1998 में एक फिल्म आई थी. ऐतिहासिक. ये पहला मौका था जब फिल्म आई और इतिहास मेंदर्ज हो गई. उसके बाद जो भी हुआ, सब कुछ इतिहास का हिस्सा बन गया. मतलब, दुनिया मेंसमय को दो हिस्सों में बांटा गया है. ईसा के जन्म से पूर्व और उसके बाद. मगर उसफ़िल्म ने समय को दो हिस्सों में बांट दिया. ईसा कहीं किनारे बैठे रहे, और समय कोबांटने वाले का नाम हो गया कान्ति शाह. फिल्म का नाम - गुंडा.यहां ये ज़रूर बता दिया जाए कि इस वक़्त अगर आप सोच रहे हैं कि गुंडा क्या है या फिरआपने इस फ़िल्म के बारे में सुना है फिर भी देखा नहीं है तो समय आ गया है कि आप एकआईने के सामने खड़े हों और खुद को तमाचे मारते जाएं.आज फ़िल्म देखी गई ट्रिपल एक्स. xXx. विन डीज़ल और दीपिका पादुकोण की ये फ़िल्म xXxसीरीज़ का एक हिस्सा है. बचपन में इसकी पहली किस्त देखी थी. मेरे जीवन की पहलीअंग्रेजी पिक्चर. गांव से पढ़ने के लिए शहर में भेजा गया था. वहां, स्कूल की ओर सेये फ़िल्म दिखाने ले गए थे. वापस आया था तो हाथ पांव फूले हुए थे. लग रहा था कि नमालूम क्या देख लिया है. तब तक हम आपके हैं कौन और तिरंगा जैसी फिल्में ही नसीब मेंहोती थीं. मगर ये कुछ नया था. ज़ेंडर केज जब एक बर्फ़ गिराते पहाड़ के आगे आगे दौड़ रहाथा तो कलेजा हलक में आने को था. उससे अच्छा कुछ नहीं था. अंग्रेजी फिल्मों का चस्कातब ही से लग गया. तीसरी किस्त देखी. ऐक्शन फ़िल्म थी. मगर रह-रह कर गुंडा फिल्म कीयाद आ रही थी. पुरानी (तीन चार साल पहले) की बॉलीवुड फ़िल्मों को छोड़ दें तो उसकेबाद की सभी ऐक्शन फ़िल्में बनाने वाले डायरेक्टर्स को एक दफ़े बिठा के गुंडा फ़िल्मदिखाई जानी चाहिए. क्योंकि xXx की ये किस्त निहायती घटिया है. इस फ़िल्म को बनानेवालों को गुंडा से यकीनन इतना कुछ सीखने को मिलता कि वो इस फ़िल्म को ऑस्कर मेंदावेदारी के लिए भेज सकते थे.गुंडा. इमोशन और ऐक्शन का बेजोड़ मिश्रण. ये वो फिल्म थी जिसने देश के सभीइंजीनियरिंग स्टूडेंट्स को एकजुट किया था. वही स्टूडेंट्स जो अब तक सचिन वर्सेज़द्रविड़, सहवाग वर्सेज़ वार्नर, ज़हीर वर्सेज़ एन्डरसन में पीले पड़े रहते थे. वो जोलड़ते थे कि कमरे में आयशा टाकिया का पोस्टर चस्पा होगा या अमीषा पटेल का. वोस्टूडेंट्स जो एक-एक पेग, एक-एक kash के लिए जूझते रहते थे, उन्हें एकता के सूत्रमें पिरोया तो किसने? गुंडा ने. और एक ये कूड़ा है. xXx. खाली डायलॉगबाजी. वो भीअंग्रेजी में. कहीं पर भी लयबद्धता नहीं. कहीं कोई गद्य और पद्य नहीं. "मेरा नाम हैबुल्ला. मैं रखता हूं खुल्ला." "मेरा नाम है पोते. जो अपने बाप के नहीं होते.""मुन्नी. मेरी बहन मुन्नी. तू मर गई? लम्बू ने तुझे लम्बा कर दिया? मचिस की तीली सेखंबा कर दिया?" जैसे तमाम ऐतिहासिक डायलॉग से लैस फिल्म गुंडा. इन डायलाग के बारेमें गुलज़ार वुलज़ार और श्याम बेनेगल से बातें करो तो बगलें झांकने लगें. एक वोडायलॉग और एक दीपिका पादुकोण. छी! फ़िल्म में जब बोलती हैं तो लगता है उल्टी बस होनेही वाली है. कैसे भी बस रोकनी पड़ती है.दीपिका पादुकोण का ये है कि उन्हें फ़िल्म में क्यूं रखा है, इसे अगले साल के आईएएसएग्ज़ाम में पूछा जाना चाहिए. उनके काम में क्या समझ में आया, ये तो इंटरव्यू काक्वेश्चन बनता है. एकदम आखिरी राउंड का. इसमें किसी को कुछ भी समझ में आ जाए तो उसेतुरंत कलेक्टर बना दिया जाना चाहिए. दीपिका पादुकोण फिल्म में वैसी ही लगती हैंजैसे बिरयानी में इलायची. जैसे यज्ञोपवीत संस्कार में अर्थी. जैसे क्रिकेट मैच मेंसफ़ेद तौलिया. जैसे यूपी इलेक्शन में ओवैसी. जैसे नोटबंदी में मोदी. जैसे इंडियन टीममें युवराज सिंह. जैसे टीवी पर स्वामी ओम. जैसे भाषण देते राहुल गांधी. जैसे चरखाचलाते माननीय मोदी जी. जैसे अमरीका के प्रेसिडेंट की कुर्सी पर ट्रंप. जैसे पंजाबका अगला सीएम कैंडिडेट अरविन्द केजरीवाल. जैसे अमिताभ का बेटा अभिषेक. ठीक वैसी हीलगती हैं दीपिका पादुकोण. और वो जैसे ही बोलना शुरू करती हैं तो लगता है जैसेक्रिकेट मैच के दौरान कोई ग्राउंड में टहलने आ गया हो. उन्हें नहीं होना चाहिए था.और नहीं होना चाहिए था का मतलब एक ही है - उन्हें नहीं होना चाहिए था. उन्हें सीखलेनी चाहिए थी गंगा से. जब चुटिया और बुल्ला मिलकर उसे मोलेस्ट करते हैं और उसकेबाद उसकी हत्या कर देते हैं तो उसके चेहरे पर उससे ज़्यादा एक्सप्रेशन थे जो दीपिकाकी आवाज़ और उसके चेहरे में मिलाकर नहीं थे. xXx का ये है कि जैसे एक लड़के की कहानीहो. एक ऐसे लड़के की कहानी जो अपने आप को शाना समझता हो. लेकिन पूरी दुनिया जब उसेदेखती हो तो उसपे हंसती हो. विन डीज़ल को मिथुन चक्रवर्ती से कोचिंग लेनी चाहिए.उसने प्लेन से नीचे बिना पैराशूट के कूद लगाके भी उतना इम्प्रेस नहीं किया जितनामिथुन दा ने साइकिल के पीछे छुपकर गोली चलाकर किया. विन डीज़ल को चाहिए कि वो थोड़ीऐक्टिंग सीख लें और साथी ही अपने सर पर बाल उगा लें. उन्हें ब्रेक डांस सीखनाचाहिए. लड़कियों को इम्प्रेस करने के लिए वो गोली चलाते हैं और ऐसे डायलॉग बोलते हैंजिसे वो कूल समझते हैं. वो कूल नहीं बल्कि सर खाने वाले डायलॉग होते हैं. और उससेइम्प्रेस भी वो हुई जो पूरी तरह से फिल्म में मिसफिट थी. गंगा की महाजूनियर. दीपिकापादुकोण ऐसे ही काम कर रही होतीं तो गुंडा में उन्हें भीड़ में खड़े होने का रोल भीनहीं मिलता. और विन डीज़ल को क्लैप के लिए भी नहीं रखा जाता.--------------------------------------------------------------------------------xXx यानी फ़िल्म के नाम पर कलंक. ऐक्शन फ़िल्म के नाम पर चिड़िया का मूत. जिसमें आपडूब कर जान भी नहीं दे सकते. आप इंतज़ार करते रहते हैं कि कब फिल्म खत्म हो. चूंकिआपने iMax में काफ़ी खर्चा करके फिल्म देखी है इसलिए आप पैसे वसूलने के चक्कर मेंबैठे रहते हैं. लेकिन मन ही मन खुद को कोस रहे होते हैं. इस फिल्म से जुड़े सभीलोगों को खुद को कोसना चाहिए. जी भर के. उन्हें एक टाइम मशीन बनवानी चाहिए और उसवक़्त में वापस जाना चाहिए जहां उन्होंने इस फिल्म पर काम करने को हां कहा था. औरफिर उस पल को बदल देना चाहिए. जिससे न मैं ये लिख रहा होता. और न आप इसे पढ़ रहेहोते. कितना अच्छा होता न?--------------------------------------------------------------------------------https://www.youtube.com/watch?v=MQEFmHsseaU