चकमक चाचा (कानपुर वालों) की बड़े बाज़ारों से बहुत सुलगती थी. कांख खुजाते हुए कहते थे, 'बेटा बाज़ार वो चीज़ है जहां आदमी गूं बेचने के लिए गूं खा भी सकता है.' किदवई नगर में टहलकदमी करते हुए एक शाम उन्होंने बतलाया, 'ये इत्ते धूर्त हैं कि इनको पत्थर भी मारोगे तो उसे डायनासोर की लेंड़ी बताकर बेच लेंगे.' इसके बाद उन्होंने मसाले की जो पीक थूकी, उसने दीवार पर लगा एक इश्तहार भिगो दिया.
चकमक चाचा की इस थ्योरी पर मुझे तत्काल यकीन तो नहीं हुआ था, पर बाद के सालों में होने लगा. अभी ये बात फिर याद हो आई, शॉपिंग वेबसाइट 'जेबॉन्ग' का नया ऐड देखकर. पहले ऐड देख लें:
https://www.youtube.com/watch?v=9h5BFXMz_XU
वाह! बहोस्सुंदर! पहनने की आज़ादी को एड्रेस करने की बात. कि हम पुरुष हैं, हम झुमके और बड़ी-बड़ी नथुनियां और साड़ियां पहनेंगे, तुम्हें क्या! हम क्वीयर हों न हों, जो मन चाहेगा, हम पहनेंगे. हम लड़कियां हैं, हम समाज की परवाह किए बगैर ड्रेस करेंगी. हरी लिप्स्टिक लगाएंगी. वीडियो के आखिर में लिखा आता है, 'Be you.' यानी जैसे हैं, वैसे रहें.
लेकिन फिर भी इस ऐड पर बवाल मचा है. इसकी वजह है पसमंजर में बज रही लाइन, 'आज बाज़ार में पा-बजौला चलो.' ये लाइन इंकलाबी शायर फैज अहमद फैज़ की मशहूर नज़्म से ली गई है.
मिसाल देखें.
'औरंगजेब' और 'रिवॉल्वर रानी' के नगमे लिख चुके पुनीत शर्मा ने तो तुरंत इस नज़्म की प्रो-मार्केट पैरोडी भी बना डाली.
लेकिन अस्ल टिप्पणी तो राज्यसभा टीवी के जाने-माने चेहरे सैयद मोहम्मद इरफान ने की है. उन्होंने लिखा:
https://www.youtube.com/watch?v=R0S1ySKXrzU
पहले इस नज़्म को पूरा पढ़ लें, समझ लें.
आज बाज़ार में पा-ब-जौला चलो
चश्म-ए-नम जान-ए-शोरीदा काफी नहीं
तोहमत-ए-इश्क़ पोशीदा काफी नहीं
आज बाज़ार में पा-ब-जौला चलो
दस्त-अफ्शां चलो, मस्त-ओ-रक़्सां चलो
खाक-बर-सर चलो, खूं-ब-दामां चलो
राह तकता है सब शहर-ए-जानां चलो
हाकिम-ए-शहर भी, मजमा-ए-आम भी
तीर-ए-इल्ज़ाम भी, संग-ए-दुश्नाम भी
सुबह-ए-नाशाद भी, रोज़-ए-नाकाम भी
इनका दमसाज़ अपने सिवा कौन है
शहर-ए-जानां मे अब बा-सफा कौन है
दस्त-ए-क़ातिल के शायां रहा कौन है
रख्त-ए-दिल बांध लो दिलफिगारों चलो
फिर हमीं क़त्ल हो आयें यारों चलो
आज बाज़ार में पा-ब-जौला चलो
पढ़कर अच्छा सा लगा, लेकिन पहली बार पढ़ी होगी तो कई उर्दू शब्द समझ नहीं आए होंगे. है ना? ये लीजिए
12वीं लाइन में 'उनका' कौन है? वही मज़लूम, मेहनतकश, धार्मिक-राजनीतिक आकाओं का सताया हुआ तबका. तभी वह कहते हैं कि अब उनका 'बासफ़ा' यानी दोस्त कौन है हमारे सिवा. इसलिए हमें ही चलना होगा.
पर ये नज़्म ऐड से कहां जुड़ती है?
फ़ैज़ का मैं बड़ा मुरीद हूं. इतना कि शायर हाशिम रज़ा जलालपुरी के इस शेर से एक नाम हटाकर वहां फैज को रख देता हूं और फिर सुनाता हूं,
दिल की धड़कन पे मुहब्बत का फ़साना लिख दो
वस्ल के एक ही लम्हे को ज़माना लिख दो
लिखना कुछ चाहो अगर नाम के आगे मेरे
मीर का, ग़ालिब का, फ़ैज़ का दीवाना लिख दो
तो अब मैं कहता हूं कि इस ऐड को मैं फैज़ की नज़्म से जोड़कर देख पाता हूं. एक मिनट नाराज़ न हों. पूरी बात सुन लें.
यह बुरा इत्तेफाक रहा कि फैज की इस नज़्म की पहली लाइन 'बाज़ार' जाने को उकसाती है. किसी ऐड गुरु ने इसे 'लिटरल' अर्थों मे लिया और इस पर लट्टू होकर ऐड बना लिया. इसीलिए यहां मुझे चकमक चाचा की दलील ही बेस्टम-बेस्ट लगती है. वरना आप जेबॉन्ग की साइट पर जाकर देखें. पहनावों की जो कैटेगरीज उन्होंने बनाई हैं, वे 'Be you' के भाव से उलट हैं.
फ़ैज़ की लाइन का ऐड में इस्तेमाल नए दौर की नई 'विडंबना' है. पर पर्सनली मैं इससे आहत नहीं हूं. 'भुनाना' बाज़ार का नेचर है जी. उसकी क्रांतियां ऐसी सीमित दायरों वाली ही होंगी. उससे ज्यादा ख़राब बहुत कुछ इस फील्ड में हो चुका है, हो रहा है. ये वो दुनिया है, जहां कोला ड्रिंक में पेस्टिसाइड के सारे आरोप एक फिल्म स्टार आकर पी जाता है और वो फिर से ठंडे का पर्याय बन जाता है.
फ़ैज़ को क्या पता कि इस दौर में 'एंटी इस्टैबलिशमेंट' एक 'कूल' चीज़ हो गई है. जैसे चे गुएवारा की टी-शर्ट्स. लेकिन आखिर में ये सब इस्टैबलिशमेंट को ही मजबूत करता है. यहां इंकलाब की बातें कूल हैं. इंकलाब के नारे पंचलाइन हैं. ये उतना ही बड़ा विरोधाभास है, जैसे लोग 'गे मैरेज' की बात करें या तृप्ति देसाई मंदिर जाने के हक के लिए जमीन-आसमान एक कर दें. ये अंतत: उसी सिस्टम में स्वीकार्यता खोजना है, जो आपका फायदा उठा रहा है.
फैज साहब, इस दौर में आपका बासफ़ा कौन बचा है. सुबह-ए-नाशाद यही है. रोज़-ए-नाकाम यही है.