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'कल्पना से सवाल करने वाले प्रियंका चोपड़ा पर चुप क्यों हैं?'

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तस्वीर शाश्वत उपाध्याय की है. बलिया के रहने वाले हैं. अपनी मातृभाषा भोजपुरी से लगाव है. भोजपुरी गाने सुनते हैं और भोजपुरी में ही कविताएं भी लिखते रहते हैं. बीएचयू में सोशियॉलजी की पढ़ाई कर रहे हैं. लल्लनटॉप के पाठक हैं. भोजपुरी गायिका कल्पना पटवारी को जिस तरह से उनके गानों को लेकर निशाना बनाया जा रहा है, उसपर शाश्वत ने लल्लनटॉप के लिए कुछ लिखा है. उन्होंने सवाल उठाए हैं कि जब भोजपुरी में प्रियंका चोपड़ा फिल्म बनाती हैं, तो कोई कुछ नहीं कहता, कल्पना गाना गाती हैं तो लोग उनके खिलाफ आवाज उठा रहे हैं.

भोजपुरी साहित्य के सदन में समाज और संस्कृति ही मुख्य आकर्षण रही है. भिखारी ठाकुर ने अपना समाज दिखाया, चंद्रशेखर मिश्र ने अपना और तारकेश्वर राही अपना समाज दिखा रहे हैं . विनय बिहारी और गोविंद विद्यार्थी भी इसी काम में लगे हैं. हम इसे संस्कारों से भी जोड़ सकते हैं.

खैर बात भोजपुरी गायिका कल्पना की. कल्पना पर लगातार सवाल खड़े हो रहे हैं. उनकी गायकी और उनके गाए अश्लील गीतों को लेकर इन दिनों सोशल मीडिया पर विरोध झेलना पड़ रहा है. कल्पना आसाम के ग्वालपाड़ा से हैं. पिता विपिन पटवारी आसमी लोकगायक थे. शुरू में बेटी को मंचों पर साथ ले जाते रहे. धीरे-धीरे गायन में आकर्षण आया. इसके बाद प्रतिष्ठा एवं संगीत साधने के लिए मुंबई आ गईं. सबसे पहले दो गाने गाए. दोनों ही होली गीत थे.

पहला था,

डाल… डाल…डाल…, धीरे से राजा डाल…, देखी ना केहू घर में पिचकारी तू निकाल…’

दूसरा गाना था

‘पुरुब टोला रंग खेले जईहे जन रे ननदि, पुरुब ओरिया बाटे बाभन टोली रे ‘

( पूरब की तरफ होली खेलने मत जाना, उधर ब्राह्मणों के घर हैं). ये गाना सपना अवस्थी को मिलने वाला था, लेकिन फिर इसे कल्पना को दे दिया गया. इस बारे में कल्पना का कहना था कि गाने का अर्थ उन्हें मालूम नहीं था. उन्होंने होली गीत, ‘पुरुब ओरिया रंग खेले…’ को असम के लोक गीत, ‘हीस्थिर कोइना होस्थिर कोइना बाह माने सेनरी…” से अपनी समझ के अनुसार रिलेट करने की कोशिश की थी. इसे प्रोड्यूसर ने सराहा था. कल्पना अब खुद मानती हैं कि गीत के बोल और शब्दों के पेच को वह समझ नहीं सकी, बस संगीत में ही उलझी रहीं.

Kalpana 4

इसके ठीक बाद कल्पना को रातों रात हिट करने वाला गाना आया… ‘ना हमसे भंगिया पिसाई ए गणेश के पापा’ . इस शिव भजन ने कल्पना को उत्तर प्रदेश और बिहार के घरों में पहुंचा दिया. कल्पना को वापस जन्म मिला. लोग मिले और लाखों करोड़ों की संख्या में श्रोता मिले.

कल्पना का पूरा गाना सुनिए

 यहां कल्पना ने एक बेहद तीखी बात कही. कहा-

‘मैं भोजपुरी में वापस पली बढ़ी. लेकिन भोजपुरी इंडस्ट्री में मेरा पालन पोषण कौन कर रहा था? मैं एक प्रोडक्ट थी. मेरा यूज किया गया या कहें कि मेरा मिसयूज किया गया. भोजपुरी गीतकार या भोजपुरी संगीत निर्देशक जब अपने समाज के गीतों के प्रति और अपने समाज के प्रति 2002 में इतने असंवेदनशील थे, तो मैं तो आसाम से थी. मेरा पहला गीत ही द्विअर्थी गवाया गया. इसमें मेरा कितना दोष है. ऐसा तो नहीं है कि मैं ये आसाम से लेकर आई थी.’

कल्पना पर आरोप लग रहा है कि उन्होंने अश्लीलता से भरे गानों की शुरुआत की. लेकिन कल्पना इकलौती ऐसी गायिका नहीं हैं जिन्होंने ऐसे गीत गाए हैं. उनके पहले भी ऐसा ही चलता रहा है. उनके समकालीन गायक-गायिकाओं का स्तर भी तो यही रहा है, जो चिंताजनक है. कल्पना का कहना है कि उन्हें भोजपुरी आती नहीं थी. जब वो स्टेज शो और दूसरे जरिए लोक से जुड़ीं और उन्हें गीतों के बोल का अर्थ मालूम हुआ, तो उन्होंने खुद में बदलाव किया. कल्पना का दावा है कि उन्होंने 2011 के बाद अश्लील या द्विअर्थी बोल के गीत गाने बन्द कर दिए हैं. जो कुछ गाए भी हैं, वो कमर्शल लिहाज से हैं, जिन्हें गाना इंडस्ट्री में बने रहने के लिए ज़रूरी है.

Kalpana 1

कल्पना बताती हैं कि छपरहिया पूर्वी बेहद ऊंची पिच पर गाई जाती है और उनके गाने से पूर्व सिर्फ पुरुष उस्ताद गायकों ने ही उसे साधने की कोशिश की है. कल्पना के अनुसार वह पहली महिला हैं जिन्होंने अपने एक एलबम में, ‘देवरा तुरी किल्ली..’ पूर्वी गाया, जो पहले किसी ने नहीं गाया था.

पूरा गाना सुनिए


कल्पना सवाल करती हैं कि अगर इस गीत के बोल द्विअर्थी हैं तो इसको लिखने वाला भी तो उतना ही दोषी है. इस गीत के 40 मिलियन व्यू हैं. वहीं उनके अल्बम ‘ताजमहल’ के 10000 व्यू हैं. आखिर दोष किसका है और कितना है? सुनने वाले का या फिर गाने वाले का. संगीत के जानकार भी मानते हैं कि ‘देवरा तूरी किल्ली’ गायकी के दृष्टिकोण से अतुलनीय है.

सुनिए कल्पना के ताजमहल एल्बम के गाने


कल्पना कहती हैं कि फिल्मों में तो गीतों लिए सेंसर बोर्ड है. हमें उनके काम पर भरोसा करना चाहिए. साथ ही 2011 से मैं ने खुद को भी सेंसर कर लिया है. वो बताती हैं कि उन्होंने अश्लील गीतों को गाना बन्द कर दिया है. इससे कई स्तरों पर उन्हें परेशानी का सामना करना पड़ा. कई कई बार पैसे वापस करने पड़े. कल्पना की इस बात का भी विरोध हो रहा है कि उन्होंने 2011 के बाद भी ऐसे गाने गाए हैं. समझने वाली बात ये है कि कल्पना ने ऐसे एल्बम गाने बंद कर दिए हैं. वैसे भी यू-ट्यूब पर जो गाने हैं, उन्हें नया बताकर फिर से अपलोड किया जा रहा है. हालांकि कमर्शल एप्रोच के तहत कल्पना ने कुछ ऐसे गीत भी गाए हैं, जिन्हें अश्लील कहा जाता है, लेकिन उनकी संख्या श्लील गानों के मुकाबले बहुत कम है. ऐसे में भोजपुरी को मिलने वाले आईटम सांग्स भी अब इंदु सोनाली और दूसरी गायिकाओं को मिलने लगे हैं. वहीं ब्राजील से शुरू हुआ जो कोक स्टूडियो विश्व भर में क्षेत्रीय संगीत को अंतरराष्ट्रीय फलक पर लाने के लिए खुद को समर्पित बताता है, कल्पना भोजपुरी को वहां भी लेकर गई हैं. कल्पना ने जून 2017 में कोक स्टूडियो में खड़ी बिरहा गाया है.

कोक स्टूडियो में देखिए कल्पना का गाना


भोजपुरी में कल्पना ने कुछ उल्लेखनीय काम दिए है जिसमें लिगेसी ऑफ भिखारी ठाकुर, एन्थ्रालॉजी ऑफ बिरहा और चंपारण सत्याग्रह प्रमुख हैं. दी लिगेसी ऑफ भिखारी ठाकुर की बाबत कल्पना ने हमेशा बताया है कि उन्होंने भिखारी ठाकुर साहित्य और उनके शब्दों मे लोक जैसे विषयों पर दो से अधिक साल तक रिसर्च की है. इसके बाद वो बुजुर्ग कलाकारों के साथ बड़े पैमाने पर स्टेज शो करती हैं, जिसके केंद्र में भिखारी ठाकुर और उनका साहित्य होता है.

कल्पना का गाया भिखारी ठाकुर का लिखा ये गाना सुनिए


वहीं एन्थ्रालॉजी ऑफ बिरहा के तहत कल्पना विश्व संगीत में भोजपुरी को स्थापित करने की कोशिश कर रही हैं. इसी के तहत उन्होंने गाज़ीपुर से विलुप्त हो रही ‘लोरकी’ को विश्व स्तर के संगीत के साथ पेश किया और उसका एल्बम भी आया. इसके लिए कल्पना गाज़ीपुर से बिरहा के बुजुर्ग गायकों को मुम्बई ले गईं, गाना रिकॉर्ड करवाया और उनको सम्मान दिया और फिर उसे लोगों को सौंपा. कल्पना का दावा है कि ये सब उन्होंने अपने पैसे से किया है, लेकिन फिर भी कुछ लोग उनसे भोजपुरी के प्रति समर्पण का सर्टिफिकेट मांग रहे हैं. हालांकि उनके ये गाने बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे भोजपुरी भाषी क्षेत्रों से ज्यादा विदेश में पसंद किए जा रहे हैं. वेस्टइंडीज तक में कल्पना ने ये गीत गाए हैं. इसके अलावा कल्पना ने चंपारण सत्याग्रह और मुस्लिम महिलाओं के छठ पूजन पर भी उल्लेखनीय काम किए हैं.

भिखारी ठाकुर को श्रद्धांजलि देने के लिए कल्पना का गाया हुआ ये गाना सुनिए


भोजपुरी फ़िल्म इंडस्ट्री को लेकर कल्पना का कहना है कि यहां बेहद समर्पित और जीवट लोग काम कर रहे हैं. प्रियंका चोपड़ा ने खुद को भोजपुरी क्षेत्र में जन्मी होने का तर्क देते हुए अपने प्रोडक्शन हाउस पर्पल पेबल पिक्चर के बैनर तले पहली फिल्म भोजपुरी में बनाई, जिसका नाम था “बम बम बोल रहा है काशी.” निरहुआ और आम्रपाली को लेकर भोजपुरी के पुराने ढर्रे पर बनी यह फिल्म पॉपुलर भोजपुरी फिल्मों की तरह ही अश्लीलता और भोंडेपन से लबरेज थी. करीब करीब उसी समय मराठी में उनके प्रोडक्शन के बैनर तले विशुद्ध पारिवारिक मूल्यों को प्रदर्शित करती फिल्म वेंटिलेटर भी बनी. सवाल ये है कि देश और विदेश में भी चर्चित प्रियंका जैसी अभिनेत्री और यूएन की गुडविल अम्बेस्डर ने जब फिल्म बनाई तो बाजार को देखा, जबकि कल्पना ने परिपक्वता का परिचय देते हुए अपनी पुरानी गलतियों को सुधारने की बात कही है. वो अगर भोजपुरी संस्कृति की बेहतरी के लिए कोई कोशिश कर रही हैं, तो सराहना की बजाय उनकी सिर्फ आलोचना ही क्यों की जा रही है. ऐसे में अकेले कल्पना को कटघरे में खड़ा करना कहां तक जायज है, जबकि कल्पना खुद को बेहतर करने के लिए प्रतिबद्ध बता रही हैं.

प्रियंका चोपड़ा की बनाई फिल्म बमबम बोल रहा है काशी (फोटो : Twitter)
प्रियंका चोपड़ा की बनाई फिल्म बमबम बोल रहा है काशी (फोटो : Twitter)

कुछ लोगों ने कहा कि कल्पना पर आरोप है कि वह पुरस्कार एवं सम्मान के लिए यह सब कर रही हैं. इस पर कल्पना ने कहा है कि उन्हें भोजपुरी गाते हुए 18 साल हो गए. इन 18 सालों में मुश्किल से 18 सरकारी कामों में शरीक हुई होंगी. इनमें से एक में भी उन्हें सरकारी अवॉर्ड नहीं मिला है.
खैर,
कल्पना इस वर्ष ऑस्ट्रेलिया के कॉमनवेल्थ गेम्स में भारत की तरफ से लोक संस्कृति का प्रतिनिधित्व करने के लिए जा रही हैं. आरोप प्रत्यारोप के इतर उन्हें शुभकामनाएं ! उम्मीद है, वो बेहतर करेंगी.

कुंवर बेचैन की यह पंक्तियां और बात खत्म कि….

न खुशियां दीं न गम बांटा किसी का
तो क्या मतलब है ऐसी जिंदगी का
नई तहज़ीब क्या है हम बताएं
अँधेरों पर है परदा रोशनी का.


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