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द फ्रीलांसर: भारत का कॉन्ट्रैक्ट किलर जो इसराइल की मोसाद से भी तेज़ है (वेब सीरीज़ रिव्यू)

Baby, Special Ops 1.5 और A Wednesday जैसे मनोरंजन विजुअल पीस निर्मित करने वाले Neeraj Pandey लाए हैं The Freelancer. कैसा है Disney Plus Hotstar की इस web series का season 1 जिसमें Mohit Raina, Anupam Kher लीड रोल्स में हैं? इसे देखने का अनुभव और अन्य विवेचनाएं, पढ़ें इस Review में.

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The Freelancer web series review starring Mohit Raina, Anupam Kher
अविनाश कामत, मोसाद के प्रतिनिधि अविगोम के साथ "द फ्रीलांसर' के एक दृश्य में.
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20 दिसंबर 2023 (Updated: 20 दिसंबर 2023, 13:08 IST)
Updated: 20 दिसंबर 2023 13:08 IST
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 Rating: 3.5 stars 

 

सिनेमा की दुनिया में एक मशहूर मर्सिनरी हुआ - रॉनिन. 1998 में इस रोल को प्ले किया रॉबर्ट डीनीरो ने. एक्स-सीआईए. फ्रीलांसर. एक जॉब के सिलसिले में कहता है -  I never walk into a place I don't know how to walk out. दर्शक के लिए 'द फ्रीलांसर' के केंद्रीय पात्र अविनाश की ये दुनिया ऐसी ही है कि प्रवेश करना और निकलना दोनों सुगम रहता है. आप देखने बैठते हैं और खत्म होने पर थोड़ा याद रखते हुए उठ जाते हैं. ऐसा नहीं है कि सीरीज़ प्रडिक्टेबल है, लेकिन सिर में छा जाने वाली खुमारी नहीं है, मदहोशी नहीं है, बस अच्छी लगती है, आप देखते रहते हो.  

सीरीज़ में अविनाश को एक बड़ा कॉन्ट्रैक्ट मिलता है. वह भी मोसाद से - इसराइल की कुख्यात गुप्तचर एजेंसी. मोसाद का बूढ़ा प्रतिनिधि अविगोम कहता है कि अमेरिकी मिलिट्री, स्पेशल फोर्सेज़ के लोगों की हिफ़ाज़त में बंद एक टारगेट को मारना है. ऐसी परियोजना जो भारतीय कॉन्टेंट परिदृश्य में सुनी नहीं. वह फोन पर अपने गुरु डॉ. ख़ान (अनुपम खेर) से पूछता है - “क्या करें?” डॉ. ख़ान कहते हैं - "इसे भली-भांति समझ लेते हैं. वो चाहता है कि तुम तालिबान-कंट्रोल्ड काबुल जाओ. और वहां नेटो कंट्रोल्ड काबुल एयरपोर्ट के अंदर यूएस मिलिट्री की कस्टडी में, एक हिज़बुल्ला एजेंट को ढूंढों, और न्यूट्रलाइज़ करो. इंट्रेस्टिंग!" अविनाश पूछता है - "क्या कहते हैं डॉक्टर?" इस पर डॉ. ख़ान कहते हैं - “करना चाहिए. प्रोफाइल बढ़ेगा”. तो अविनाश करता है. लेकिन क्या उसका और सीरीज़ का प्रोफाइल दर्शक के लिए बढ़ पाता है?

औपचारिक रूप से यह एक एक्शन थ्रिलर सीरीज है. इसका एक्शन वाला भाग, हिज़बुल्ला एजेंट को मारने वाले अगले सीन पर सर्वाधिक टिका होता है. यही अविनाश को स्थापित करेगा. यही सीरीज़ का अंतर्राष्ट्रीय दायरा, सक्षमता सबकुछ स्थापित करेगा. अब यहां आवश्यकता है सैम हारग्रैव जैसे 'एक्सट्रैक्शन' माफिक एक्शन की (चूंकि जब अविनाश पूछता है - दुनिया के सर्वश्रेष्ठ को बाहरी लोगों की जरूरत क्यों पड़ गई, तो मोसाद का अविगोम ख़ुद कहता है - कि तुम हमसे ज्यादा तेज़ी से ये खत्म कर सकते हो). या फिर अविनाश के ही हमपेशा द ट्रांसपोर्टर या द एक्सपेंडेबल्स जैसे करारे, विस्फोटक, अति-वास्तविक लगने वाले एक्शन की. जिसके लिए चाहिए सिनेमैटोग्राफर का ख़ूब हिलता, बेचैन करने वाला हैंडहैल्ड कैमरावर्क और एक्शन डायरेक्टर (अब्बास अली मोगल, जेरेमी विगोट) का आविष्कृत शार्प एक्शन. चाहे एडिटर को एएसएल (एवरेज शॉट लेंथ) 2 सेकेंड प्रति शॉट जितना कम क्यों न करनी पड़े, चाहे एक सेकेंड के शॉट में दर्जन कट क्यों न लगाने पड़ें. द फ्रीलांसर पारंपरिक तरीके से फिल्माई गई है. वाइड एंगल और क्लैरिटी को अहमियत देती है.

लेकिन यहां जो सीन सीरीज का सबसे हाई पॉइंट होना था, वो सबसे कम याद रह जाने वाला हो जाता है. अमेरिकियों की स्पेशल टास्क फोर्स 1-194, जिसे हेकड़ी में टास्क फोर्स बास्टर्ड्स भी बुलाया जाता है, उसके एलीट सोल्जर प्लास्टिक के पुतलों की तरह खड़े रहते हैं और अविनाश की टीम की गोलियां ठक-ठक खाते जाते हैं, गिरते जाते हैं. अविनाश की टीम काबिल है ये सारा एहसास सिद्ध करने का बोझ फिर काबुल एयरपोर्ट की लोकेशन, ढेर सारे अफगान एक्स्ट्राज़, बड़े प्लेन हैंगर्स और गियरधारी नेटो सोल्जर्स के विजुअल्स पर आ जाता है. लेकिन उससे बात नहीं बनती. ये सीरीज़ यह दावा भी नहीं कर सकती कि हम एक्शन को रियलिस्टिक रखना चाहते थे. हीरो ग्लोबल मर्सिनरी है, टॉप एजेंसियां उसकी सेवाएं लेती हैं, चुटकी बजाकर पाकिस्तान के जनरल को किडनैप करके बेच देता है, द फ्रीलांसर के नाम से कुख्यात है, ISIS के एरिया में जाकर किसी को निकालकर बाहर ले आने वाला है, वहां फिर रियलिस्टिक को आप कैसे डिफाइन करोगे?

द फ्रीलांसर एक एस्केप ड्रामा भी है. एक एक्स्ट्रैक्शन एक्शन ड्रामा भी है. इन दोनों कैनवस पर वह कैसे निवृत होती है? एस्केप ड्रामा के लिहाज से क्या अचीव किया जाना होता है, वह आप 'नॉट विदाउट माय डॉटर' (1991) में देखकर समझें. दोनों में हूबहू वही संदर्भ है. वेस्टर्न वैल्यूज़ में पली-बढ़ी एक युवती, साथ पढ़े एक मुस्लिम लड़के से शादी कर लेती है. वो उसे बहला फुसलाकर एक कट्टर इस्लामी देश में ले जाता है. फिर कहता है, मैं झूठ बोलकर तुम्हे लाया हूं, अब तुमको यही रहना होगा. 'नॉट विदाउट माय डॉटर' में उस महिला की एक बेटी भी होती है और वो अमेरिकी क्रिश्चियन होती है जिसे पति ईरान ले जाता है, खोमैनी के राज में. उसे वहां से एस्केप करना है. द फ्रीलांसर में वो लड़की मुंबई की भारतीय मुसलमान होती है, और पति उसे सीरिया ले जाता है. ऐसी घुटन और ग़ुलामी भरी नारकीय परिस्थितियों में एक महिला की क्या मनःस्थिति होगी उसे सैली फील्ड ने टिपिकल ड्रमैटिक्स के साथ ही सही लेकिन बहुत अच्छे से निर्मित किया था. द फ्रीलांसर में यंग एक्टर कश्मीरा परदेसी ये मनःस्थिति अच्छे से प्रकट नहीं कर पातीं, अन्यथा वे ठीक हैं. ISIS की एड़ी तले जो साइकोलॉजिकल पैनिक इंसान महसूस करता है, वो क्लाइमेट पूरी तरह निर्मित नहीं होता.

फिर दूसरा कैनवस है - एक्स्ट्रैशन एक्शन ड्रामा का. उसमें 'अर्गो' (2012) एक डीसेंट डेस्टिनेशन है. बहुत ज्यादा लेयर्स न होते हुए भी उसमें ईरानी स्टेट का भय दर्शक को डराता है. बेन एफ्लेक की अपने लोगों को एक्सफिल्ट्रेट कराते हुए हालत खराब हो जाती है. जब तक विमान उड़ नहीं जाता, तब तक ख़ौफ बना रहता है, जैसा नीरज पांडे की ही 'बेबी' में बना रहता है. द फ्रीलांसर का एक्स्ट्रैक्शन ड्रामा डीसेंट होता है लेकिन उसमें उतनी टेंस कश्मकश नहीं होती. नाखून नहीं खा जाते आप अपने. धीमा धीमा प्लेज़र मिलता है. इस जॉनर में तेज़ गति की आकांक्षा को कहीं सीरीज़ खिंची और धीमी भी लगती है. शिऱीष थोराट की जिस किताब 'अ टिकट टू सीरिया' पर ये आधारित है, वह भी ऐसी ही कम थ्रिलिंग परंतु इंगेजिंग थी.

यह 'अ वेडनेसडे' वाले नीरज पांडे का क्रम-विकास भी है और कमिटमेंट भी कि सीरीज़ में बेस्ट डीटेल्स या कहें तो खूब डीटेलिंग है. एक सीन में अविनाश सीआईए से अपने प्रोटेक्शन के लिए एक लॉयर तक बुलाता है और वीडियो पर बयान दर्ज करता है ताकि भविष्य में किसी इंटरनेशनल या अमेरिकी कोर्ट में सीआईए के खिलाफ तक जा सके. यह बात इस जॉनर की इंडियन कहानियों में नहीं देखी. न तो जवान में, न टाइगर-3 में, न वॉर में, न उससे पूर्व की फ़िल्मों में. हां, ये फ़िल्में स्वैग और स्टाइल में द फ्रीलांसर से आगे हैं. लेकिन द फ्रीलांसर स्वैग के बारे में है भी नहीं. ये रियलिस्टिक होने का एक आवरण बनाकर रखना चाहती है. उसके किरदार साधारण टीशर्ट, हवाईयन शर्ट्स, सलवार कमीज़, टॉप-स्कर्ट, कार्गो पैंट्स, वुडलैंड के जूते पहनते हैं. हां, इंग्लैंड के रॉयल मिलिट्री कॉलेज ऑफ साइंस से पढ़े होने, ग्लोबल सिक्योरिटी में मास्टर्स करके मर्सिनरी बन जाने के चलते अविनाश और उसके दोस्तों के घर पॉश ज़रूर हैं और ये अधिकतर इंटरनेशनल ट्रैवल ही करते हैं. 

अविनाश एक भारतीयता से भरा मर्सिनरी है. वह सीधा-सादा है. फिज़ूल हिंसा, ख़ून-खराबा नहीं करता. जितना अत्यंत आवश्यक हो उतना ही. एक सीन में कुछ लोग उसे चेस कर रहे होते हैं, तो उसका पहला प्लान उन्हें मारने का नहीं, उनसे बचकर भागने का होता. जब संभव नहीं होता तब वो उन्हें पीटता है.

सीरीज़ में नीरज पांडे, रितेश शाह, बेनज़ीर अली फ़िदा की राइटिंग है और डायरेक्टर भव धूलिया की संयुक्तता रही होगी. राइटिंग में कुछ सीन्स और सिचुएशंस हैं जो भा गईं.

एक सीन है जिसमें अविनाश अपनी पत्नी से मिलने एक स्पेशल ट्रीटमेंट सेंटर में जाता है. उसके हाथ में गुलाब के फुलों का बुके होता है. वो एक दरवाजा पार करके अंदर जाता है, रुकता है, एक गुलाब निकालता है औऱ बाकी बुके वहीं फेंक देता है. फिर दो दरवाजे पार करके जाता है, रुकता है, कुछ सोचता है और वो एक गुलाब भी वहीं रख देता है. फिर खाली हाथ ही पत्नी के पास जाकर बैठ जाता है. उसका माथा चूमता है. ये सीन अब तक ज्यों अनफोल्ड हुआ है वो साधारण सा है, लेकिन ये इस पात्र की मनस्थिति, दुविधा, पत्नी की बीमारी और कहानी सुनाने वालों के बारे में कुछ कहता है. कि वे रस लेकर बात सुना, बता रहे हैं. उन्हें सीधा पॉइंट पर आने की जल्दी नहीं. फिर वह पत्नी का माथा चूमता है, तो वो कहती है, मुझे पता था तुम आज आओगे. वो पूछता है - कैसे पता था? तो कहती है - बस दो मिनट पहले वहां सामने एक इंद्रधनुष था. 
अब यहां दो व्याख्याएं मन करना चाहता है. एक कि, वह कह रही है - दो मिनट पहले इंद्रधनुष था और तुम्हारे आने से गायब हो गया. क्या वह उसे कोस रही है? क्या राइटर्स इनके रिश्ते की टूटन और कड़वाहट के बारे में अब तक कोई डेटा न देते हुए भी काफी कुछ इंडिकेट करना चाह रहे हैं. दूसरा अर्थ जिसकी संभावना मैं नहीं देखना चाहूंगा कि - जब तुम आने वाले होते हो तो इंद्रधनुष बन जाता है. यानी एक रोमैंटिक फीलिंग, एक पॉजिटिव फीलिंग. हालांकि, ये ओपन एंडेड व्याख्या वाली इंट्रेस्टिंग राइटिंग आगे नहीं दिखती.

एपिसोड 6 में एक सीन है, जो इस सीरीज का सबसे फनी सीन है. अविनाश एक्स्ट्रैक्शन के लिए सीरिया जा रहा है. अपनी टीम को फोन कर रहा है. जब पूछता है कि एक मिशन पर जाना है तो कुछ लोग हिचकते हैं कि बिजी हैं. लेकिन जब कहता है सीरिया जाना है, आईसिस वाले सीरिया, तो ऐसे उछल पड़ते हैं जैसे कि चॉकलेट फैक्ट्री में चार्ली. एक अमेरिकी साथी अपनी गर्लफ्रेंड के बर्थडे पर उस प्रपोज़ करने जा रहा होता है. वो मना कर देता है. लेकिन जब अविनाश बोलता है कि "हम" सीरिया जा रहे हैं, तो बेचैन, पागल हो जाता है, छटपटाने लगता है. सीरिया उसके दिमाग में किसी प्रेमिका की छवि जैसे घूमने लगता है. इतना कि जब असल प्रेमिका सामने से रही होती है तो पीठ करके भाग छूटता है, औऱ वो पीछे से आवाज देती ही रह जाती है.

एक सीन है, जिसे इंडियन वेब सीरीज़ स्पेस के सबसे ख़ास सीन्स में रखूंगा. जब अविनाश फ़रहत ख़ाला नाम की महिला को खोजते हुए आता है (जिसे बालाजी गौरी में ख़ूब प्ले किया है, उर्दू में थोड़ी असहजता के साथ), जो लोगों को रेडिकलाइज़ करती है. जब दोनों आमने सामने बैठते हैं तो लगता है संवादों की शतरंज खेल रहे हैं, ठंडे दिमाग से. 
अविनाश पूछता है : आप बहुत करीब हैं मोहसिन के घरवालों के. 
फ़रहत : बिलकुल. मैं तो बस ऊपरवाले की बात करती हूं. और वो लोग सुनते हैं मेरी.
अब यहां सीन में करंट सा आता है. जब सुधीर पलसाने और टोजो ज़ेवियर का कैमरा उठकर, पूरा क्लोज़ अप बनाकर (कई अन्य प्रभावोत्पादक सीन्स की तरह), अविनाश के चेहरे के सामने जाता है. वो एकदम शांत, संयत, कमाल चित्त के साथ पूछता है : क्या बात करती हैं आप?
वो कहती है : क्या बात करती थी ये आपकी समझ में नहीं आएगा.
वो बर्फीला ठंडा दिमाग कायम रखते हुए कहता है : आप बताइए. मैं कोशिश करूंगा. पढ़ा लिखा हूं, थोड़ा बहुत समझ लेता हूं. 
जब वो जवाब नहीं देती और इरीटेट होने का हिंट सा देने लगती है तो अविनाश तंज के साथ कहता है : डरिए मत. 
अब उसकी बारी है. फ़रहत पूरी निर्लज्जता और ईविलनेस के साथ, खुलकर सामने आने के अंदाज़ में पूछती है कि : तुम्हारा नाम बेटा? 
अब यहां सीरीज़ में पहला मौका होता है जब अविनाश इतना असहज हुआ है. अब उसे लगने लगा है कि ये दुष्ट तो ऊंचे दर्जे की है. सीधी अंगुली से बात न बन सकेगी.
फ़रहत फिर डंक मारती है : सिर्फ नाम ही तो पूछा है. डरो मत. मैं तो दावत दे रही थी. सही राह पर आने की हिदायत. मेरा तो बस काम है याद दिलाना.
अब अविनाश अपना नर्म लबादा उतारता है. आप से तू पर आते हुए पूछता है : कौन सी तंज़ीम के लिए रिक्रूट करती हो?
और डंक जाकर ज़ोर से उसे लगता है. फ़रहत का पूरा आउटलुक बदल जाता है. कहती है : ओ साहब. मेरी किसी तंज़ीम से कोई वाबस्तगी नहीं!

कैरेक्टर्स भी ऐसे हैं जो याद रह जाने वाले हैं. डॉ. ख़ान को लें. एक ईज़ी, ठहरा हुआ, विद्वान, मैच्योर, मुस्लिम उम्मा में न मानने वाला, नेशन-स्टेट में मानने वाला, लिबरल मुस्लिम किरदार है. 'बेबी' के फेरोज़ अली ख़ान की तरहा. रात को लाइट ड्रिंक के साथ रूसी कंपोज़र चायकोवस्की का क्सालिक 'स्वॉन लेक' सुनते हुए अपने मास्टरपीस बुनता है. अनुपम खेर यहां ज़ेन मुद्रा में बस मेकअप पहनकर बैठते हैं, संयत रहकर संवाद बोलते हैं औऱ कैरेक्टर निखर आता है. अपने संवाद तो वे अचंभित करने वाली स्ट्रेटनेस और सहजता के साथ डिलीवर करते हैं. आईबी के अधिकारी सेतु के पात्र को ले लें. गजब का बिल्ड. दाढ़ी. साउथ इंडियन एक्सेंट. किसी से न डरने वाला. तेज़ दिमाग़. एंट्रो सीन में एक ज़रूरी बैठक में भिड़ते ही गुत्थी सुलझा देता है कि इनायत खान का अमेरिकी कॉन्सुलेट के बाहर हमला/सुसाइड करना सिर्फ अटेंशन पाने का एक तरीका था. वो चाहता था कि ये एक ब्रेकिंग न्यूज़ बने. जॉन कोक्केन का निभाया सेतु का पात्र अपने बूते स्पिन ऑफ की क्षमता रखता है. 

अविनाश का पात्र तो है ही, जिसे मोहित रैना ने एक नेचुरल कैपेसिटी और सहजता से प्ले किया है. डॉ. ख़ान के साथ उनके संवाद बहुत फाइन और स्ट्रेट हैं. बिना किसी संबोधन के दोनों मक्खन की तरह फ़ोन कॉल शुरू करते हैं और खत्म करते हैं. दो सीआईए एजेंट्स को हाई स्कूल टीन्स की तरह चक्कर घुमाकर वो निकल जाता है अपनी बातों से, वो कमाल है. उनमें से एक सीआईए एजेंट राधा बख्शी के रोल में सारा ज़ेन डियेज़ तीक्ष्ण, स्मार्ट हैं. हिंदी सिनेमा में उनका सदुपयोग नहीं हुआ. द फ्रीलांसर में वो एक शार्प, एरुडाइट सीआई एजेंट के रूप में स्थापित होती हैं. होम मिनिस्टर डी. के. पाटिल के रोल में मनोज कोल्हाटकर याद रहते हैं. वो भी फाइन, इंटरनल एक्टिंग करते हैं. ख़ासकर वो सीन जहां दवे उन्हें मर्सिनरी का मतलब बताता है और कहता है क्यों अविनाश से दूर रहना आपके हित में है.

द फ्रीलांसर के साथ कई अच्छी चीजें हैं, कुछ कम अच्छी. डीनीरो का रोनिन अपने मर्सिनरी वर्क के सिद्धांतों में एक यह रखता है कि - all good things comes to those who wait. हालांकि द फ्रीलांसर के मामले में ये ज़रा उल्टा है. यहां इंतजार करने पर जो तमाम अच्छी चीज़ें मिलती हैं, वो इतनी लेट आती हैं कि मारकता कम कर गुजरती हैं.  अविनाश और उसके साथियों का मुखर ह्यूमर छठवें एपिसोड में जाकर आता है. जब चीजें खत्म होने को हैं. सीजन 1 के पार्ट 1 में चार एपिसोड रिलीज़ किए गए. जिन्होंने डीसेंट हुक बनाकर रखा, लेकिन पार्ट 2 द कनक्लूजन बहुत महीने बाद आया, तब तक पहले पार्ट से पैदा हुआ थ्रिल, जिज्ञासा, निरर्थक सी हो गई. अविनाश और डॉ. खान के रिश्ते की हिस्ट्री जो खान, सेतु को बताता है वो भी लेट प्लेसमेंट लगता है.

ये सारी चीजें भरपाई योग्य हैं. लेकिन दो चीजों की क्षतिपूर्ति नहीं हो पाती, जो सीरीज के एक्सपीरियंस को कई तल ऊपर ले जा सकती थीं.

पहली, सीरीज का एक्शन जो बहुत बेसिक है. अविनाश के मोटे तौर पर चार एक्शन सीन है. दो में हैंड-टू-हैंड कॉम्बैट होता है. लेकिन बाकी दो में सब अपनी गन्स से मोस्टली सपाट शूटिंग करते रह जाते हैं. लेयरिंग, इन्वेंटिवनेस और शॉक वैल्यू मिसिंग होती है.

दूसरी चीज है - ISJP यानी ISIS का चित्रण. जो कि कम डरावना लगता है. वो ख़ौफ का क्लाइमेट निर्मित नहीं होता जिसमें बंधक रहते हैं. इससे साइकोलॉजिकल डेप्थ निर्मित नहीं हो पाती कैरेक्टर्स में. वो सिर्फ ऊपर ऊपर की लेयर में रहती है. एक कच्चापन, यथार्थता मिसिंग लगती है. 2021 में एक डॉक्यूमेंट्री आई थी - सबाया. ये ISIS के क़ब्ज़े से अपनी बेटी को छुड़ाने की एक आदमी की असल कहानी है. इस विषय-वस्तु में भय के वास्तविक वातावरण को आप महसूस कर पाएंगे.

ख़ैर, ये बात यहीं तक.

अस्तु!

Web / TV Series: The Freelancer, Season 01 । Creator: Neeraj Pandey । Director: Bhav Dhulia । Cast: Mohit Raina, Anupam Kher, Kashmira Pardeshi, John Kokken, Sarah Jane Dias, Sushant Singh, Manjari Fadnis, Ayesha Raza Mishra, Navneet Malik, Balaji Gauri, Manoj Kolhatkar, Sangay Tsheltrim । Total Episodes: 07 । Duration: 5hr (approx.) । Rating: 3.5 stars

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