सेटअप वही है. जो पुलिस वाली फिल्मों में हमेशा से रहा है. खाकी, बेल्ट, सितारे, रेबैन के एविएटर्स, चौड़ी चेन वाली बड़े डायल की घड़ी, वर्दी का मान, इमानदारी की शपथ,और वही सब जो होता आया है. गुंडे होते हैं. गरीब किसानों की जमीन हड़पते हैं.बेटियों का रेप करते हैं. लेकिन गुंडों के ऊपर विधायक का हाथ होता है. विधायक केऊपर मुख्यमंत्री का. अच्छे अफसर का ट्रांसफर हो जाता है. और फिर हीरो आता है. लास्टमें सब ठीक हो जाता है. खैर. फर्क एक है. ये कि इस बार हीरो आता नहीं, आती है. आभामाथुर. लेकिन इस बारे में बाद में बात करेंगे. पहले बात करेंगे प्रकाश झा यानी बीएनसिंह की. बहुत उम्दा ऐक्टिंग. जिनकी परफॉरमेंस के पीछे प्रियंका की परफॉरमेंस छोटीलगती है. विलेन हैं. हीरो हैं. ऐंटी-हीरो हैं. 'सब पवित्तर कर देंगे' के जूनून मेंविलेन की जान लेना चाहते हैं. उसी विलेन की जिसके ये फिल्म की शुरुआत में तलवेचाटते थे. इनका कैरेक्टर एक सफर तय करता है. नेताओं के हाथ का खिलौना होने से लेकरकानून को अपने हाथ का खिलौना बना लेने तक. इनका कैरेक्टर प्रियंका के कैरेक्टर कीतरह सपाट नहीं, बल्कि ग्रो करता है. गुंडे लड़की का रेप कर उसे पेड़ की डाल पर लटकादेते हैं. कहते हैं सुसाइड है. फिर तंग आ चुकी पब्लिक एक-एक कर विलेन के सारेप्यादों को पीट-पीट कर मार डालती है. पुलिस कुछ नहीं कहती. पुलिस को लगता है किजनता अपने अपराधियों को खुद सजा दे, ये एक अच्छी बात है. लेकिन आभा माथुर जिले कोमॉब लिंचिंग से रोक लेती है. हम मान सकते हैं कि आभा माथुर की आवाज प्रकाश झा किआवाज है. लेकिन ये आवाज मॉब लिंचिंग की खिलाफ गला फाड़ कर क्यों नहीं निकलती? जबगुस्से में पगलाई भीड़ एक रेपिस्ट को पब्लिक में एक नाबालिग के हाथों मरते देख खुशहोती है, तो फिल्म देखने वालों को उसमें वो पेन क्यों नहीं दिखता जो रेप के सीन मेंदिखता? तो फिल्म आपसे कहती है कि 'बुरे' के प्रति हिंसा मॉरल स्तर पर गलत नहीं है.पर सबसे मॉरल 'खाकी' का मान है. जिसे बचाने के लिए जरूरी है इस 'मॉरल हिंसा' को रोकदिया जाए. बात आभा माथुर की. पूरी 'मर्द' है भाई साब. सारे पुलिस वाले 'मैडम सर'बुलाते हैं. मैडम सर बस कभी-कभी ऑफ ड्यूटी एक काली बिंदी लगा लेती है. ड्यूटी परगुंडों को डंडे से पीटती है. औरतों की इज्जत बचाती है. इमानदार है. खाकी की इज्जतकरती है. लेकिन वो तो अमिताभ बच्चन के दिनों से होता आ रहा है. तो फिर प्रकाश झा नेएक फीमेल ऐक्टर को फिल्म में ला कर किया क्या? कौन सी नई सोच लेकर आए? औरत भी 'मर्दकी तरह' डंडा चला सकती है, तमाचे जड़ सकती है. इसके अलावा प्रियंका चोपड़ा के किरदारने फिल्म देखने वालों को क्या दिया? अंत में फिल्म का हीरो औरत नहीं, मर्द ही है.वो मर्द जिसका नाम आभा माथुर है. जो पुलिस वालों को 'नपुंसक' से 'मर्द' बनाती है.और हीरो ही नहीं, फिल्म में जिस लड़की का रेप होता है, उसे छोड़ कर सभी मर्द हैं.विलेन का खास चेला ट्रांसजेंडर (मुरली शर्मा) भी. इसके अलावा फिल्म जगह-जगह चाट होजाती है. डंडा, तमाचा, फांसी रिपीट मोड पर. लेकिन देख सकते हैं एकाध बार. इसलिएफ्री हों तो देख आइए. वरना आपकी पायरेटेड प्रिंट देखने की क्षमता पर लल्लन को कोईशक नहीं है.