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'जय गंगाजल' फिल्म रिव्यू: डंडा, तमाचा, फांसी, रिपीट

ऐक्टिंग मस्त है, कहानी वही पुरानी.

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फोटो - thelallantop
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प्रतीक्षा पीपी
4 मार्च 2016 (अपडेटेड: 12 मई 2016, 12:36 PM IST)
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सेटअप वही है. जो पुलिस वाली फिल्मों में हमेशा से रहा है. खाकी, बेल्ट, सितारे, रे बैन के एविएटर्स, चौड़ी चेन वाली बड़े डायल की घड़ी, वर्दी का मान, इमानदारी की शपथ, और वही सब जो होता आया है. गुंडे होते हैं. गरीब किसानों की जमीन हड़पते हैं. बेटियों का रेप करते हैं. लेकिन गुंडों के ऊपर विधायक का हाथ होता है. विधायक के ऊपर मुख्यमंत्री का. अच्छे अफसर का ट्रांसफर हो जाता है. और फिर हीरो आता है. लास्ट में सब ठीक हो जाता है. खैर. फर्क एक है. ये कि इस बार हीरो आता नहीं, आती है. आभा माथुर. लेकिन इस बारे में बाद में बात करेंगे. पहले बात करेंगे प्रकाश झा यानी बीएन सिंह की. बहुत उम्दा ऐक्टिंग. जिनकी परफॉरमेंस के पीछे प्रियंका की परफॉरमेंस छोटी लगती है. विलेन हैं. हीरो हैं. ऐंटी-हीरो हैं. 'सब पवित्तर कर देंगे' के जूनून में विलेन की जान लेना चाहते हैं. उसी विलेन की जिसके ये फिल्म की शुरुआत में तलवे चाटते थे. इनका कैरेक्टर एक सफर तय करता है. नेताओं के हाथ का खिलौना होने से लेकर कानून को अपने हाथ का खिलौना बना लेने तक. इनका कैरेक्टर प्रियंका के कैरेक्टर की तरह सपाट नहीं, बल्कि ग्रो करता है. गुंडे लड़की का रेप कर उसे पेड़ की डाल पर लटका देते हैं. कहते हैं सुसाइड है. फिर तंग आ चुकी पब्लिक एक-एक कर विलेन के सारे प्यादों को पीट-पीट कर मार डालती है. पुलिस कुछ नहीं कहती. पुलिस को लगता है कि जनता अपने अपराधियों को खुद सजा दे, ये एक अच्छी बात है. लेकिन आभा माथुर जिले को मॉब लिंचिंग से रोक लेती है. हम मान सकते हैं कि आभा माथुर की आवाज प्रकाश झा कि आवाज है. लेकिन ये आवाज मॉब लिंचिंग की खिलाफ गला फाड़ कर क्यों नहीं निकलती? जब गुस्से में पगलाई भीड़ एक रेपिस्ट को पब्लिक में एक नाबालिग के हाथों मरते देख खुश होती है, तो फिल्म देखने वालों को उसमें वो पेन क्यों नहीं दिखता जो रेप के सीन में दिखता? तो फिल्म आपसे कहती है कि 'बुरे' के प्रति हिंसा मॉरल स्तर पर गलत नहीं है. पर सबसे मॉरल 'खाकी' का मान है. जिसे बचाने के लिए जरूरी है इस 'मॉरल हिंसा' को रोक दिया जाए.
jai gangajal
बात आभा माथुर की. पूरी 'मर्द' है भाई साब. सारे पुलिस वाले 'मैडम सर' बुलाते हैं. मैडम सर बस कभी-कभी ऑफ ड्यूटी एक काली बिंदी लगा लेती है. ड्यूटी पर गुंडों को डंडे से पीटती है. औरतों की इज्जत बचाती है. इमानदार है. खाकी की इज्जत करती है. लेकिन वो तो अमिताभ बच्चन के दिनों से होता आ रहा है. तो फिर प्रकाश झा ने एक फीमेल ऐक्टर को फिल्म में ला कर किया क्या? कौन सी नई सोच लेकर आए? औरत भी 'मर्द की तरह' डंडा चला सकती है, तमाचे जड़ सकती है. इसके अलावा प्रियंका चोपड़ा के किरदार ने फिल्म देखने वालों को क्या दिया? अंत में फिल्म का हीरो औरत नहीं, मर्द ही है. वो मर्द जिसका नाम आभा माथुर है. जो पुलिस वालों को 'नपुंसक' से 'मर्द' बनाती है. और हीरो ही नहीं, फिल्म में जिस लड़की का रेप होता है, उसे छोड़ कर सभी मर्द हैं. विलेन का खास चेला ट्रांसजेंडर (मुरली शर्मा) भी. इसके अलावा फिल्म जगह-जगह चाट हो जाती है. डंडा, तमाचा, फांसी रिपीट मोड पर. लेकिन देख सकते हैं एकाध बार. इसलिए फ्री हों तो देख आइए. वरना आपकी पायरेटेड प्रिंट देखने की क्षमता पर लल्लन को कोई शक नहीं है.

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