चे को कम कर रहे हैं. इसका सबसे ज़्यादा असर दूसरे देशों में चल रहे हेल्थ प्रोग्राम्स पर पड़ रहा है.

‘अगर विदेशी मदद में ऐसे ही कटौती होती रही. तो 2030 तक 2 करोड़ से ज़्यादा ऐसी मौतें हो सकती हैं. जिन्हें रोका जा सकता था. इनमें 5 साल से कम उम्र के 54 लाख बच्चे भी शामिल हैं.’ ये सामने आया है 2 फरवरी 2026 को दी लैंसेट जर्नल में छपी एक स्टडी में. कई विकसित देश, जैसे अमेरिका, जर्मनी, जापान और ब्रिटेन वगैरा विकासशील और अल्प-विकसित देशों की मदद करते हैं. जिससे वहां रहने वाले लोगों की ज़िंदगी बेहतर बन सके. उन्हें बीमारियों, महामारी और भुखमरी जैसे हालातों से बचाया जा सके.
लेकिन पिछले कुछ वक्त में कई देशों ने विदेशी सहायता में कटौती की है. जैसे अमेरिका ने 2025 में USAID बंद कर दिया. USAID यानी United States Agency for International Development. ये अमेरिका की एक सरकारी एजेंसी थी. इसका काम डेवलपिंग यानी विकासशील देशों को मदद देना था. इसके बंद होने से तमाम देशों में चल रहे प्रोग्राम भी बंद हो गए. इनमें हेल्थ से जुड़े प्रोग्राम्स भी शामिल थे. जैसे अफगानिस्तान में 300 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र यानी Primary Care Units बंद करने पड़े, क्योंकि वो USAID की मदद से चलते थे.

अमेरिका हाल ही में वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइज़ेशन यानी WHO से भी बाहर हो गया. इससे WHO की फंडिंग पर बहुत बुरा असर पड़ा है, क्योंकि सबसे ज़्यादा फंड अमेरिका से ही मिलता था. जर्मनी, स्वीडन और ब्रिटेन जैसे देश भी विदेशी सहायता पर हो रहे अपने खर्चे को कम कर रहे हैं. इसका सबसे ज़्यादा असर दूसरे देशों में चल रहे हेल्थ प्रोग्राम्स पर पड़ रहा है.
दी लैंसेट की ये रिसर्च बताती है कि जिन देशों में लोगों की कमाई बहुत ज़्यादा नहीं है. वहां विदेशी मदद से कई प्रोग्राम्स चलाए जाते हैं. जिनका फ़ायदा वहां रहने वाले लोगों को पहुंचता है. जैसे बीते दो दशकों में संक्रामक बीमारियों से मरने वाले बच्चों की संख्या घटी है. 5 साल से कम उम्र के बच्चों की मौतें 39% तक कम हुई हैं. HIV/AIDS, मलेरिया और कुपोषण से होने वाली मौतें भी घटी हैं.
लेकिन अब कई विकसित देश दूसरे देशों को दी जाने वाली मदद कम कर रहे हैं. इससे मौतों का ख़तरा बढ़ रहा है. स्टडी के लिए रिसर्चर्स ने देखा कि साल 2002 से 2021 के बीच कितने देशों को कितनी विदेशी मदद मिली. इन देशों में मृत्यु दर कैसी रही. जो डेटा मिला, उसका इस्तेमाल करके भविष्य के लिए तीन सेनेरियो तैयार किए गए. यानी तीन स्थितियां बनाई गईं, कि अगर आगे चलकर विदेशी मदद कम या ज़्यादा हुई तो क्या असर पड़ेगा.

पहली स्थिति- जैसा अभी चल रहा है, वैसा ही चलेगा. यानी विदेशी मदद न ज़्यादा बढ़ेगी. न घटेगी.
दूसरी स्थिति- विदेशी मदद में थोड़ी कटौती होगी. जैसी पिछले कुछ सालों में हुई है. अगर बजट में हल्की कटौती हुई, तो 94 लाख और मौतें हो सकती हैं. इनमें 25 लाख बच्चे शामिल होंगे.
तीसरी स्थिति- विदेशी मदद में बहुत ज़्यादा कटौती होगी. 2025 के मुकाबले विदेशी मदद लगभग आधी रह जाएगी. और, इस दशक के अंत तक यानी 2030 तक ऐसी ही स्थिति बनी रहेगी. जब ऐसा होगा. तब 2 करोड़ 26 लाख के करीब ज़्यादा मौतें होंगी. यानी ऐसी मौतें, जिन्हें होने से रोका जा सकता था. इनमें 5 साल से कम उम्र के 54 लाख बच्चे भी शामिल होंगे.
स्टडी के लीड ऑथर और बार्सिलोना इंस्टीट्यूट फॉर ग्लोबल हेल्थ में प्रोफेसर हैं डेविड रसेला. वो कहते हैं कि जिस तरह के हालात अभी हैं. उस हिसाब से विदेशी मदद में हल्की कटौती हो सकती है. ज़्यादा गंभीर कटौती भी की जा सकती है. ब्रिटेन की रिफॉर्म यूके पार्टी ने तो विदेशी सहायता बजट में 90% तक कटौती की बात कही है.
देखिए फ्यूचर में क्या होगा. खासकर विदेशी सहायता को लेकर. वो कोई नहीं जानता. लेकिन जिस हिसाब से तमाम देश विदेशी मदद में कटौती कर रहे हैं. अगर वैसा ही चलता रहा, तो भारत पर इसका क्या असर पड़ेगा. भारत का हेल्थकेयर सेक्टर कितना प्रभावित होगा? ये सवाल हमने पूछा एलांटिस हेल्थकेयर, दिल्ली के मैनेजिंग डायरेक्टर, डॉक्टर मनन गुप्ता से.

डॉक्टर मनन कहते हैं कि विदेशी सहायता में हो रही कटौती का असर भारत जैसे देशों पर पड़ सकता है. भले ही भारत ने पिछले कुछ सालों में अपना हेल्थकेयर सिस्टम बेहतर किया है. लेकिन मांओं और बच्चों की सेहत, वैक्सीनेशन, पोषण, टीबी, HIV और कई संक्रामक बीमारियों से जुड़े प्रोग्राम अब भी विदेशी मदद और तकनीकी सहयोग पर निर्भर हैं.
अगर ये कटौती लंबे समय तक चलती रही. तो इसका सबसे ज़्यादा असर गरीब और गांवों में रहने वाले लोगों पर पड़ेगा. जहां इलाज की सुविधाएं पहले ही कम हैं. इससे बीमारी का बोझ बढ़ सकता है. ऐसी मौतों का ख़तरा भी बढ़ेगा, जिन्हें रोका जा सकता था. इसलिए भारत को अपना पब्लिक हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर सुधारना होगा. प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं और प्रिवेंटिव केयर में निवेश बढ़ाना होगा, ताकि विदेशी फंडिंग कम होने का असर आम लोगों की सेहत पर न पड़े.
(यहां बताई गई बातें, इलाज के तरीके और खुराक की जो सलाह दी जाती है, वो विशेषज्ञों के अनुभव पर आधारित है. किसी भी सलाह को अमल में लाने से पहले अपने डॉक्टर से ज़रूर पूछें. दी लल्लनटॉप आपको अपने आप दवाइयां लेने की सलाह नहीं देता.)
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