बॉक्सर लड़की. कोच मर्द. मुहब्बत, मुक्का और ममत्व...
फिल्म रिव्यूः साला खड़ूस
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फोटो - thelallantop
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फिल्मः साला खड़ूस
ड्यूरेशनः 107 मिनट
एक्टरः आर माधवन, रितिका सिंह, जाकिर हुसैन, नसार
डायरेक्टरः सुधा कोंगरा
रेटिंगः 5 में 3 स्टार
पंकज मिश्रा की एक किताब है. बटर चिकन इन लुधियाना. उसका है ये किस्सा. हिमाचल के पहाड़ों पर सोनिया गांधी के दो मायके वाले मिलते हैं. और भारतीय जवान से एक ही बात कहते हैं. इंडिया को बुरी तरह से सेक्स थैरपी की जरूरत है. ये क्या बात हुई. विदेशियों ने महान भारतीय सभ्यता का अपमान किया क्या.
फड़को मत. समझ लो. उनका मतलब ये था कि यहां हर लड़की को सिर्फ और सिर्फ एक सेक्स ऑब्जेक्ट की तरह देखा जाता है. और गोरी चमड़ी वाली विदेशियों को तो खासतौर पर. कि ये तो बस चुटकी बजाते ही किसी के साथ सो जाती हैं. साक्षात सेक्स मशीन हैं. शिलाजीत समर्पित कर दो इनके कुंड में.
साला खड़ूस देखी. ये याद आ गया. फिल्म में भी एक ठरकी नेशनल सेलेक्टर है. वुमेंस टीम का. उसका क्राइटेरिया सिंपल है. कोच सर को स्खलित करो और आगे बढ़ो. पर एक दिक्कत है. वो ये कि सबका दिमाग उनके अंडकोष से नहीं लटका होता. कुछ वजह बेवजह जूनूं की खातिर खेलते हैं. जीते हैं. ऐसा ही एक आदमी था आदी. बॉक्सर. मगर उसके कोच ने झाम कर दिया. मेन फाइट के पहले ग्लव्स में सिरका मल दिया. आंख में पसीना. ग्लव्स स्पर्श. और करियर आंसू संग बह निकला. अब आदी कोच बन गया है. मगर फेडरेशन, इसकी पॉलिटिक्स और फेवर करने के तरीके उसे रास नहीं आते. नतीजतन, डंप कर दिया जाता है. चेन्नई में.
यहां उसे मिलती है एक लड़की. मादी. मत्स्य कन्या. ऐसी ही एक कन्या को देखकर शांतनु का चित्त डोला था. पापा के चक्कर में भीष्म रंडुवा रह गए थे. और आखिर में महाभारत मची थी. मगर मादी ऐसी नहीं है. इसलिए स्मृतियों को दुत्कार दें.
मादी अनगढ़ चट्टान सी है. आदी छेनी हथौड़ी ले जुट जाता है. मूरत निकालने में. या कि हार की जीत हासिल करने में. इस दौरान दिक्कतें आती हैं. मादी की गरीबी. उसकी बॉक्सर बहन का ईगो. उसका अपना कच्चापन.
मगर हौसला हारता नहीं. कम से कम कहानियों में तो नहीं. शुक्र है. क्योंकि यकीन बचा रहना चाहिए. ताकि कुछ भी होना बचा रहे.
माधवन का क्यूटपना बरकरार है. डीडी मेट्रो पर सी हॉक्स सीरियल के आने से अब तक. लेशमात्र भी कमी न आई. इधर बीच में तोंद आ गई थी, मगर बॉक्सिंग वाले रोल ने चर्बी छांट दी. बढ़िया एक्टिंग की है उन्होंने. पर आज मेरी सारी तारीफ रीतिका सिंह के लिए. किक बॉक्सर थी ये लड़की. एक्टिंग की कोई तामील नहीं. पहली दफा कैमरा देखा. और कमाल कर दिया. शाबाश.
एक धौल फिल्म की डायरेक्टर सुधा को भी. उन्होंने ये रिस्क लिया. पहली बार फिल्म बना रही थीं. फिर भी किसी स्थापित एक्ट्रेस को बॉक्सर नहीं बनाया. एक एथलीट को रोल दिया. इसके दो फायदे हुए. किरदार का अनगढ़पन बचा रहा. और हमारे चेहरे पर पंच, पसीने के बीच पश्मिने की खुशबू लिए एक ताजी हवा भी आ लगी.
चेन्नई की बैकग्राउंड के चलते हिंदी को नया पैरहन मिला. इसलिए डायलॉग दिलकश लगते हैं कहीं-कहीं.
एक खूबी और है फिल्म में. सेक्स की लिसड़ पिसड़ के बीच सेक्सुएलिटी की झीनी भीनी रस्साकशी. मादी का कोच पर क्रश. कोच की एकनिष्ठ सोच. एक तरफ मुहब्बत, तो दूसरी तरफ ममत्व सा कुछ. और डायरेक्टर भी आखिर में इस निजी आख्यान को अधखुला छोड़ देता है. सब अपनी सोच मुताबिक झांक लें. तस्वीर बना लें. वैसे मुकम्मल तो सब वहां ही हो जाता है, जब मादी उछलकर बंदरिया के बच्चे सी अपने कोच से लिपट जाती है. लटक जाती है.
अब कुछ कमियां भी गिनवा लें.
फिल्म की कहानी में कई कहानियां घुसेड़ दी गई हैं. ये अच्छा होता है. मल्टी लेयर्ड. कई कैरेक्टर. अलग-अलग किस्म के तनाव. पर इसके चक्कर में एक छूट भी हो जाती है. मेन किरदारों के बीच का द्वंद. और किरदार की अपनी लड़ाई. अपने भीतर से. यहां भी इसकी कमी खली. एक क्लासिक फिल्म याद आ रही थी. मिलियन डॉलर बेबी.
कहानी और स्क्रीनप्ले की एक कमी और है. हालांकि मैरीकॉम के मुकाबले यहां बहुत कम है. फिर भी. जिक्र जरूरी लग रहा है. मेलोड्रामा. एथलीट तभी जीतेगा, जब उसका इमोशनल एंकर फंस जाए. अटके और आखिर में उबरे. ये सब चमत्कार के मानिंद लगता है. नकली लगता है. फिल्मी लगता है. हिंदी सिनेमा को इससे निजात पानी ही होगी. हर बार कोच कबीर खान, आंसू, उपेक्षा और कितनी बार दिखाओगे भइया.
राजकुमार हिरानी का प्रॉडक्शन है. और इसकी झलक फिल्म की एडिटिंग में दिखती है. बेवजह नहीं खिंचती साला खड़ूस कहीं पर भी. सब कुछ रफ्तार के साथ कई सिम्तों में घटता है.
गाने और म्यूजिक औसत के अल्ले-पल्ले हैं. झल्ली पटाका रिदमिक है. उत्तर भारतीय हिंदी दर्शकों के लिए वैसे भी साउथ का सब धान बाइस पसेरी ही तुलता है. कुम कन्ना कुम कन्ना बजाओ रे. एक और गाना है. स्लो सैड सॉन्ग. स्वानंद किरकिरे का ही लिखा.
क्या गजब का ये खेल खेला वक्त ये क्या कर गया ख्वाब बनके आया था तू याद बनके रह गया. इसकी आखिरी दो पंक्तियां टंकती सी है. साला खड़ूस देखी जानी चाहिए. इसके कच्चेपन में एक सच्चापन है.https://www.youtube.com/watch?v=HZRXsnqcbEs

