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रैलियों से ज्यादा रील्स में नजर आएंगे नेता! इंफ्लुएंसर्स निभाएंगे विधानसभा चुनाव में अहम किरदार

Assembly Elections 2026: रैलियों में अक्सर वही लोग आते हैं जो पहले से पार्टी के समर्थक होते हैं. लेकिन इन्फ्लुएंसर उन युवाओं तक पहुंचते हैं जो अभी तय नहीं कर पाए कि वोट किसे देना है. यही वजह है कि अब नेता जी मंच पर कम और मोबाइल स्क्रीन पर ज्यादा दिख रहे हैं. किसी दिन किसी यूट्यूबर के पॉडकास्ट में, किसी दिन इंस्टाग्राम रील में, तो कभी गेमिंग स्ट्रीम के बीच अचानक आकर.

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 Assembly Election 2026
रैलियों से नहीं, रील्स (Reels) से जीता जाएगा चुनाव?
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दिग्विजय सिंह
12 मार्च 2026 (पब्लिश्ड: 05:37 PM IST)
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पश्चिम बंगाल, असम, तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी…ये वो राज्य हैं, जहां इस साल विधानसभा चुनाव होने हैं. कहने की जरूरत नहीं कि बीजेपी से लेकर कांग्रेस तक और टीएमसी से लेकर डीएमके तक तमाम सियासी दल चुनावी तैयारियों से जुट गए हैं. नेताओं और कार्यकर्ताओं की रणनीति तो बन ही रही है. मगर अबकी बार सोशल मीडिया इंफ्लूएंसर्स भी चुनावों को लेकर कमर कस रहे हैं.

ना-ना व्यू और लाइक्स की खातिर नहीं बल्कि नेताओं को उनके प्रचार में मदद के लिए. एक समय था जब चुनाव का मौसम आते ही गांव कस्बों में धूल उड़ती थी. ट्रकों पर लाउडस्पीकर, गाड़ियों के काफिले, पोस्टरों से भरी दीवारें और मैदानों में हजारों की भीड़. नेता मंच पर आते थे, हाथ हिलाते थे, भाषण देते थे और भीड़ तालियां बजाती थी.

लेकिन 2026 का चुनाव कुछ और कहानी लिख रहा है. अब नेता जी मंच पर कम और मोबाइल स्क्रीन पर ज्यादा दिख रहे हैं. किसी दिन किसी यूट्यूबर के पॉडकास्ट में, किसी दिन इंस्टाग्राम रील में, तो कभी गेमिंग स्ट्रीम के बीच अचानक आकर.

राजनीति का नया अखाड़ा, अब चौपाल या मैदान नहीं है. नई बिसात बिछी है यूट्यूब, इंस्टाग्राम और शॉर्ट वीडियो प्लेटफॉर्म पर. और इस मैदान के खिलाड़ी हैं सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स.

सवाल बड़ा है? क्या अब चुनाव रैलियों से नहीं बल्कि रील्स से जीते जाएंगे?

PM Modi
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक पॉडकास्ट में (फोटो- इंडिया टुडे)
रैली बनाम रील: किसकी पहुंच ज्यादा

राजनीति हमेशा वहां जाती है जहां लोग होते हैं. और आज लोग सबसे ज्यादा कहां हैं? जवाब है- मोबाइल स्क्रीन पर.

एक बड़ी चुनावी रैली में अगर 40 से 50 हजार लोग भी आ जाएं तो उसे सफल माना जाता है. लेकिन एक बड़े इन्फ्लुएंसर का वीडियो कुछ ही घंटों में लाखों लोगों तक पहुंच जाता है.

आज के डिजिटल इकोसिस्टम में तीन बड़े बदलाव हुए हैं.

पहला बदलाव: पहुंच

एक लोकप्रिय यूट्यूबर का वीडियो या रील 24 घंटे में 50 लाख से लेकर 1 करोड़ तक लोगों तक पहुंच सकती है. 

दूसरा बदलाव: लागत

रैली में मंच, टेंट, बसें, भीड़ जुटाने की व्यवस्था, सुरक्षा और मीडिया मैनेजमेंट सब मिलाकर करोड़ों रुपये लगते हैं. डिजिटल प्रमोशन इसके मुकाबले काफी सस्ता पड़ता है.

तीसरा बदलाव: ऑडियंस

रैलियों में अक्सर वही लोग आते हैं जो पहले से पार्टी के समर्थक होते हैं. लेकिन इन्फ्लुएंसर उन युवाओं तक पहुंचते हैं जो अभी तय नहीं कर पाए कि वोट किसे देना है.

यही वजह है कि अब कई नेता रैली के बाद सीधे किसी पॉडकास्ट स्टूडियो में पहुंच जाते हैं. मिसाल के तौर पर सोशल मीडिया पर युवा दर्शकों के बीच बेहद लोकप्रिय कंटेंट क्रिएटर्स जैसे एल्विश यादव (Elvish Yadav) और कैरी मिनाटी (Carry Minati) जैसे नाम अक्सर चर्चा में आते हैं. जब बात राजनीति और डिजिटल पहुंच की होती है.

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पार्टियों की नई रणनीति: डिजिटल वार रूम

अब सिर्फ आईटी सेल से चुनाव नहीं चल रहा. बड़ी पार्टियों ने अलग डिजिटल टीमें बना ली हैं. दिल्ली से लेकर चेन्नई तक राजनीतिक पार्टियों के दफ्तरों में अब एक नया शब्द सुनाई देता है- डिजिटल वार रूम.

यहां डेटा एनालिस्ट, कंटेंट क्रिएटर और इन्फ्लुएंसर एजेंसियां साथ काम कर रही हैं. इस डिजिटल वॉर रूम में बनने वाली रणनीति भी खास होती है. मिसाल के तौरपर,

इन्फ्लुएंसर एम्पैनलमेंट: कई एजेंसियां ऐसे इन्फ्लुएंसर्स की सूची बनाती हैं जिनके लाखों फॉलोअर हैं. फिर पार्टियां उनके साथ कैंपेन करती हैं.

माइक्रो इन्फ्लुएंसर्स: अब सिर्फ बड़े नाम ही नहीं. 20 हजार से 50 हजार फॉलोअर वाले लोकल क्रिएटर भी अहम हो गए हैं. ये लोग अपनी स्थानीय भाषा में बात करते हैं और अपने इलाके में ज्यादा भरोसेमंद माने जाते हैं.

रीजनल कंटेंट: तमिल, बंगाली, भोजपुरी, हरियाणवी और मराठी में अलग अलग कंटेंट बनाया जा रहा है ताकि संदेश सीधे स्थानीय लोगों तक पहुंचे.

पश्चिम बंगाल: मीम पॉलिटिक्स और लोकल डिजिटल स्टार

पश्चिम बंगाल में डिजिटल राजनीति का रंग थोड़ा अलग है. यहां राजनीति हमेशा से ही बेहद तीखी और बहस वाली रही है. अब वही बहस सोशल मीडिया पर भी दिखाई देने लगी है.

कोलकाता और दूसरे शहरों में कई बंगाली यूट्यूब चैनल और इंस्टाग्राम पेज चुनावी चर्चा का बड़ा मंच बन चुके हैं. यहां नेताओं के डिजिटल इंटरव्यू, मीम वीडियो और छोटे राजनीतिक एक्सप्लेनर काफी वायरल होते हैं.

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ममता की डिजिटल चुनावी रणनीति (फोटो- PTI)

कई राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि बंगाल में अब मीम पेज भी माहौल बनाने में भूमिका निभा रहे हैं. एक वायरल मीम कभी कभी भाषण से ज्यादा असर डाल देता है.

तमिलनाडु: डिजिटल प्रचार और एआई की एंट्री

2026 के चुनावों में सबसे दिलचस्प प्रयोगों में से एक तमिलनाडु में देखने को मिला. राज्य में लंबे समय से फिल्म और राजनीति का गहरा रिश्ता रहा है. अब उसी परंपरा में डिजिटल टेक्नोलॉजी भी जुड़ गई है.

तमिलनाडु की राजनीति में प्रमुख दल जैसे Dravida Munnetra Kazhagam और All India Anna Dravida Munnetra Kazhagam डिजिटल कैंपेन पर काफी जोर दे रहे हैं. 

यहां कुछ नए प्रयोग चर्चा में आए. मिसाल के तौरपर,

एआई (AI) आधारित वीडियो: राजनीतिक संदेशों के लिए एआई से बनाए गए वीडियो और वॉइस क्लिप्स का इस्तेमाल बढ़ा है.

पुराने नेताओं की डिजिटल वापसी: कुछ कैंपेन में दिवंगत नेताओं की आवाज जैसी एआई वॉइस का इस्तेमाल कर संदेश फैलाने की कोशिशें भी चर्चा में रहीं.

यूट्यूब पॉलिटिक्स: तमिल भाषा के पॉलिटिकल यूट्यूब चैनल आज लाखों दर्शकों तक पहुंचते हैं. कई नेता अब इन्हीं चैनलों को इंटरव्यू देना ज्यादा पसंद कर रहे हैं क्योंकि यहां दर्शक सीधे सवाल पूछते हैं.

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क्यों असरदार हैं इन्फ्लुएंसर्स

इस पूरी कहानी के पीछे एक मनोवैज्ञानिक कारण भी है. इसे कहा जाता है ‘पैरासोशल रिलेशनशिप’. 

मतलब यह कि दर्शक किसी यूट्यूबर या इन्फ्लुएंसर को सिर्फ कंटेंट क्रिएटर नहीं बल्कि अपने दोस्त की तरह देखने लगते हैं. वे उसे रोज देखते हैं, उसकी जिंदगी के बारे में जानते हैं और उस पर भरोसा करने लगते हैं.

जब वही इन्फ्लुएंसर किसी नेता के साथ आराम से बातचीत करता है, हंसता है, मजाक करता है, तो नेता की छवि भी ज्यादा सहज और मानवीय लगने लगती है.

युवा वोटर खासकर इसी तरह की बातचीत को पसंद करते हैं.

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यूट्यूब चैनल पर राहुल गांधी (फोटो- इंस्टाग्राम)
लेकिन खतरे भी कम नहीं

जहां मौका होता है वहां खतरा भी होता है. चुनाव में इन्फ्लुएंसर मॉडल के साथ कुछ बड़ी चिंताएं भी सामने आई हैं.

छिपा हुआ प्रचार: कई बार यह साफ नहीं होता कि कोई वीडियो स्पॉन्सर्ड है या नहीं.

डीपफेक तकनीक: एआई के जरिए नकली वीडियो या आवाज बनाना अब आसान हो गया है. चुनावों में इसका इस्तेमाल गलत सूचना फैलाने के लिए भी किया जा सकता है.

जवाबदेही का सवाल: पत्रकार अक्सर कठिन सवाल पूछते हैं, लेकिन कई इन्फ्लुएंसर इंटरव्यू ज्यादा दोस्ताना माहौल में होते हैं.

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असली चुनाव अब दो जगह

साफ है कि भारतीय चुनाव अब सिर्फ जमीन पर नहीं लड़े जा रहे. एक मैदान है रैलियों और सभाओं का तो दूसरा मैदान है इंटरनेट का. जो पार्टी इन दोनों जगहों पर संतुलन बना लेगी वही आगे बढ़ेगी.

हो सकता है आने वाले समय में हम यह दृश्य और ज्यादा देखें. जहां सुबह नेता जी गांव की रैली में भाषण दे रहे हों और शाम को वही नेता किसी पॉडकास्ट स्टूडियो में बैठकर कह रहे हों, 

“आज मैं आपको अपने कॉलेज के दिनों की एक कहानी सुनाता हूं.”

और शायद यही नई राजनीति की सबसे बड़ी तस्वीर है. लोकतंत्र अब मैदान में भी है और मोबाइल स्क्रीन में भी.

वीडियो: राजधानी: पश्चिम बंगाल चुनावों से पहले दौड़ी 'ममता फॉर PM' की लहर, क्या है मतलब?

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