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प्रतीक यादव की जान कार्डियोरेस्पिरेटरी कोलैप्स ने ली, जानें ये क्या और क्यों होता है

प्रतीक यादव को पिछले कई सालों से हाई बीपी की शिकायत थी. करीब 2 साल पहले उन्हें डीप वेन थ्रोम्बोसिस हुआ था. और अभी 2-3 हफ्ते पहले उन्हें पल्मोनरी एम्बोलिज़्म होने का पता चला था. ये वही गंभीर कंडीशन है, जिसकी वजह से हुई कॉम्प्लिकेशंस के चलते प्रतीक की जान चली गई.

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14 मई 2026 (पब्लिश्ड: 10:44 PM IST)
Akhilesh Yadav’s Brother Prateek Yadav Dies of Massive Pulmonary Thromboembolism
प्रतीक यादव
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सपा प्रमुख अखिलेश यादव के छोटे भाई प्रतीक यादव की 13 मई 2026 को मौत हो गई. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में उनकी मौत की वजह कार्डियोरेस्पिरेटरी कोलैप्स बताई गई है, जो मैसिव पल्मोनरी थ्रोम्बोएम्बोलिज्म के कारण हुआ. इसका मतलब है कि उनके शरीर में बना खून का थक्का फेफड़ों तक पहुंच गया था. जिससे वहां खून का फ्लो रुक गया. इससे दिल और फेफड़े सही तरीके से काम नहीं कर पाए और उनकी मौत हो गई.

प्रतीक यादव को पिछले कई सालों से हाई बीपी की शिकायत थी. करीब 2 साल पहले उन्हें डीप वेन थ्रोम्बोसिस हुआ था. और अभी 2-3 हफ्ते पहले उन्हें पल्मोनरी एम्बोलिज़्म होने का पता चला था. ये वही गंभीर कंडीशन है, जिसकी वजह से हुए कॉम्प्लिकेशंस के चलते प्रतीक की जान चली गई. 

पल्मोनरी एम्बोलिज़्म क्या है. कैसे होता है. क्यों होता है. पल्मोनरी एम्बोलिज़्म के लक्षण क्या हैं. इससे इलाज और बचाव कैसे किया जाए. ये सब हमने पूछा रीजेंसी हेल्थ, लखनऊ में इंटरनल मेडिसिन डिपार्टमेंट के कंसल्टेंट, डॉक्टर डी.पी. सिंह से.  

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डॉक्टर डी.पी. सिंह, कंसल्टेंट, इंटरनल मेडिसिन, रीजेंसी हेल्थ, लखनऊ 
पल्मोनरी एम्बोलिज़्म क्या है?

डॉक्टर डी.पी. कहते हैं कि पल्मोनरी एम्बोलिज़्म यानी फेफड़ों की धमनियों में खून का थक्का जम जाना. ये एक गंभीर स्थिति है. इसमें पल्मोनरी आर्टरीज़ यानी फेफड़ों की धमनियों में खून का थक्का जम जाता है. इससे उस हिस्से में खून का फ्लो रुक जाता है. ऑक्सीज़न का बहाव भी कम हो जाता है. जिससे दिल पर दबाव बढ़ता है. व्यक्ति को कार्डियक अरेस्ट पड़ सकता है. यानी दिल अचानक काम करना बंद कर देता है. जिससे उसकी मौत हो सकती है.

पल्मोनरी एम्बोलिज़्म के रिस्क फैक्टर

ये खून का थक्का है जो फेफड़ों तक पहुंचा है. ये शरीर की किसी भी नस में बन सकता है. लेकिन अक्सर ये पैर की गहरी नस में बनता है. इस कंडीशन को डीप वेन थ्रोम्बोसिस कहते हैं. डीप वेन थ्रोम्बोसिस यानी DVT तब होता है, जब कोई व्यक्ति लंबे समय तक एक ही जगह पर बैठा या लेटा रहता है. ऐसे में पैरों की गहरी नसों में खून का फ्लो धीमा हो जाता है. जिससे वहां खून का थक्का यानी ब्लड क्लॉट जम सकता है.

किसी सर्जरी के बाद जब व्यक्ति हॉस्पिटल में कई दिनों तक रहता है. कभी लेटा हुआ, कभी बैठा हुआ. तब भी खून का थक्का जम सकता है. इसी तरह, जो लोग देर तक बैठे या लेटे रहते हैं. खासकर लंबी दूरी की यात्राओं में. उनमें भी खून के थक्के बनने का रिस्क होता है.

जिन्हें थ्रोम्बोफीलिया नाम की कंडीशन है. उनके शरीर में बहुत ज़्यादा खून के थक्के बनते हैं. और पुराने बने हुए थक्के सही से घुल नहीं पाते हैं. इनमें आगे चलकर डीप वेन थ्रोम्बोसिस या पल्मोनरी एम्बोलिज़्म हो सकता है. हॉर्मोन से जुड़ी कुछ दवाएं भी खून के थक्के जमने का रिस्क बढ़ा सकती हैं. और ये थक्के फेफड़ों तक पहुंच सकते हैं.

पल्मोनरी एम्बोलिज़्म के लक्षण

पल्मोनरी एम्बोलिज़्म के लक्षण इस बात पर निर्भर करते हैं कि फेफड़ों के कितने हिस्से पर असर पड़ा है. थक्कों का साइज़ क्या था. और क्या व्यक्ति को पहले से फेफड़ों या दिल की कोई बीमारी है.

पल्मोनरी एम्बोलिज़्म के आम लक्षणों में शामिल हैं- अचानक सांस फूलना. सीने में तेज़ दर्द, जो गहरी सांस लेने पर बढ़ता है. दिल की धड़कन तेज़ होना. चक्कर या बेहोशी. ऑक्सीजन की कमी से होंठ या स्किन नीली भी पड़ सकती है.

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पल्मोनरी एम्बोलिज़्म यानी फेफड़ों की धमनियों में खून का थक्का जम जाना
पल्मोनरी एम्बोलिज़्म का इलाज 

पल्मोनरी एम्बोलिज़्म के इलाज का फोकस खून के थक्के बढ़ने से रोकना और नए थक्के बनने से बचाने पर होता है. इसके लिए मरीज़ को दवाएं दी जा सकती हैं. जैसे ब्लड थिनर्स, जो खून पतला करती हैं और नए थक्के बनने से रोकती हैं. क्लॉट डिसॉल्वर्स दिए जा सकते हैं. जो बने हुए थक्के को घोलने में मदद करते हैं.

अगर फेफड़ों में बहुत बड़ा थक्का है, जो जानलेवा हो सकता है, तो डॉक्टर कैथेटर डालकर उस थक्के को निकाल सकते हैं. कैथेटर एक पतली ट्यूब होती है, जिसे खून की नली के अंदर डालकर सीधे थक्के तक पहुंचाया जाता है, ताकि उसे हटाया या तोड़ा जा सके.

पल्मोनरी एम्बोलिज़्म से बचाव 

पल्मोनरी एम्बोलिज़्म से बचना है तो एक ही जगह पर देर तक न बैठें. अगर डेस्क जॉब करते हैं या अक्सर लंबी दूरी की यात्रा करते हैं. तब हर आधे घंटे में थोड़ा चलें-फिरें. खड़ें हो और शरीर को स्ट्रेच करें.

सर्जरी के बाद आराम ज़रूरी है. लेकिन जैसे ही डॉक्टर कहे, चलना-फिरना शुरू कर दें. सबसे ज़रूरी, डॉक्टर ने जो दवाएं दी हैं. उन्हें टाइम पर लें. 

(यहां बताई गई बातें, इलाज के तरीके और खुराक की जो सलाह दी जाती है, वो विशेषज्ञों के अनुभव पर आधारित है. किसी भी सलाह को अमल में लाने से पहले अपने डॉक्टर से ज़रूर पूछें. दी लल्लनटॉप आपको अपने आप दवाइयां लेने की सलाह नहीं देता.)  

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