सबसे घातक कैंसर की वैक्सीन आने वाली है? फेज़-1 ट्रायल के नतीजे उम्मीद जगाने वाले
वैक्सीन का नाम ऑटोजीन सेव्युमेरन (Autogene Cevumeran) है. ये mRNA बेस्ड एक थेरेप्यूटिक वैक्सीन है. शुरुआती ट्रायल में ये पैंक्रियाटिक कैंसर पर काफी असरदार पाई गई है.

पैंक्रियाटिक कैंसर के इलाज के लिए तैयार हो रही वैक्सीन का फेज़-1 क्लीनिकल ट्रायल पूरा हो चुका है और नतीजे उम्मीद जगाने वाले हैं. पैंक्रियाज़ में कैंसर वाले जिन मरीज़ों के शरीर ने इस वैक्सीन पर अच्छा रिस्पॉन्स दिया, उनमें से करीब 90% लोग इलाज के 4 से 6 साल बाद भी ज़िंदा थे. ये इसलिए अहम है, क्योंकि आमतौर पर इस कैंसर में मरीज़ों के बचने की उम्मीद कम होती है.
American Cancer Society’s Cancer Statistics 2026 Report के मुताबिक, पैंक्रियाटिक कैंसर का फाइव-ईयर सर्वाइवल रेट सिर्फ 13% है. यानी ये कैंसर डायग्नोस होने के बाद, 100 में से सिर्फ 13 लोग ही अगले 5 साल तक ज़िंदा रह पाते हैं.
इस एक्सपेरिमेंटल वैक्सीन का नाम ऑटोजीन सेव्युमेरन (Autogene Cevumeran) है, और इसके खास होने की कुछ वजहें हैं.

पहली वजह- ये एक थेरेप्यूटिक वैक्सीन है. यानी ये कैंसर से बचाने में नहीं, बल्कि उसके इलाज में मदद करती है. माने जिन लोगों को पैनक्रियाज़ का कैंसर हो गया है उनमें ये कैंसर के बढ़ने या दोबारा लौटने को रोकने के लिए इस्तेमाल की जा सकती है.
दूसरी वजह- ये पर्सनलाइज़्ड वैक्सीन है. यानी इसे मरीज़ के ट्यूमर के हिसाब से तैयार किया जाता है. ये कोई जनरल वैक्सीन नहीं है.
तीसरी वजह- ये mRNA टेक्नोलॉजी पर बेस्ड है. इसी टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल कोविड-19 वैक्सीन में भी हुआ था. mRNA यानी मैसेंजर राइबो-न्यूक्लिक एसिड. ये शरीर के सेल्स को बताता है कि कौन-सा प्रोटीन बनाना है. इस वैक्सीन में सेल्स को ऐसा मैसेज दिया जाता है कि वो ट्यूमर से जुड़े खास प्रोटीन बनाएं. इससे शरीर का इम्यून सिस्टम, खासकर टी-सेल्स, उन प्रोटीन को पहचानकर कैंसर सेल्स पर हमला करना सीखते हैं.

ऑटोजीन सेव्युमेरन वैक्सीन पर अभी रिसर्च और क्लीनिकल ट्रायल्स चल रहे हैं. ये वैक्सीन BioNTech और जेनेनटेक मिलकर डेवलप कर रहे हैं. जेनेनटेक, स्विट्ज़रलैंड की बड़ी फार्मा कंपनी रॉश ग्रुप (Rauch Group) का हिस्सा है. रिसर्च में न्यूयॉर्क के मेमोरियल स्लोएन केटरिंग कैंसर सेंटर के वैज्ञानिक भी शामिल हैं. रिसर्च को डॉ. विनोद बालाचंद्रन लीड कर रहे हैं. उन्होंने इसके फॉलोअप नतीजे American Association for Cancer Research की एनुअल मीटिंग में पेश किए.
क्या रहे नतीजे, बताते हैं आपको.
वैक्सीन की फेज़ 1 स्टडी में 16 मरीज़ों को पैंक्रियाटिक कैंसर की सर्जरी के बाद ऑटोजीन सेव्युमेरन वैक्सीन दी गई. साथ में, उन्हें कीमोथेरेपी और चेकपॉइंट इनहिबिटर नाम की एक इम्यूनोथेरेपी दवा भी दी गई. ये वैक्सीन हर मरीज़ के ट्यूमर के DNA के हिसाब से अलग-अलग बनाई गई थी. 16 में से 8 मरीज़ों में इस वैक्सीन ने अच्छा असर दिखाया. इन मरीज़ों के इम्यून सिस्टम ने ट्यूमर को पहचानना शुरू किया और टी-सेल्स बनाए. ये टी-सेल्स, कैंसर के सेल्स पर हमला करते हैं. इन 8 मरीज़ों में से 7 लोग सर्जरी के 4 से 6 साल बाद भी ज़िंदा रहे. वहीं, जिन 8 मरीज़ों में वैक्सीन असर नहीं कर पाई, उनमें से सिर्फ 2 लोग ही ज़िंदा बचे, और उनके ज़िंदा रहने की औसत अवधि करीब 3.4 साल रही.
फेज़ 1 के अच्छे नतीजों के बाद, अब एक ग्लोबल फेज़ 2 क्लीनिकल ट्रायल शुरू किया गया है. इसमें ऑटोजीन सेव्युमेरन वैक्सीन को ज़्यादा मरीजों पर टेस्ट किया जा रहा है. ये स्टडी न्यूयॉर्क के MSK यानी मेमोरियल स्लोएन केटरिंग समेत कई दूसरी जगहों पर चल रही है.

हालांकि एक्सपर्ट्स का कहना है कि अभी ये स्टडी एक बहुत ही छोटे समूह पर हुई है. इसलिए इसके नतीजों को बड़े और रैंडमाइज़्ड ट्रायल्स में कन्फर्म करना ज़रूरी है. ये भी देखना होगा कि वैक्सीन अलग-अलग मरीज़ों में कितनी असरदार रहती है और लंबे समय तक कितना फायदा देती है. साथ ही, इस तरह की पर्सनलाइज़्ड वैक्सीन बनाना आसान नहीं है. ये पूरा प्रोसेस काफी जटिल और समय लेने वाला होता है. अगर आगे चलकर ये वैक्सीन इस्तेमाल में आती है, तो इसकी लागत और उपलब्धता अहम मुद्दे होंगे.
पैंक्रियाटिक कैंसर को सबसे ख़तरनाक कैंसर्स में गिना जाता है. क्योंकि इसे शुरुआती स्टेज में पकड़ना बहुत मुश्किल होता है. उस पर, इसका इलाज भी आसान नहीं होता. पर इसके पीछे वजह क्या है? ये सवाल हमने पूछा H.O.P.E. ऑन्कोलॉजी क्लीनिक, नई दिल्ली में मेडिकल ऑन्कोलॉजी के डायरेक्टर, डॉक्टर अमीश वोरा से. ये भी जाना कि अगर ऑटोजीन सेव्युमेरन वैक्सीन के नतीजे आगे भी अच्छे रहते हैं, तो क्या उम्मीदें की जा सकती हैं.

डॉक्टर अमीश कहते हैं कि पैंक्रियाज़ शरीर के अंदर गहराई में होता है. इसलिए यहां बनने वाला ट्यूमर जल्दी पकड़ में नहीं आता. इससे जांच में अक्सर देरी हो जाती है. इस कैंसर के शुरुआती लक्षण लगभग न के बराबर होते हैं. जिससे बीमारी का पता देर से चलता है. तब तक कैंसर फैल चुका होता है. पैंक्रियाटिक कैंसर के हर मरीज़ में सर्जरी मुमकिन नहीं होती. कीमोथेरेपी या रेडिएशन थेरेपी का असर भी सीमित रहता है. इस वजह से इसका इलाज काफी जटिल और चुनौती भरा बन जाता है.
हालांकि, नई mRNA बेस्ड वैक्सीन ऑटोजीन सेव्युमेरन, शरीर के इम्यून सिस्टम को कैंसर सेल्स पहचानने और उनसे लड़ने में मदद करती है. अगर आगे बड़े ट्रायल्स में भी इसके अच्छे नतीजे मिलते हैं, तो इससे मरीज़ों की उम्र बढ़ सकेगी. साथ ही, इलाज ज़्यादा असरदार और मरीज़ के हिसाब से बनाया जा सकेगा.
(यहां बताई गई बातें, इलाज के तरीके और खुराक की जो सलाह दी जाती है, वो विशेषज्ञों के अनुभव पर आधारित है. किसी भी सलाह को अमल में लाने से पहले अपने डॉक्टर से ज़रूर पूछें. दी लल्लनटॉप आपको अपने आप दवाइयां लेने की सलाह नहीं देता.)
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