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किस्से 'गदर' के: 3 हजार लोग सिनेमा के बाहर इकट्ठा हुए, बोले: "अभी पिक्चर दिखाओ, नहीं तो थिएटर तोड़ देंगे"

लोग ट्रैक्टर पर बैठकर पिक्चर देखने आते, गदर मेला लगता था.

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गदर मचा दी थी 'गदर' ने
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अनुभव बाजपेयी
24 फ़रवरी 2023 (अपडेटेड: 24 फ़रवरी 2023, 02:24 PM IST)
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पिक्चर की इतनी डिमांड, एक दिन में आठ शो चल रहे हैं. सुबह 3 बजे से पहला शो रखा जा रहा है. लोग ट्रकों में भरकर फिल्म देखने आ रहे हैं. अगर 500 लोग बैठे हैं, तो 100 खड़े होकर पिक्चर देख रहे हैं. ये मल्टीप्लेक्स वाले दौर से पहले की बात है. आज का दौर होता, तो इस फिल्म के गानों पर इतनी रीलें बनती, इंस्टाग्राम क्रैश हो जाता. पर वो 2001 की बात है. तारा सिंह पाकिस्तान जाकर हैंडपंप उखाड़ लाए. जनता पगला गई. पांच करोड़ से ज़्यादा लोगों ने 'गदर' देख डाली. अब जब ‘गदर 2’ आ रही है, हम पुरानी गदर काटने वाली पिक्चर के किस्सों पर बात करेंगे. बताएंगे, कैसे गोविंदा स्क्रिप्ट सुनकर डर गए? कैसे पिक्चर के लिए इकट्ठी भीड़ ने थिएटर तोड़ने की धमकी दे डाली और हैंडपंप उखाड़ने वाले सीन के पीछे की कहानी. शुरू करते हैं.

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सनी देओल तारा सिंह के रोल में
# "मैं बर्बाद हो गया. मेरा थिएटर टूट जाएगा"

14 जून 2001. गुरुवार को अहमदाबाद में 'गदर' का प्रेस शो हुआ. अमीषा पटेल और डायरेक्टर अनिल शर्मा सुबह 6 बजे बॉम्बे पहुंचे. अनिल को यात्रा की थकान थी. नींद आई, सोफ़े पर ही सो गए. कुछ घंटों बाद फोन बजा. उधर से आवाज़ आई:

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फोन पर अनिल शर्मा ही थे. उन्होंने हामी भरी. फिर आवाज़ आई:

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अनिल शर्मा ने आदमी का परिचय पूछा. उसे शांत होने को कहा.पता चला, वो आवाज़ थी भुवनेश्वर के एक थिएटर मालिक की. उसने कहा:

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दरअसल फिल्म के एक शो का इन्टरवल हुआ था. अगले शो से पहले ही तीन हज़ार लोग बाहर आ गए थे. वो थिएटर को तोड़ने की धमकी दे रहे थे. अनिल शर्मा की सांसे अटकी जा रही थी, कहीं दंगा तो नहीं होने वाला. उन्हें जानना था आखिर हुआ क्या? आगे की बातचीत में पता चला, उन तीन हज़ार लोगों को तुरंत पिक्चर देखनी है, नहीं तो थिएटर तोड़ देंगे. थिएटर मालिक आगे कहता है:

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अनिल शर्मा एक्साइटेड थे. खुश थे. उन्हें लग रहा था, गाड़ी चल निकली. उन्होंने अपनी पत्नी से खुशी ज़ाहिर की, कहा: 'गदर' हो गया. उनकी पत्नी ने सामने पड़ा अखबार दिखाया, उसमें फिल्म का रिव्यू छपा था. उसकी हेडलाइन थी: गटर-एक प्रेम कथा. 

# कहानी पंजाब में लगे गदर मेला की

'गदर' ने ऐसी धूम मचाई कि कुछ समय बाद ये एक त्योहार बन गई. एक ऐसा दौर आया कि लोग थिएटर में जमीन पर बैठकर फिल्म देखते थे. जनता लाइन लगाए खड़ी रहती, सिनेमा हॉल वालों के टिकट खत्म हो जाते. बॉक्स ऑफिस इंडिया के मुताबिक 'गदर' का इंडिया में फुटफॉल पांच करोड़ पांच लाख है. 'हम आपके हैं कौन' का 7.39 करोड़ और 'बाहुबली 2' का 5.25 करोड़ फुटफॉल है. यानी फुटफॉल के मामले में 'गदर' तीसरे नंबर पर है. हालांकि अनिल शर्मा तो कहते हैं कि इसका फुटफॉल 17 करोड़ है, जो पॉसिबल नहीं है. संभव है, वो वर्ल्डवाइड फुटफॉल बता रहे हों. फिर भी 17 करोड़ बहुत बड़ा नंबर है. खैर, इसकी पॉपुलरिटी की एक और मिसाल देते हैं.  

पिक्चर रिलीज़ हुए करीब छह महीने हो चुके थे. एक फाइनांसर आए. डायरेक्टर साहब को गले लगाने की इच्छा जाहिर की. कारण पूछने पर वो सुनाते हैं एक किस्सा. फाइनांसर पंजाब के गांव में एक थिएटर खोलना चाह रहे थे. उसी सिलसिले में वहां जमीन देखने पहुंचे. पता चलता है, वहां मेला चल रहा है. वो भी कोई ऐसा वैसा नहीं, 'गदर मेला'. लोगों ने टेंट लगा रखे थे. वहीं अपना खाना बनाते थे. पब्लिक ट्रैक्टर से भरकर तीन-चार दिनों के लिए रुकने आई थी. वहां जनता पिक्चर के बैक-टू-बैक कई शोज़ देखती और फिर घर जाती. फाइनांसर साहब यही सब देखकर भावनाओं के अतिरेक में अनिल को गले लगाना चाहते थे. गले लगाकर उन्होंने कहा होगा: क्या बवाल चीज़ बना दिए हो बे.

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अशरफ अली और सकीना
# हैंडपम्प की जगह बिल्डिंग उखाड़ देते सनी देओल

बहरहाल इस किस्से के बाद बढ़ते हैं, हैंडपंपीय किस्से की ओर. 'गदर' को याद करने की तमाम वजहें हो सकती हैं. यदि आपको एक ऑप्शन चुनना हो, तो आप शायद सनी देओल का हैंडपंप उखाड़ना ही चुनेंगे. जब अनिल शर्मा ये सीन शूट करने वाले थे. उनके क्रू में ही कई लोग थे, जो नहीं चाहते कि तारा सिंह हैंडपंप उखाड़े. पहले-पहल सनी भी इसके लिए राज़ी नहीं थे. पर डायरेक्टर साहब ने उन्हें मना लिया था. कई लोगों ने इसे अतार्किक बताया. पर अनिल का मानना था, इमोशन का कोई लॉजिक नहीं होता. गुस्से में आदमी कुछ भी कर देता है. आदमी सौ लोगों को अकेला मार सकता है.

उस सीन में सिचुएशन कुछ ऐसी थी कि तारा सिंह, अशरफ अली की सारी बातें मान लेता है. पाकिस्तान ज़िंदाबाद से लेकर इस्लाम कुबूल करने तक. अब इसके बाद उससे हिंदुस्तान मुर्दाबाद बोलने को कहा जाता है. इस पर तारा सिंह आग बबूला हो जाता है. अब यहां अनिल शर्मा को इमोशन्स का आउटबर्स्ट दिखाना था. ऐसा लगे कि इससे ज़्यादा गुस्सा कुछ हो नहीं सकता. अनिल ने एक जगह कहा है कि उनका बस चलता तो वो तारा सिंह से बिल्डिंग उखड़वा देते. पर ऐसा संभव नहीं था. बिल्डिंग को हाथ से पकड़ा नहीं जा सकता. इसलिए उन्होंने हैंडपंप उखड़वाया. अनिल शर्मा कहते हैं:

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# कश्मीरी पंडितों पर फ़िल्म रोककर बूटा सिंह की 'गदर' बना डाली

अनिल शर्मा कश्मीरी पंडितों के पलायन पर फिल्म बना रहे थे. वो राइटर शक्तिमान तलवार के साथ कई महीनों से इस फिल्म पर लगे हुए थे. कास्टिंग के लिए कई ऐक्टर्स से बात भी हो चुकी थी. अमिताभ और दिलीप कुमार लगभग राज़ी भी हो गए थे. उस फिल्म में एक सबप्लॉट की ज़रूरत थी, कश्मीर का लड़का और POK की लड़की की प्रेम कहानी. माथापच्ची चल रही थी. शक्तिमान और अनिल ने दुनिया की सौ बेस्ट लव स्टोरीज पढ़ी. इसी बीच एक दिन शक्तिमान अनिल के पास पहुंचे और ब्रिटिश सेना में सैनिक बूटा सिंह की कहानी सुना डाली.

भारत-पाक बंटवारे के वक्त बूटा ने एक मुस्लिम लड़की ज़ैनब की जान बचाई थी. दोनों को प्यार हुआ. शादी हुई. बेटी हुई. चूंकि ज़ैनब मुसलमान थी. इसलिए उसे पाकिस्तान भेज दिया गया. बूटा सिंह को पाक नहीं जाने दिया गया. ज़ैनब के लिए वो गैरकानूनी तरीके से पाकिस्तान पहुंच जाता है. उसके परिवार वालों से मिलने की कोशिश करता है. पर ज़ैनब के घरवाले उसकी शादी चचेरे भाई से करा देते हैं. इधर बूटा सिंह को पाकिस्तान में गैरकानूनी तरीके से घुसने के लिए पकड़ लिया जाता है. उसे बताया जाता है कि ज़ैनब ने बूटा से की गई शादी मानने से इनकार कर दिया है. इससे बूटा इतना दुखी होता है कि ट्रेन के आगे कूदकर जान दे देता है.

ये कहानी अनिल शर्मा ने नेहरू जी की एक किताब में भी पढ़ रखी थी. उन्होंने सोचना शुरू किया. और शक्तिमान से कश्मीर वाली पिक्चर ड्रॉप करने को कहा. अब उन्हें इस कहानी पर पिक्चर बनानी थी. अनिल ने 20 मिनट का समय लिया और एक मुकम्मल कहानी के साथ आ गए. पर एक ट्विस्ट के साथ. वो ट्विस्ट उनके दिमाग में आया 'रामायण' से. राम सीता को लेने लंका जाते हैं. यहां फ़र्क ये है कि तारा सिंह सकीना को लेने पाकिस्तान जाएगा, वो भी अपने बेटे के कहने पर. शक्तिमान ने स्क्रीनप्ले पर काम किया. स्क्रिप्ट ज़ी स्टूडियो को सुनाई. उन्हें पसंद आ गई. सनी देओल को नरेट की गई. उन्होंने भी हां कर दी. जब स्क्रिप्ट का नरेशन अमरीश पुरी को दिया गया, तो वो भावुक हो गए. उनकी आंखों में आंसू आ गये थे. ऐसा ही कुछ लिरिसिस्ट आनंद बख्शी के साथ भी हुआ. अनिल उन्हें पिक्चर सुना रहे थे. वो ढाई घंटे के नरेशन में कई बार वॉशरूम गए. अनिल को लगता, सिगरेट पीने गए होंगे. पर वो अपने आँसू छुपाने के लिए बार-बार उठकर जाते थे. जब नरेशन खत्म हुआ, आनंद बख्शी ने नम आंखों से शर्मा को गले लगाते हुए कहा: "ये तुम्हारी मुगल-ए-आज़म है."  

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सनी देओल और अमीषा पटेल
# सनी देओल ने 'गदर' के लिए शराब पीने की शर्त लगाई

कई सालों तक ये अफवाह रही कि सनी देओल से पहले गोविंदा को 'गदर' के लिए साइन किया जाना था. पर फिल्ममेकर अनिल शर्मा ने इस अफवाह को खारिज कर दिया. उन्होंने गोविंदा को कभी 'गदर' के लिए साइन नहीं किया था. अनिल और गोविंदा 'महाराजा' नाम की फिल्म पर साथ काम कर रहे थे. इसी फिल्म के सेट पर अनिल ने गोविंदा को 'गदर' की स्क्रिप्ट सुनाई. मगर गोविंदा ये रोल करने के लिए एक्साइ़टेड होने की बजाय डर गए. उन्हें लग रहा था कि इतने बड़े स्केल की फिल्म कौन बना पाएगा. तिस पर फिल्म के एक बड़े हिस्से की शूटिंग के लिए इंडिया में पाकिस्तान का सेट बनाना था. जो कि उस वक्त के लिहाज़ से बड़ा मुश्किल काम था. 

'गदर' के लिए सनी देओल ही अनिल की पहली चॉइस थे. कहते हैं फिल्म की शूटिंग में करीब सवा साल लग गए. दरअसल फिल्म में सनी देओल को एक लंबे समय के लिए दाढ़ी बढ़ाकर रखनी थी. पर वो ब्रेक लेकर दूसरी पिक्चर शूट करने चले जाते. इस बीच उन्हें क्लीन शेव होना पड़ता और दाढ़ी बढ़ाने में फिर दो महीने लगते. इस कारण से भी फ़िल्म के शूट में इतना समय लग गया. अनिल शर्मा के मुताबिक उनके और सनी देओल के बीच में एक शर्त लगी थी. फिल्म के प्रीमियर पर अगर तगड़ा रिस्पॉन्स मिला, तो दोनों लोग व्हिस्की पिएंगे. पिक्चर का प्रीमियर हुआ. जनता पागल हो गई. कई दिनों तक अनिल शर्मा के पास तारीफ़ों के फोन आते रहे. इसके बाद ताज होटल में पार्टी हुई. सनी और अनिल दोनों ने व्हिस्की का एक-एक पेग लगाया. यहां कमाल बात ये है कि बकौल अनिल, न वो खुद पीते थे और न ही सनी पाजी.

# सकीना के लिए काजोल थी पहली पसंद

ऐसा कहा जाता है कि सकीना के रोल के लिए काजोल पहली पसंद थीं. अनिल ने इसके लिए उस दौर की कई बड़ी हीरोइनों से बात की थी. पर बात बनी नहीं. कई हीरोइनों ने तो इसलिए मना कर दिया क्योंकि उन्हें धूल-मिट्टी में काम करना पड़ता. इसके बाद फिल्म में नए चेहरे को लेने का फैसला किया गया. अलग-अलग एजेंसियों से लड़कियों की तस्वीरें मंगाई गई. कुल 400 लड़कियों ने अप्लाई किया. उसमें से 40 लड़कियां शॉर्टलिस्ट हुई. उन्हें ऑडिशन और स्क्रीनटेस्ट के लिए बुलाया गया. उसी में से एक लड़की थी अमीषा पटेल, जिन्हें 'गदर' में लीड रोल मिला. हालांकि 'गदर' से पहले 'कहो ना प्यार है' रिलीज़ हो चुकी थी. जिसने ऋतिक रौशन और अमीषा पटेल दोनों को ही रातों-रात सुपरस्टार बना दिया. पर जब अमीषा 'गदर' के लिए ऑडीशन दे रही थीं, उस वक़्त उनकी कोई पिक्चर रिलीज नहीं हुई थी. अमीषा, सकीना के रोल पर काम करने के लिए हफ्ते में पांच दिन अनिल शर्मा के घर जाती थीं. वहां रिहर्सल करती थीं. ये क्रम छह महीने तक चला, परिणाम आप सबके सामने है. ऐसा भी कहा जाता है कि वो अपने सभी डायलॉग याद करके सेट पर आतीं. पर सनी देओल के सामने भूल जाती थीं. इसके पीछे सनी देओल जैसे बड़े कलाकार के सामने आने की नर्वसनेस थी.

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अनिल शर्मा के बेटे उत्कर्ष ने फिल्म में जीते का रोल किया था
# जब हजारों लोग कुर्ता-पायजामा पहन सेट पर आ गए

'गदर' में एक स्टीम इंजन दिखता है. जब फिल्म शूट हुई, उस वक़्त तक स्टीम इंजन का इस्तेमाल बंद हो चुका था. बड़ी मुश्किलों में इसे दिल्ली म्यूजियम से उधार लिया गया. इस इंजन का नाम था, अकबर. आगे चलकर इसे 'भाग मिल्खा भाग' में भी इस्तेमाल किया गया. आउटलुक में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक ट्रेन में लाशें लदकर आने वाला सीन अमृतसर रेलवे स्टेशन पर शूट किया गया था. पूरे स्टेशन को 40 के दशक की तरह सजाय गया. कई तरह के उस दौर के सामान लाए गए. इसके लिए भीड़ चाहिए थी. अब इतने जूनियर आर्टिस्ट कहां से लाए जाते. मेकर्स ने ये प्रचारित कर दिया कि जो भी कुर्ते-पायजामे में होगा, शूट का हिस्सा बन सकता है. रातोंरात कुर्ते-पायजामे की बिक्री बढ़ गई. लोकल पब्लिक शूट में टूट पड़ी. पहले दिन शूट हुआ, तो कुछ हंगामा भी हो गया. भीड़ ने क्रू पर पत्थरबाजी भी कर दी. पुलिस को लाठीचार्ज भी करना पड़ा.

इस सीन के शूट के दौरान लोग भावुक हो गए थे. लगभग सबकी आंखों में आंसू थे. सीन खत्म हो गया. एक बूढ़े सरदार जी प्लेटफॉर्म की कुर्सी पर बैठे, अपना सिर पीट रहे थे. वो रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे. डायरेक्टर अनिल शर्मा ने उनके पास जाकर उन्हें बताया कि पाजी सीन पूरा हो चुका है. सरदार जी ने सिर ऊपर उठाया. उनकी आंखों में आंसू थे.  अपने रुँधे गले से उन्होंने कहा: आज से पचास साल पहले भी मैंने ऐसा ही मंज़र अपनी आंखों से देखा था, मैं उस वक़्त सिर्फ़ 10 साल का था.

# ट्रेन क्रू पर चढ़ने वाली थी

ट्रेन वाला ही एक सीन शूट होना था. इसके लिए मोटर ट्रॉली की ज़रूरत थी. माने स्वचालित ट्रॉली, जिसे ट्रेन के आगे रेलवे ट्रैक पर चलाया जा सकता. पर उस दिन मोटर ट्रॉली मिल नहीं पाई. मैनुअल ट्रॉली का जुगाड़ ही हो सका. पर शूट तो करना ही था. इतना सब तामझाम हुआ था. ट्रेन चल रही है, उसके आगे ट्रैक पर ट्रॉली को 10-12 फाइटर धक्का देकर दौड़ा रहे हैं. उस पर तीन कैमरे थे. सिनेमैटोग्राफर और डायरेक्टर समेत क्रू के और भी कई लोग थे. एक समय ऐसा आया, ट्रेन ट्रॉली के बहुत नज़दीक आ गई. इधर से लोग चिल्ला रहे हैं. गाड़ी रोको. पर ड्राइवर को न दिख रहा था, न सुनाई दे रहा था. यहां तक कि जब ट्रेन प्लेटफॉर्म से गुज़री. उस पर से भी लोग ट्रेन रोकने को चिल्लाने लगे. अब ट्रेन और ट्रॉली के बीच बस 50 फुट की दूरी थी. क्रू ट्रॉली से कूद गया. पर अब भी तीन कैमरे समेत काफी सामान वहां था. किसी तरह ड्राइवर ने ये देख लिया. एमरजेन्सी ब्रेक मारा. गाड़ी पांच फुट दूरी पर आकर रुकी.

अभी हमारे पास 'गदर' के और किस्से हैं. जैसे: पेरिस में कराची की एक दुकान से अनिल शर्मा की पत्नी ने कपड़े खरीदे. दुकानदार ने फिल्म में जीते बने, उनके बेटे उत्कर्ष को पहचान लिया. सामान फ्री में दिया. चूंकि मामला अब बहुत खिंचता जा रहा है, हम अपनी गाड़ी यहीं रोकते हैं. अलविदा.

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