अनुराग कश्यप की फ़िल्म. रमन राघव 2.0. आदतन एक डार्क फ़िल्म बनाई है. रमन राघव काबैकग्राउंड ऐसा है कि उसका नाम इंडिया के सबसे खौफ़नाक सीरियल किलर्स में से एक है.ऐसी कहानी अनुराग कश्यप पर और भी ज़्यादा फबती है. फिल्म में हैं नवाज़ुद्दीनसिद्दीकी और विकी कौशल. नवाज़ जो खुद कहते हैं कि वो सबसे अच्छा काम अनुराग कश्यप केडायरेक्शन में करते हैं. फ़िल्म रिलीज़ होने को है 24 जून को. रमन राघव का म्यूज़िकआया है. म्यूज़िक दिया है राम संपत ने. राम संपत जिन्हें हम जानते हैं सत्यमेव जयतेके आखिर में आने वाले एक गाने से. वो हर बार वहां मौजूद रहते थे. 'ओ री चिरइय्या'लिखने वाले अगर स्वानंद किरकिरे थे तो उस गाने की म्यूज़िक देने वाले राम संपत हीथे. डेल्ही बेली के भाग डी.के. बोस के पीछे भी इन्हीं का दिमाग था. डेल्ही बेली केम्यूज़िक डायरेक्टर राम संपत ही थे. इनके खाते में तलाश का म्यूज़िक भी लिखा है. इसबार नम्बर है रमन राघव 2.0 का. फिल्म के गानों को लिखा है वरुण ग्रोवर ने. वरुणग्रोवर कश्यप की फिल्मों के गाने लिखते हैं तो लगता है कि कश्यप ने फिल्म उस गानोंके लिए ही बनाई है. कश्यप की फिल्मों में बाकी हिंदी फिल्मों की तरह गाने नहींदिखाए जाते हैं. चूंकि ये एक डार्क फिल्म है, इसमें गानों की गुंजाइश और भी कम होजाती है. कम से कम इसमें हमें 3-4 मिनट तक फॉरेन लोकेशन पर पहाड़ों पर चढ़े हुएहीरो-हिरोइन नहीं ही दिखेंगे. यकीनन इस फिल्म के गाने भी गैंग्स ऑफ़ वासेपुर यादेव-डी की तरह बैकग्राउंड में सुनाई देते रहेंगे. इधर है रमन राघव 2.0 की म्यूज़िकका पोस्टमार्टम. क़त्ल-ए-आम "है सराफ़ा दिल का और ये, वक़्त बोहनी का हुआ लाख की येचीज़ साहब, कौड़ियों के दाम है आपकी आंखों में वरना, आज कत्ल-ए-आम है" ये गाना ऐसेआता है जैसे करंट लगा हो. इसमें वो बेस है जो 'सुल्तान' की 'बेबी' को पसंद है.इलेक्ट्रॉनिक म्यूज़िक, जिसे आवाज़ तेज़ करके ही सुना जाना चाहिए. गाने का पूरा फ़ीलडार्क रक्खा गया है और आवाज़ सोना महापात्रा की है. सोना उन सिंगर्स में से हैं जोअपनी आवाज़ से ही गाने को डार्क या रोमांटिक मूड दे सकती हैं. पूरे गाने का जूस है'कत्ल-ए-आम' में. गाने के दौरान गूंजता रहता है. किसी नारे जैसा. मानो रमन और राघवसे इंट्रोड्यूस करवा रहा हो. वासेपुर में डब्स्टेप लाने के बाद ये एक औरएक्सपेरिमेंट है अनुराग का. बेहूदा "एक धक्का और दे, सारे धागे तोड़ दे पीने के पानीमें, ज़हर की नाली छोड़ दे अपने ही अक्स की आ गर्दन तू घोंट दे जा दिन के चेहरे पेकाली रातें पोत दे." ये गाना इस फ़िल्म का ब्लड सैम्पल है. ब्लड सैम्पल से शरीर केइतिहास और भूगोल के बारे में पता लगाया जा सकता है. ये वही गाना है. कानों में'तेरी खाल में रेंगें कीड़े, तू सच्चा बेहूदा' जाते ही आप तिलमिला उठते हैं. प्यार,प्यार और प्यार की आदत लगा देने वाले फ़िल्मी गानों के बीच ये गाना हंसिया मालूमदेता है. आपने इसे छुआ नहीं कि खून निकाल देगा. आवाज़ है नयनतारा भटकल की. कई टीवीविज्ञापनों और एनएच10 के एक गाने में अपनी आवाज़ देने के बाद उन्हें राम संपत ने इसगाने के लिए चुना. एक बहुत ही अलसाई सी आवाज़, डार्क म्यूज़िक में आपको एक बेहदबेहूदा इंसान के वजूद के बारे में बताया जा रहा है. और आप बंधते चले जाते हैं. आपमुट्ठियां भींचना शुरू करते हैं और खुद-ब-खुद दांत पीसने लगते हैं. ये सारा कमालवरुण ग्रोवर के काटने दौड़ते शब्द और नयनतारा की आवाज़ का जादू है. पानी का रास्ता"आसमां, इतना सारा था आसमां मिट गया कच्चे ख्वाब सा रात ने मेरा दिन खाया..." फ़िल्मका एक और निराशा से भरा गाना. सिद्धार्थ बसरूर की आवाज़ में. किसी के सब कुछ लुटजाने की कहानी सुनाते हुए. कानों में चुप-चाप चीखने की कोशिश करते हुए. बाकी गानोंकी तरह इस गाने में भी इलेक्ट्रॉनिक म्यूज़िक की भरमार है. पानी का रास्ता गाना एकआदर्श राम संपत म्यूज़िक का प्रूफ देता है. राघव थीम फिल्म में अभी तक क्लियर नहींहै कि रमन कौन है और राघव कौन. लिहाज़ा ये कहना भी मुश्किल होगा कि आखिर ये थीमकिसकी है. नवाज़ की या विकी कौशल की? फ़िल्म के प्रोमो और उसमें दिखाई लाइफ़स्टाइल केहिसाब से ये थीम मुझे विकी कौशल की लगती है. और इससे ये भी निशाना लगा सकता हूं किराघव नाम है विकी का और रमन नवाज़ का. खैर, इस गाने में शब्द नहीं है. या ये कहें किइस गाने को शब्दों की ज़रुरत नहीं है. ये सिर्फ़ इलेक्ट्रो म्यूज़िक से लबालब एक पीसहै जो आपको मिनट भर में गुस्से से भर सकता है. आपकी ताकत एक जगह केन्द्रित कर आपसेकुछ भी करवा सकता है. इस पीस में एक ताकत है जो आपको ट्रांसफर होती मालूम देती है.ड्रग्स, सेक्स और बन्दूक से लैस राघव को इसी ताकत के मद में देखा गया है. क़त्ल-ए-आम(अनप्लग्ड) "सब सुनाते हैं कि हमने हक़ ही क्यूं तुमको दिया? जानेजां खुद ही बताएं,ये कोई इल्ज़ाम है? आपकी आंखों में वरना आज कत्ल-ए-आम है" गाना वही है. बोल भी वही.आवाज़ भी वही. बस मूड अलग है. तीखी सी गिटार की धुन पर अकूस्टिक सेटिंग में गाने कादूसरा वर्ज़न एक ही लिरिक्स होने के बावजूद पूरी तरह से दूसरे मायने देता है. पहलावाला जहां आपको एक तेज़ चलती सड़क पर उलटे डायरेक्शन में आते ट्रैफिक के सामने दौड़लगाता हुआ मालूम देता है. वहीं ये अनप्लग्ड वर्ज़न आपको किसी शांत बीच पर हाथ में एकबियर की बोतल पकड़े चिल करने को भेज देता है.--------------------------------------------------------------------------------कुल मिलाकर फ़िल्म में गाने निराशा, गुस्से और विनाश करने की ताकत से भर देने वालेगाने हैं. शायद दो साइकोपाथ्स के आपस में टकराने कहानी यही चाहती थी. हालांकि येसभी अभी अनुमान ही हैं. असली पर्दा फिल्म के पर्दे पर आने के बाद खुलेगा. सप्रेम!https://www.youtube.com/watch?v=Ixa5beTfpUE