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बच्चे से 'ओरल सेक्स गंभीर अपराध नहीं', इलाहाबाद हाई कोर्ट की टिप्पणी पर बवाल!

हाई कोर्ट ने POCSO ऐक्ट के दोषी की सजा भी 10 साल से 7 साल कर दी.

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तस्वीर- पीटीआई
POCSO ऐक्ट से जुड़े एक मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट की एक टिप्पणी और फैसला हर तरफ चर्चा में है. खबरों के मुताबिक मामले की सुनवाई करते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा कि 'ओरल सेक्स अति गंभीर श्रेणी वाला अपराध नहीं' है. इसके अलावा हाई कोर्ट ने मामले से जुड़े दोषी की सजा भी कम कर दी. अब हर तरफ हो-हल्ला है कि इलाहाबाद हाई कोर्ट ने आखिर इस तरह का फैसला और स्टेटमेंट क्यों दिया.

लोगों ने क्या कहा?

इलाहाबाद हाई कोर्ट के इस फ़ैसले की खबर आई तो लोग भड़क गए. अदालत पर तंज कसते हुए सोशल मीडिया पर प्रतिक्रियाएं देने लगे. Grouchy Maxx नाम के यूज़र ने लिखा,
भारत में रेप नहीं होते.
उदय नाम के यूज़र लिखते हैं.
ऐसा फ़ैसला सुनाने पर जजों को शर्म करनी चाहिए.
वी मूव नाम के ट्विटर हैंडल से कहा गया,
हमें न्याय व्यवस्था की ज़रूरत नहीं.
वहीं जोया ने लिखा,
ये भयावह है. चूंकि ये 'बलात्कार' नहीं था, सो कम गंभीर हो गया? ऐसे अपराधियों से उत्पीड़ित बच्चों को बहुत ज्यादा मानसिक आघात पहुंचता है. क्या कोर्ट को इस बारे में नहीं सोचना चाहिए था?

पूरा मामला क्या है?

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने बच्चों को यौन हमलों से बचाने वाले कानून यानी POCSO ऐक्ट की धाराओं को क्लैरिफाई करते हुए ये बात कही है. इंडिया लीगल लाइव की ख़बर के अनुसार मामला 26 मार्च 2016 को हुई एक घटना से जुड़ा है. उत्तर प्रदेश के झांसी जिले के एक इलाके चिरगांव में सोनू कुशवाहा नाम का शख्स एक लड़के को 20 रुपये का लालच देकर मंदिर ले गया. लड़के की उम्र उस समय केवल 10 साल थी. सोनू ने पैसों का लालच देकर लड़के को ओरल सेक्स करने को कहा. ऐसा करने के बाद सोनू ने लड़के को धमकी भी दी कि वो इस बारे में किसी को ना बताए. लेकिन लड़के के पिता ने 20 रुपये को लेकर पूछताछ की तो पीड़ित ने सब बता दिया. इसके बाद पिता ने पुलिस में कंप्लेंट की और सोनू कुशवाहा के खिलाफ आईपीसी की धारा 377 और 506 के अलावा POCSO ऐक्ट की धारा 3/4 के तहत मामला दर्ज कर लिया गया. झांसी की एक अदालत में मामला चला और सोनू को दोषी पाया गया. 24 अगस्त 2018 को उसे पॉक्सो ऐक्ट की धारा 6 के तहत अलग से 10 साल के कठोर कारावास की सज़ा सुनाई गई. 5000 रुपये का जुर्माना भी लगाया गया. इसके खिलाफ सोनू हाई कोर्ट पहुंच गया. अब वहां क्या हुआ, ये बताते हैं.

हाई कोर्ट ने कहा क्या?

हाई कोर्ट की सुनवाई के दौरान ये सामने आया कि पुलिस ने आईपीसी के अलावा पॉक्सो ऐक्ट की धारा 3/4 के तहत सबूत इकट्ठा किए थे. लेकिन झांसी में सुनवाई के दौरान एडिशनल सेशन जज ने सोनू पर पॉक्सो की धारा 5/6 लगा दी थी. पॉक्सो ऐक्ट की इस धारा में ही 'अति गंभीर यौन हमलों' की बात कही गई है. अंग्रेजी में इन्हें 'अग्रेवेटिड सेक्शुअल ऐक्ट' लिखा गया है, जिनमें कम से कम 20 साल की सजा तो होती ही है. जबकि धारा 4 में 'पेनेट्रेटिव सेक्शुअल असॉल्ट' का जिक्र है. यानी जब कोई शख्स अपना लिंग बच्चे के मुंह में प्रवेश कराता या डालता है या ऐसा करने की कोशिश करता है, तब ये धारा लगाई जाती है. पुलिस ने इसी धारा के तहत सोनू पर केस दर्ज किया था. और इसमें कम से कम पनिशमेंट है 10 साल की. इलाहाबाद हाई कोर्ट ने धाराओं में अंतर बताते हुए कहा कि इस केस में 'पेनेट्रेटिव सेक्शुअल असॉल्ट' हुआ, ना कि 'अग्रेवेटिड सेक्शुअल असॉल्ट'. सोनू कुशवाहा के वकील ने अदालत को बताया कि दोषी को गलत धारा के तहत सजा दी गई है. उन्होंने कहा कि धारा 6 में 'aggravated sexual assault' की बात कही गई है, जबकि उनके क्लाइंट ने 'penetrative sexual assault' किया. इसलिए उसे धारा 4 के तहत सजा सुनाई जानी चाहिए, ना कि धारा 6 के तहत. वकील ने कोर्ट को ये भी बताया कि पुलिस के सबूत भी धारा 4 से संबंधित हैं. इंडिया लीगल लाइव और बार एंड बेंच जैसी कानूनी मामलों से जुड़ी वेबसाइट्स की रिपोर्ट्स के मुताबिक, कोर्ट ने पुलिस की जांच को सही पाया और माना कि सोनू ने वाकई में अपराध किया है, लेकिन उसका अपराध POCSO ऐक्ट के सेक्शन 4 के अंतर्गत आता है, ना कि धारा 6 के. इसी कारण कोर्ट ने सोनू की सजा कम कर दी. हालांकि पीड़ित की उम्र को देखते हुए कई लोगों का कहना है कि हाई कोर्ट का ये निर्णय सही नहीं है. जानकार कह रहे हैं कि ये मामला वाकई में पॉक्सो की धारा 5/6 से जुड़ा है, क्योंकि अपराध के समय पीड़ित की उम्र 10 साल थी. गौरतलब है कि पॉक्सो ऐक्ट की धारा 5 के मुताबिक 12 साल से कम उम्र के बच्चों का यौन उत्पीड़न गंभीर अपराध की श्रेणी में आता है, जबकि उच्च न्यायालय ने धारा 4 के तहत फैसला सुना दिया.

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