डायबिटीज़ की 'ABCD' समझ ली तो शुगर कभी कंट्रोल से बाहर नहीं जाएगी
साइलेंट शुगर की वजह से हमारा देश 'डायबिटीज़ कैपिटल ऑफ़ द वर्ल्ड' बन गया है. हाई शुगर के शुरुआती लक्षण पकड़ में नहीं आते. न ही लोग इनपर ध्यान देते हैं. समय पर इलाज शुरू नहीं होता. नतीजा? डायबिटीज़ हो जाती है.

सुबह की चाय फीकी निकले तो मूड ख़राब हो जाता है. दो चम्मच चीनी के बिना स्वाद कहां आता है? रात में खाने के बाद कुछ मीठा हो जाए तो क्या कहने. कुल मिलाकर, शुगर हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी का अहम हिस्सा है. लेकिन, दूसरी तरफ़ आपका शरीर अंदर ही अंदर दूसरी शुगर से लड़ रहा है और आपको पता भी नहीं चल रहा.
इसी साइलेंट शुगर की वजह से हमारा देश 'डायबिटीज़ कैपिटल ऑफ़ द वर्ल्ड' बन गया है. हाई शुगर के शुरुआती लक्षण पकड़ में नहीं आते. न ही लोग इनपर ध्यान देते हैं. समय पर इलाज शुरू नहीं होता. नतीजा? डायबिटीज़. इसलिए आज बात करेंगे साइलेंट शुगर पर. डॉक्टर्स से जानेंगे, डायबिटीज़ होने के दौरान शरीर में क्या होता है. किन सिग्नल्स को अवॉयड नहीं करना चाहिए. साइलेंट शुगर हम भारतीयों में इतनी आम क्यों है. इससे कैसे बच सकते हैं और भी बहुत कुछ.
हमारे साथ हैं तीन एक्सपर्ट्स. पहली, डॉक्टर कशिश गुप्ता, कंसल्टिंग एंडोक्रिनोलॉजिस्ट, एडल्ट एंड पीडियाट्रिक हॉर्मोन स्पेशलिस्ट, पीएसआरआई हॉस्पिटल, दिल्ली. दूसरे, डॉक्टर पराग अग्रवाल, कंसल्टेंट एंडोक्रिनोलॉजिस्ट, कोकिलाबेन धीरूभाई अंबानी हॉस्पिटल एंड एमजीएम न्यू बॉम्बे हॉस्पिटल, नवी मुंबई. तीसरे, डॉक्टर पार्थ जेठवानी, कंसल्टेंट, एडल्ट एंड पीडियाट्रिक एंडोक्रिनोलॉजिस्ट, कोटा हार्ट एंड श्रीजी मल्टी-स्पेशियलिटी हॉस्पिटल कोटा.

फ़ास्टिंग शुगर नॉर्मल आने का मतलब ये नहीं कि कोई दिक्कत नहीं है या डायबिटीज़ नहीं है. ज़रूरी है डायबिटीज़ के अहम लक्षणों को पहचानना. जैसे बार-बार पेशाब आना. ज़्यादा प्यास लगना. वज़न घटना. ये सारे डायबिटीज़ के लक्षण हैं. ये लक्षण दिखने पर कुछ टेस्ट किए जाते हैं. जैसे HbA1c टेस्ट. ये पिछले 3 महीनों की औसत शुगर बताता है. खाने के बाद की शुगर चेक करने के लिए ओरल ग्लूकोज टॉलरेंस टेस्ट करते हैं. इससे ये समझने में मदद मिलती है कि खाने के बाद शुगर कैसे बढ़ती है. कई लोगों की फ़ास्टिंग शुगर नॉर्मल आती है, लेकिन खाने के बाद की शुगर बढ़ सकती है.
प्री-डायबिटीज़ में क्या होता है?डायबिटीज़ की शुरुआती स्टेज को प्री-डायबिटीज़ कहा जाता है. पहले प्री-डायबिटीज़ होती है, उसके बाद डायबिटीज़ हो जाती है. इस दौरान शरीर में इंसुलिन रेज़िस्टेंस होने लगता है. इंसुलिन एक हॉर्मोन है, जो ब्लड शुगर को कंट्रोल करता है. लेकिन, इंसुलिन रेज़िस्टेंस होने पर इंसुलिन हॉर्मोन ठीक से काम नहीं कर पाता. इसे ही इंसुलिन रेज़िस्टेंस कहते हैं.
प्री-डायबिटीज़ में भी अक्सर मरीज़ों में इंसुलिन रेज़िस्टेंस पाया जाता है. ऐसा होने पर कुछ लक्षण दिखाई देते हैं. जैसे गर्दन, बगलों या पैरों में कालापन होना. प्री-डायबिटीज की शुरुआत में फ़ास्टिंग शुगर नॉर्मल और एब्नॉर्मल के बीच रहती है. खाने के बाद की शुगर भी नॉर्मल और हाई के बीच आ सकती है.
कुछ मरीज़ों में इंफेक्शन होने का चांस बढ़ जाता है. जैसे बार-बार पेशाब आना. पेशाब में जलन होना. हाथ-पैरों में चींटी चलने जैसा महसूस होना. पैरों में जलन होना. कुछ लोगों का वज़न भी घट सकता है. जब शुगर रिपोर्ट एब्नॉर्मल आती है, रेंज से बाहर आती है तब इसे डायबिटीज़ कहा जाता है. डायबिटीज़ से पहले की स्टेज को प्री-डायबिटीज़ कहते हैं.

सबसे ख़तरनाक बीमारियां वो होती हैं, जिनके लक्षण महसूस नहीं होते. डायबिटीज़ इन्हीं ख़तरनाक बीमारियों में से एक है. जब किसी व्यक्ति को डायबिटीज़ होती है. तब इंसुलिन बनाने वाली ग्रंथि पैंक्रियाज़ ज़्यादा इंसुलिन बनाने लगती है. ज़्यादा इंसुलिन की वजह से बढ़ी हुई शुगर कुछ समय तक शरीर को नॉर्मल लगती है.
जब शुगर बहुत ज़्यादा बढ़ जाती है, तब कुछ लक्षण दिखाई देते हैं. जैसे बहुत ज़्यादा प्यास लगना. बार-बार पेशाब आना. लेकिन तब तक शरीर के अंगों जैसे नसों, आंखों, दिल और किडनी को नुकसान होना शुरू हो जाता है.
साइलेंट शुगर भारतीयों में आम क्यों?भारतीयों में जेनेटिक वजहों से डायबिटीज़ होने का चांस ज़्यादा होता है. पेट के आसपास फैट जमा होना बहुत आम है. खासकर अंदरूनी अंगों पर फैट जमा होना बहुत आम बात है. ऐसे फैट को विसरल फैट कहते हैं. इस फैट से ऐसे केमिकल्स और हॉर्मोन निकलते हैं, जो शरीर में इंसुलिन रेज़िस्टेंस पैदा करते हैं. यानी इंसुलिन हॉर्मोन ठीक से काम नहीं कर पाता. इस वजह से धीरे-धीरे शरीर में शुगर बढ़ने लगती है. पहले ये स्थिति प्री-डायबिटीज़ में बदलती है और फिर डायबिटीज़ में.
शुरुआत में डायबिटीज़ के लक्षण हल्के होते हैं, इसलिए आसानी से समझ में नहीं आते. अक्सर सिर्फ कमज़ोरी या थकान लगती है, जिस पर ध्यान नहीं दिया जाता. बाद में जब शरीर में कॉम्प्लिकेशंस होने लगते हैं. तब डायबिटीज़ के साफ़ लक्षण सामने आते हैं. इसी वजह से डायबिटीज़ लंबे समय तक छुपी रहती है.

- शुरुआत में मरीज़ को कोई खास लक्षण महसूस नहीं होते.
- धीरे-धीरे कुछ मरीज़ों को महसूस होगा कि उनका वज़न घट रहा है.
- थकान लग रही है.
- बार-बार इंफेक्शन हो रहे हैं.
- पेशाब की जगह खुजली या पेशाब करते समय जलन हो रही है.
- कुछ लोगों को पैरों में जलन होगी.
- पैरों में चींटी चलने जैसा एहसास होगा.
- जिनका वज़न ज़्यादा है, उनमें गर्दन के आसपास कालापन होगा.
- कुछ मरीज़ों को देखने में दिक्कत हो सकती है.
- आंखों के सामने बादल जैसे दिखेंगे या काले धब्बे नज़र आएंगे.
- इन लक्षणों से समझा जा सकता है कि व्यक्ति को डायबिटीज़ हो रही है.

डायबिटीज़ में घर का खाना खाते समय तीन बातों का ध्यान रखना ज़रूरी है- क्या, कब और कितना. सबसे पहले बात करते हैं कि आप खाने में क्या खा रहे हैं. आमतौर पर भारतीय डाइट में कार्बोहाइड्रेट्स ज़्यादा होते हैं. जैसे रोटी, चावल, आलू और ब्रेड. हमें इन चीज़ों को कम खाना है. दूसरा, प्रोटीन की मात्रा बढ़ानी है. जैसे पनीर, दही, दालें, सोयाबीन और अंडे. तीसरा, मक्खन, मलाई और तेल जैसी चीज़ें कम लेनी हैं.
अब बात करते हैं कि कितना खाना है. हमें पेट भरकर खाने की ज़रूरत नहीं है. पेट को 70-80% तक ही भरना चाहिए. एक साथ बहुत ज़्यादा खाने की ज़रूरत भी नहीं है.
तीसरी चीज़, कब खाना है. कई लोग डिनर बहुत देर से करते हैं. खाने के बीच में 8-10 घंटे का गैप रखते हैं या फिर बार-बार स्नैकिंग करते रहते हैं. ये तीनों ही आदतें ठीक नहीं हैं. आप घर का खाना खाएं पर ये भी ध्यान रखें कि क्या, कब और कितना खाना है.
ज़्यादा फ़ास्टिंग से हाई शुगर का रिस्क?कई लोग बार-बार खाना स्किप करते हैं. अक्सर लोग सुबह का नाश्ता नहीं खाते. भयंकर डाइटिंग करते हैं. लंबे वक्त तक फ़ास्ट रखते हैं. जो लोग अक्सर ऐसा करते हैं, वो मौका मिलने पर ज़रूरत से ज़्यादा खाते हैं. उन्हें मीठा खाने की क्रेविंग भी बहुत होती है. इसके अलावा, फास्टिंग के समय शरीर में क्रॉनिक स्ट्रेस पैदा हो जाता है. इस स्ट्रेस की वजह से शरीर में स्ट्रेस हॉर्मोन कॉर्टिसोल ज़्यादा बनता है. ये हॉर्मोन लिवर से ग्लूकोज़ को रिलीज़ करवाता है. इस वजह से ग्लूकोज़ का लेवल बढ़ सकता है. जिन्हें डायबिटीज़ है, उनकी शुगर कंट्रोल के बाहर जा सकती है.

अगर डायबिटीज़ की फैमिली हिस्ट्री है. वज़न ज़्यादा है. थायरॉइड, ब्लड प्रेशर या कोलेस्ट्रॉल से जुड़ी दिक्कतें हैं. ऐसे लोगों को 35 साल की उम्र से डायबिटीज़ के टेस्ट करवाने शुरू कर देने चाहिए. अगर रिपोर्ट्स नॉर्मल आती हैं, तो हर 3 साल में फिर से टेस्ट कराएं. अगर इनमें कोई भी दिक्कत निकलती है, तो हर साल अपना शुगर लेवल चेक करते रहें.
प्रेग्नेंसी में कई महिलाओं को डायबिटीज़ हो जाती है, इसे जेस्टेशनल डायबिटीज़ कहते हैं. प्रेग्नेंट महिलाओं को दूसरी तिमाही में, यानी 16 से 24 हफ्ते के बीच, ब्लड शुगर चेक करानी चाहिए. इससे पता चलेगा कि कहीं जेस्टेशनल डायबिटीज़ तो नहीं है.
इसके अलावा, कई बार छोटे बच्चों को भी डायबिटीज़ हो जाती है. जिन बच्चों को अपनी उम्र के हिसाब से विकास नहीं होता. जिनकी हाइट या वज़न उम्र के हिसाब से नहीं बढ़ता या जिनमें डायबिटीज़ के कुछ दूसरे लक्षण दिखाई देते हैं. ऐसे बच्चों में भी डायबिटीज़ की स्क्रीनिंग करानी चाहिए. फिर रिपोर्ट के हिसाब से आगे फॉलोअप करना चाहिए.
डायबिटीज़ का कौन-सा टेस्ट सबसे सटीक?डायबिटीज़ में मुख्यत: तीन तरह के टेस्ट होते हैं. पहला, फ़ास्टिंग ब्लड शुगर यानी खाली पेट ब्लड शुगर. दूसरा, पोस्ट-प्रैंडियल यानी खाने के दो घंटे बाद वाली ब्लड शुगर. तीसरा और सबसे ज़रूरी टेस्ट है HbA1c. ये तीन महीने का औसत ब्लड शुगर लेवल बताता है.
इनमें सबसे सटीक टेस्ट HbA1c है. इस टेस्ट के लिए किसी उपवास या फ़ास्टिंग की ज़रूरत नहीं है. अगर इस टेस्ट से दो-तीन दिन पहले आपने मीठा खा लिया है. आपकी डाइट सही नहीं रही है या आप बहुत स्ट्रेस में रहे हैं. तब भी इस टेस्ट पर कोई असर नहीं पड़ता. कई स्थितियों में HbA1c टेस्ट नहीं किया जाता. लिहाज़ा, डॉक्टर से पूछकर ही HbA1c की मॉनिटरिंग करें.
अगर HbA1c का लेवल 6.5% या उससे ज़्यादा आता है. तब इसका मतलब डायबिटीज़ की शुरुआत हो गई है. अगर खाली पेट ब्लड शुगर 126 mg/dl से ज़्यादा आती है. वहीं, खाने के बाद वाली ब्लड शुगर 200 mg/dl से ज़्यादा आती है. तब इसे भी डायबिटीज़ की शुरुआत माना जाता है.

जब मरीज़ डायबिटीज़ की शुरुआती स्टेज में होते हैं. उनका ब्लड शुगर लेवल बहुत ज़्यादा बढ़ा नहीं होता. तब उन्हें लाइफस्टाइल में बदलाव करने को कहा जाता है. मरीज़ को रोज़ एक्सरसाइज़ करने के लिए बोला जाता है. कम से कम रोज़ आधा घंटा या हफ्ते में 150 मिनट एक्सरसाइज़ करने को कहा जाता है.
इसके अलावा, डाइट में सुधार करने को कहा जाता है. मीठा कम खाने के लिए कहा जाता है. डाइट में कार्बोहाइड्रेट घटाना होता है. प्रोटीन को बढ़ाना होता है. अगर वज़न ज़्यादा है, तो उसे कम करने के लिए कहा जाता है. स्ट्रेस मैनेज करने की सलाह दी जाती है. लाइफस्टाइल में सबसे पहले यही बदलाव करने को कहा जाता है. ऐसा करने से ब्लड शुगर कंट्रोल में रहती है. लेकिन सिर्फ़ तभी, जब डायबिटीज़ के लक्षण शुरू में ही पकड़ लिए जाएं.
अगर ब्लड शुगर लेवल बहुत ज़्यादा हाई हो गई है. मरीज़ को कॉम्प्लिकेशंस हो गए हैं. किडनी और नसों पर डायबिटीज़ का असर दिख रहा है. तब दवाइयों का सहारा लेना ही पड़ता है.
रोज़ की कौन-सी गलतियां अवॉइड करें?सबसे पहले स्वीकार करें कि आपको डायबिटीज़ या प्री-डायबिटीज़ है. जब आप इसे स्वीकार करेंगे, तभी इसके लक्षणों और एहतिहातों पर ध्यान देंगे. सबसे ज़रूरी है अपने खानपान पर कंट्रोल रखना. अपना कोलेस्ट्रॉल बढ़ने से रोकें. तला-भुना और मीठा कम खाएं. रोज़ सलाद और फल खाएं. मीठे फल खाने से बचें. रोज़ ड्राई फ्रूट्स और हरी सब्ज़ियां खाएं. अपने खाने में प्रोटीन बढ़ाएं.
साथ ही, रोज़ एक्सरसाइज़ करें. हफ्ते में कम से कम ढाई घंटे एक्सरसाइज़ करना ज़रूरी है. योग और प्राणायाम भी कर सकते हैं. अपनी नींद ठीक से लें और स्ट्रेस मैनेज करें. स्ट्रेस लेने से डायबिटीज़ बिगड़ सकती है. इसके अलावा, अपनी दवाई समय से लें. डाक्टर से सलाह लेते रहें और उसे मानें भी. जो सलाह मिले उस हिसाब से दवाई कम या ज़्यादा करें. अपनी आंखों, किडनी और नसों से जुड़े टेस्ट भी कराते रहें. अपने पैरों की नियमित जांच करें ताकि पता चल सके कि उनमें कोई क्रैक या सुन्नपन तो नहीं आया.

डायबिटीज़ कंट्रोल में रखने के लिए उसकी ABCD ज़रूर याद रखें. यहां A का मतलब है एक्टिव लाइफस्टाइल. रोज़ 30-40 मिनट एक्सरसाइज़ करें. एक्टिव मसल्स शुगर का बेहतर उपयोग करती हैं. इससे ब्लड शुगर लेवल बैलेंस में रहते हैं.
B का मतलब है बैलेंस्ड डाइट. कार्बोहाइड्रेट कम लें. प्रोटीन ज़्यादा लें. फैट भी सीमित मात्रा में खाएं.
C यानी कंट्रोल रिस्क फैक्टर्स. डायबिटीज़ कभी अकेले नहीं आती. साथ में दो-चार बीमारियां भी लाती है. इसलिए, मोटापा कम करें. ब्लड प्रेशर और कोलेस्ट्रॉल कंट्रोल में रखें. स्ट्रेस और स्लीप भी बहुत ज़रूरी है. रोज़ ठीक से सोएं और स्ट्रेस कम लें.
D से डॉक्टर. डॉक्टर से सलाह लें. जब दवाइयों की ज़रूरत पड़े तो दवाइयां लें. इससे डायबिटीज़ को कंट्रोल में रखा जा सकता है
(यहां बताई गई बातें, इलाज के तरीके और खुराक की जो सलाह दी जाती है, वो विशेषज्ञों के अनुभव पर आधारित है. किसी भी सलाह को अमल में लाने से पहले अपने डॉक्टर से ज़रूर पूछें. दी लल्लनटॉप आपको अपने आप दवाइयां लेने की सलाह नहीं देता.)
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