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पीरियड में छुट्टी देने से पीरियड के नाम पर होने वाला भेदभाव घटेगा या बढ़ेगा?

सिक लीव मिलने के बावजूद पेड मेंस्ट्रुअल लीव पर बात क्यों हो रही है?

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प्रतीकात्मक तस्वीर
'पेट में बहुत दर्द है. आज ऑफिस नहीं जा पाऊंगी.' आप लड़की हैं तो ये बात आपने कभी न कभी कही ही होगी.
'हमें भी पीरियड्स होते तो अच्छा होता, इसी बहाने महीने की एक-दो एक्स्ट्रा छुट्टी ही मिल जाती.' अगर आप लड़के हैं तो ये आपने कभी न कभी ज़रूर कहा होगा. या मन में तो सोचा ही होगा.
लेकिन क्या करें ब्रो, लाइफ इतनी ही सैड है आपके लिए. पीरियड की छुट्टी, मैटरनिटी लीव, बस और मेट्रो की सीटें, सब औरतों को चल जाती हैं. बेचारे लड़कों के पास बचता ही क्या है 'मेल प्रिविलेज' और 'सेन्स ऑफ़ इंटाइटलमेंट' के सिवा.
बात समझ नहीं आई तो गूगल करें और आगे बढ़ें क्योंकि ज़ोमैटो की तरह स्विगी ने भी शुरू कर दी है लड़कियों के लिए पेड मेन्स्ट्रूअल लीव. एक ऐसा मसला, जिसपर छिड़ी है बहस. आज से नहीं, कई साल से. और सिर्फ इंडिया में ही नहीं, पूरी दुनिया में.

क्या है पूरा माजरा?

सबसे पहले ये समझते हैं कि पीरियड लीव्स को शुरू किया क्यों गया. स्विगी अपनी डिलीवरी पार्टनर्स को महीने की दो, यानी साल की 24 लीव्स देने वाला है, मिनिमम अर्निंग्स के साथ. इसके साथ ही ये छुट्टियां वॉलेंटरी हैं. यानी अगर आप अपनी पीरियड लीव यूज नहीं कर रही हैं तो न करें. काम कर लें.
पीरियड्स में कई महिलाओं को बहुत ज्यादा दर्द होता है. सांकेतिक फोटो पीरियड्स में कई महिलाओं को बहुत ज्यादा दर्द होता है. सांकेतिक फोटो

स्विगी के वाइस प्रेसिडेंट ऑफ़ ऑपरेशन्स इसपर कहते हैं,
पीरियड के दौरान ड्यूटी पर होना, असहज होते हुए भी रोड पर होना. ये डर ये एक बड़ी वजह है कि कई महिलाएं डिलीवरी एजेंट्स बनने से कतराती हैं. इस कदम के उठाने से उन्हें इस बात का सुकून रहेगा कि पीरियड के दिनों में वो आराम से छुट्टी ले सकती हैं.
वैसे ये काम स्विगी से पहले दूसरी फ़ूड डिलीवरी कंपनी ज़ोमैटो ने कर दिया था. अगस्त 2020 में ही.
सुनने में ये स्टेप अच्छा लगता है. प्रोग्रेसिव लगता है. लेकिन कई प्रोग्रेसिव लोगों ने, जिनमें फेमिनिस्ट महिलाएं भी शामिल हैं, इस कदम का विरोध किया है. तो क्या है, क्यों है ये बहस.

फेमिनिस्ट्स का विरोध क्या है?

चलते हैं पिछले साल की ओर, जब सबसे पहले जोमैटो ने पीरियड लीव्स की घोषणा की. कई फेमिनिस्ट्स ने इसका विरोध किया. उनके तर्क थे:
  • इससे दफ्तरों में भेदभाव बढ़ेगा. दफ्तरों में वैसे भी महिलाओं को पुरुषों से कम आंका जाता है. फील्ड और आउटडोर से जुड़े कई असाइनमेंट्स उन्हें देने से वैसे भी बॉस बचते हैं. इन लीव्स के बाद ये और बढ़ जाएगा. ऐसा कुछ महिलाओं का डर है.
  • कई महिलाओं का ये कहना है कि पीरियड के लिए अलग से लीव लाने के बजाय हमें ऐसा माहौल बनाना चाहिए कि कभी किसी महिला को दर्द हो तो वो नॉर्मल सिक लीव को पीरियड का नाम लेकर अवेल कर सके.
  • कई लोगों का मानना है कि हर महिला का पीरियड एक्सपीरियंस अलग होता है. किसी को कम दर्द होता है, किसी को ज्यादा. ऐसे में हर महिला को लीव देना वेस्टेज ऑफ़ रिसोर्स है.
सांकेतिक फोटो सांकेतिक फोटो

पीरियड लीव के सपोर्ट में क्या तर्क हैं?

ये तो उनके तर्क हैं जो पीरियड लीव के खिलाफ हैं. पीरियड लीव के सपोर्ट में खड़े लोगों का ये कहना है कि भेदभाव का माहौल तो मैटरनिटी लीव से भी पैदा होने का खतरा रहता है. तो क्या उसे बंद कर देना चाहिए?
पीरियड लीव के सपोर्ट में खड़ी महिलाओं का ये मानना है कि चूंकि हर महिला का एक्सपीरियंस अलग है, ज़रूरी है कि हर महिला को अपनी छुट्टियां इस्तेमाल करने का हक़ हो. चूंकि पीरियड कोई बीमारी नहीं है, उसे सिक लीव में शामिल करना ठीक नहीं है.
महिलाओं के अलग-अलग आर्गुमेंट्स को समझने के लिए हमने बात की एक्टिविस्ट और पॉलिटिशियन कविता कृष्णन से. कविता ने पीरियड लीव देने वाले कदम को स्वागतयोग्य बताया, लेकिन उन्होंने स्विगी की एक और पॉलिसी पर भी बात की और उसमे सुधार करने के सुझाव दिए. कविता कहती है ..
स्विगी का ये फ़ैसला तो ख़ैर स्वागत्योग्य है, लेकिन मैं ये भी कहूंगी कि स्विगी के जो कर्मचारी हैं, वो बहुत समय से मांग कर रहे हैं कि उन्हें डिलीवरी पार्टनर नहीं, एम्प्लॉयी माना जाए. जैसे एक एम्प्लॉयी को सोशल सिक्युरिटी दी जाती है, वैसे ही स्विगी को भी देनी चाहिए!
अब बात है कि पीरियड लीव्स की ज़रूरत क्या है? आज से 100-150 साल पहले ये भी कहा जाता था कि सोने की क्या ज़रूरत है? मज़दूर 24 घंटे काम करेंगे. एक समय तो ये भी बहस थी कि वीकेंड पर छुट्टी की क्या ज़रूरत है? तो इंसान के शरीर को, जो मेहनत करता है, ज़ाहिर सी बात है कि उपयुक्त आराम की ज़रूरत है. आपको मानना होगा कि पीरियड होने वाले शरीर भी इंसानी शरीर हैं. महिलाओं के शरीर, ट्रांस मेन के शरीर. आपको इनको भी शरीर मानना होगा. दुनिया में काम करने वालों में ज़्यादा हिस्सा ऐसे ही शरीरों का है. इंसानी शरीरों के हिसाब से ही नीतियां बननी चाहिए और ये एक सामान्य बात है. इसको ले कर इतनी बहस होनी ही नहीं चाहिए!
1991-92 के समय, बिहार में ऐसी ही एक मांग उठी थी. तब लालू प्रसाद यादव मुख्यमंत्री थे, उन्होंने इस मांग को माना था. और तबसे लेकर अब तक बिहार की जो महिला सरकारी कर्मचारी हैं, उन्हें पीरियड लीव बिलकुल साधारण तौर से मिल रहा है.
आउटलुक मैगज़ीन की एक रिपोर्ट के मुताबिक़, इंडोनेशिया, साउथ कोरिया, ताइवान, ज़ाम्बिया, जापान और चीन में पहले से ही पीरियड लीव की व्यवस्था है. मगर क्या इन देशों में औरतें खुलकर अपने हक़ की लीव्स मांग सकती हैं? इसका कोई डाटा उपलब्ध नहीं है. क्या इंडिया में इन लीव्स की शुरुआत से पीरियड के नाम पर होने वाला भेदभाव घटेगा, या बढ़ जाएगा?
इसका जवाब मेरे पास नहीं है. इसका जवाब आपको खुद से ही मांगना होगा. क्या आपके दफ्तर में लड़कियां खुलकर अपने बॉस को बता पाती हैं कि उन्हें पीरियड का पेन है? क्या औरतों अपने पुरुष सहकर्मियों के सामने पीरियड की दिक्कतें डिस्कस करने में सहज हैं? ये सवाल हम सबको खुद से पूछने होंगे!

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