The Lallantop
Advertisement
  • Home
  • Business
  • Moody’s Cuts India’s 2026 Growth Forecast: What It Means for Your Money, Job, and Daily Life

भारत की विकास दर पर Moody’s की चेतावनी, आपकी जेब और नौकरी पर कैसे पड़ेगा असर?

Moody prediction on Indian Economy: दुनिया की जानी-मानी रेटिंग एजेंसी मूडीज (Moody's Ratings) ने 2026 के लिए भारत के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का अनुमान घटा दिया है. मूडीज का मानना है कि इस साल भारत की जीडीपी ग्रोथ रेट 0.8% प्वाइंट्स घटकर 6 परसेंट रह सकती है.

Advertisement
pic
12 मई 2026 (अपडेटेड: 12 मई 2026, 04:35 PM IST)
Moody's GDP growth outlook India
ग्रोथ रेट घटने का सीधा असर आम आदमी की रोजमर्रा की जिंदगी और कमाई पर पड़ सकता है (फोटो क्रेडिट: Business Today)
Quick AI Highlights
Click here to view more

दुनिया की जानी-मानी रेटिंग एजेंसी मूडीज (Moody's Ratings) ने मंगलवार, 12 मई को इस साल (2026) के लिए भारत के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का अनुमान घटा दिया है. मूडीज का मानना है कि इस साल भारत की जीडीपी ग्रोथ रेट  0.8% परसेंट प्वाइंट्स घटकर 6 परसेंट रह सकती है. 

मूडीज ने कैलेंडर ईयर 2027 के लिए जीडीपी ग्रोथ अनुमान 0.5 परसेंट प्वाइंट्स घटाकर 6% कर दिया है. अपने दुनियाभर के लिए मैक्रो आउटलुक (Global Macro Outlook May) के मई अपडेट में रेटिंग एजेंसी ने कहा कि अगले 6 महीनों में तेल- गैस की बढ़ती कीमतों और फर्टिलाइजर्स  की कमी का असर अलग-अलग देशों पर अलग तरीके से होगा. मूडीज ने कहा, "अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते लंबे समय तक चलने वाले टकराव के बीच दुनियाभर की इकोनॉमी में अनिश्चितता बनी हुई है.

ग्रोथ में कमी की ये हैं प्रमुख वजहें

इकोनॉमिक टाइम्स में छपी रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत की आर्थिक ग्रोथ में कमी का सबसे बड़ा कारण कमजोर निजी खपत (Private Consumption) है. महंगाई बढ़ने पर, खासकर पेट्रोल-डीजल, गैस और बिजली जैसी ऊर्जा लागत अगर महंगी हुई, तो इसका बड़ा असर आम लोगों की जेब पर पड़ता है.  ऊर्जा लागत बढ़ने पर आम लोगों की आय का बड़ा हिस्सा रोजमर्रा की जरूरतों में ही खर्च हो जाता है. इसका सीधा असर यह होता है कि परिवार गैर-जरूरी खरीदारी, बड़े खर्च या निवेश को टालने लगते हैं, जिससे बाजार में मांग कमजोर पड़ती है.

दूसरा बड़ा कारण पूंजी निर्माण  (Capital Formation) में सुस्ती है. जब कंपनियों को भविष्य की मांग कमजोर दिखती है या लागत बढ़ती नजर आती है, तो वे नई फैक्ट्रियां लगाने, मशीनरी खरीदने, विस्तार करने या बड़े निवेश फैसलों को टाल सकती हैं. इससे निजी निवेश की रफ्तार धीमी होती है.

तीसरा कारण औद्योगिक गतिविधियों पर दबाव है. तेल और गैस की कीमतों में बढ़ोतरी से मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की उत्पादन लागत बढ़ जाती है. फैक्ट्रियों को बिजली, ईंधन और लॉजिस्टिक्स पर अधिक खर्च करना पड़ता है. जब लागत बढ़ती है, तो अक्सर कंपनियों का मुनाफा घटता है या फिर वे कीमतें बढ़ाती हैं. दोनों ही स्थितियों में उत्पादन और मांग प्रभावित हो सकते हैं.

चौथी वजह भारत की ऊर्जा निर्भरता है. भारत अभी भी अपनी बड़ी ऊर्जा जरूरतों, खासकर कच्चे तेल और गैस के लिए आयात पर निर्भर है. ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल-गैस की कीमतों में उछाल सीधे भारत के आयात बिल, महंगाई, रुपये पर दबाव और आर्थिक विकास पर असर डालता है.

ये भी पढ़ें: आपने सोना खरीदना छोड़ा तो क्या होगा? PM मोदी की अपील का नफा-नुकसान समझिए

ग्रोथ रेट घटने से आम आदमी की जेब पर होगा असर

ग्रोथ रेट घटने का सीधा असर आम आदमी की रोजमर्रा की जिंदगी और कमाई पर पड़ सकता है. दिल्ली यूनिवर्सिटी के कॉलेज ऑफ वोकेशनल स्टडीज में  कॉमर्स डिपार्टमेंट के असिस्टेंट प्रोफेसर अक्षय मिश्रा ने लल्लनटॉप से बातचीत में कहा कि जब अर्थव्यवस्था की रफ्तार धीमी होती है, तो कंपनियां नई फैक्ट्रियों और बड़े निवेश फैसलों को टाल सकती हैं. इससे नई नौकरियां के अवसर घटने लगते हैं.  इसका असर खासकर युवाओं, फ्रेशर्स और प्राइवेट सेक्टर में नौकरी तलाश रहे लोगों पर ज्यादा पड़ सकता है. 

अक्षय मिश्रा का कहना है कि कई क्षेत्रों में भर्ती कम हो सकती है. कॉन्ट्रैक्ट आधारित नौकरियों का दबाव बढ़ सकता है. वेतन वृद्धि धीमी पड़ सकती है.  छोटे कारोबारियों, दुकानदारों और सेवा क्षेत्र से जुड़े लोगों को भी कम ग्राहक और कमजोर मांग का सामना करना पड़ सकता है.

फाइनेंस एक्सपर्ट शरद कोहली का कहना है कि सरकार के पास विकास को रफ्तार देने के लिए ज्यादा इंफ्रास्ट्रक्चर खर्च, सब्सिडी या नीतिगत कदम उठाने का दबाव बढ़ेगा.  अगर राजकोषीय संतुलन बिगड़ता है तो इसका असर टैक्स, महंगाई या सार्वजनिक सेवाओं पर भी दिख सकता है. वहीं निवेश सलाहकार विनोद रावल ने लल्लनटॉप से बातचीत में बताया कि जब कंपनियों की कमाई पर दबाव बढ़ता है और शेयर बाजार में भी गिरावट आ सकती है. इससे शेयर बाजार में पैसा लगाने वाले लोगों को नुकसान हो सकता है . साथ ही बाजार में अनिश्चितता बढ़ने से नए निवेश और आर्थिक गतिविधियों की रफ्तार भी धीमी पड़ सकती है.

ये भी पढ़ें: न युद्ध रुक रहा और न रुपये की गिरावट, दोनों कितना रुलाएंगे?

उम्मीदें अभी बाकी हैं?

मूडीज ने कहा कि तेल और गैस से भरे टैंकर्स और शिप की आवाजाही पटरी पर लौट रही है. आयातित कच्चे तेल और एलएनजी पर भारी निर्भरता को देखते हुए भारत उच्च तेल कीमतों के प्रति "विशेष रूप से संवेदनशील" है. भारत में बिजली उत्पादन का करीब 70% कोयले से होता है. हालांकि सोलर, विंड और पानी से बिजली बनाने पर भी जोर दिया जा रहा है. 
मूडीज के अनुसार, भारत रूस से कच्चे तेल का आयात बढ़ा रहा है.

वीडियो: दुनियादारी: अमेरिका और ईरान के बीच सीजफायर टूट जाएगा?

Advertisement

Advertisement

()