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सौरव गांगुली इन मुस्लिम कैप, तोमार पॉलिटिक्स की दादा?

ममता बनर्जी के साथ इफ्तार पार्टी में पहुंचे थे. उनकी TMC से भी बनती है, BJP से भी बनती है. फायदा सबसे लेते हैं. टिकट किसी का नहीं लेते. मसला क्या है?

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फोटो - thelallantop
खेल, सिनेमा और दूसरे फील्ड के लोग जब रिटायर हो जाते हैं तो पॉलिटिक्स में पनाह खोजते हैं. फेस वैल्यू होती है, इसलिए पार्टियां भी उन्हें हाथोंहाथ लेती हैं. पुराने इशारे नई शक्ल में पश्चिम बंगाल की जानिब से आ रहे हैं. ये सौरव गांगुली के बारे में हैं.
सोमवार को कुछ लोग चौंक गए. जब कोलकाता में सौरव गांगुली मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के बगल में बैठकर इफ्तार पार्टी में शामिल हुए. अपने करियर में उन्होंने कई रंगों की कैप पहनी होगी, लेकिन पहली बार उनके सिर पर मजहबी टोपी दिखाई दी. ये गोल मुस्लिम टोपी नहीं थी. वैसी थी जैसी मौलाना लोग पहनते हैं.
IMG-20160704-WA075 पश्चिम बंगाल की राजनीति में ये एक ऐसा मौका था जो रोज देखने में नहीं आता. सौरव गांगुली के दोनों हाथ दुआ में उठे हुए थे. मैदान फुटबॉल का था लेकिन लग रहा था जैसे पॉलिटक्स का हो. मन में ये शरारती सा ख्याल तो आता ही है कि अनुराग ठाकुर कहीं से देखते होंगे तो क्या सोचते होंगे? ये प्रोग्राम तृणमूल कांग्रेस का नहीं था. 'मोहम्मदन स्पोर्टिंग क्लब' का था. 1200 मेहमान बुलाए गए थे, जिसमें प्रदेश की नामी हस्तियां भी थीं. ममता बनर्जी चीफ गेस्ट थीं. ममता बनर्जी मुसलमानों के खूब वोट पाती हैं. मुस्लिम समाज के आयोजनों में उनकी शिरकत आम है. लेकिन ये मौका अलग था. सौरव गांगुली को TMC सांसद सुल्तान अहमद ने न्योता भेजा था, जो मोहम्मदन स्पोर्टिंग क्लब के प्रेसिडेंट भी हैं. सौरव गांगुली बंगाल क्रिकेट असोसिएशन के प्रेसिडेंट हैं और आज कल बीसीसीआई में उनकी खूब चलती है. टीम इंडिया के कोच के बतौर अनिल कुंबले और रवि शास्त्री में मुकाबला था. बताते हैं कि सौरव गांगुली ने ही कुंबले का नाम आगे किया था. इससे इस बात की तस्दीक भी हुई थी कि अनुराग ठाकुर के दौर की BCCI में सौरव गांगुली के पास ताकत रहने वाली है. IMG-20160704-WA073 ज्यादा कानाफूसी इसलिए हो रही है क्योंकि सौरव गांगुली की बीजेपी नेताओं से भी ठीक-ठाक बनती है. बल्कि खबर तो ये भी थी कि खुद अमित शाह उन्हें बीजेपी में लाना चाहते थे. पार्टी ने एक बार 2014 में उन्हें लोकसभा और 2015 में विधानसभा का टिकट ऑफर किया था. लेकिन दादा ने दोनों बार ठुकरा दिया. ऑफर तो TMC से भी मिला था, 2014 लोकसभा चुनाव से पहले. लेकिन सौरव गांगुली को आप गैर-राजनीति आदमी मत समझिए. सरकारी प्रोग्राम्स में शामिल होने से उन्हें गुरेज नहीं रहा है, बस वह चुनाव नहीं लड़ना चाहते. हाल ही में हुए विधानसभा चुनाव में उन्होंने बल्ली विधानसभा क्षेत्र से जगमोहन डालमिया की बेटी वैशाली डालमिया के लिए प्रचार भी किया था. वैशाली TMC कैंडिडेट थीं. प्रचार के दौरान गांगुली ने जरूरी तटस्थता बरतने की कोशिश भी की थी.
बल्कि इतिहास देखें तो गांगुली के पॉलिटिकल सूरमाओं से अच्छे रिश्ते रहे हैं. बल्कि उन पर पॉलिटिकल रिश्तों का फायदा लेने का आरोप भी लगता रहा है. इसके बावजूद वह खुलकर मैदान में उतरने को कभी राजी नहीं हुए. पश्चिम बंगाल में जब लेफ्ट फ्रंट की सरकार थी, गांगुली ने बुद्धदेव भट्टाचार्य की उद्योग-धंधे बढ़ाने की कोशिशों की तारीफ की थी. इसी समय साल 2000 में उन्हें लेफ्ट सरकार ने स्कूल के लिए 63 कोठा जमीन आवंटित कर दी. गांगुली पर सरकार से फायदा लेने के आरोप लगे. सुप्रीम कोर्ट ने 2011 में इस आवंटन को अमान्य पाया और रद्द कर दिया. लेकिन इसी दौर में गांगुली TMC प्रमुख ममता बनर्जी से भी मेलजोल बढ़ा रहे थे. जब ममता सरकार बनी तो 2013 में प्रदेश सरकार ने उन्हें लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड दिया. साथ ही क्रिकेट प्रोजेक्ट और स्कूल के लिए 2 एकड़ जमीन भी दे दी. उद्घाटन करने खुद ममता बनर्जी पहुंचीं.

IMG-20160704-WA067 ऐसे सौरव गांगुली अगर ममता के साथ इफ्तार करते नजर आते हैं तो उनकी टोपी भी ज्यादा चौंकाती नहीं है. सुल्तान अहमद ने कहा, 'मुख्यमंत्री ममता बनर्जी प्रदेश के सेक्युलर ताने-बाने और सौहार्द में यकीन रखती हैं. वे समाज के लोगों के साथ समय बिताती हैं. स्पोर्ट्स उनके दिल के करीब है क्योंकि ये नौजवानों के इंटरेस्ट की चीज है, जिनके हाथ में देश का भविष्य है. सौरव गांगुली यूथ आइकन हैं और ये सौभाग्य है कि दोनों स्टेज शेयर कर रहे हैं.' सारी नजरें दुआ करते हुए सौरव गांगुली पर थीं. अभी तो खखोरू लोग ये भी कहेंगे कि टोपी गोल नहीं थी, इसलिए वह 'सेक्युलरिज्म' का उतना मजबूत सिंबल नहीं है. आप इससे चिढ़िए, मन करिए तो हंसिए. लेकिन  लेकिन इफ्तार पार्टियों में मुस्लिम टोपी पहनने की व्याख्या अपने यहां तरह-तरह से होती है. हो सकता है कि गांगुली ऐसा करके सिर्फ मेलजोल की भावना प्रदर्शित करना चाहते हों और इसके पॉलिटिकल असर के बारे में ना सोचते हों. इसकी एक व्याख्या ये भी हो सकती है कि वो मजहबी तौर पर लिबरल हैं और 'सेक्युलर' पार्टियों के ज्यादा मुफीद हैं. हो सकता है वो वहां सिर्फ अपने राजनीतिक मित्रों को खुश करने के लिए मौजूद हों. लेकिन फिर भी मन में ये शरारती सा ख्याल तो आता ही है कि अनुराग ठाकुर कहीं से देखते होंगे तो क्या सोचते होंगे?

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