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'पाकिस्तान से जंग की बात छिड़ते ही आप मुस्लिमों को क्यों घूरने लगते हैं?'

एक मुस्लिम लड़के के कुछ सवाल हैं, कुछ जवाब हैं.

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symbolic image. फोटो क्रेडिट: Reuters

Adil

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'इंडिया-पाकिस्तान के बीच जंग जैसा माहौल है.' ये बात बीते कई रोज से हर जगह कही, सुनी जा रही है. उड़ी अटैक और सर्जिकल अटैक के बाद सरहद के दोनों ओर कैसे इंसानों के दिल बदल रहे हैं. इस बारे में बता रहे हैं आदिल रजा खान. आदिल पेशे से पत्रकार हैं. दिल्ली में रहते हैं. आदिल का सवाल है कि जब भी दोनों मुल्कों के बीच कुछ होता है, तो शक से भरे सवाल इंडिया में रह रहे मुस्लिमों से क्यों पूछे जाते हैं? मौजूदा वक्त में जब पाकिस्तान पर चढ़ाई की बात हो रही है, तब आदिल की बात पर गौर जरूर किया जाना चाहिए. पढ़िए आदिल का दी लल्लनटॉप को भेजा ये लेख: 


 

पाकिस्तान ने पठानकोट पर अटैक किया, हमने उसकी निंदा की. उड़ी में हमारे फौजियों को मारा. देश के दूसरे लोगों की तरह हमें भी बहुत गुस्सा आया. हमारी सरकार के आदेश पर सर्जिकल स्ट्राइक किया गया. आतंकी ठिकानों को ख़त्म किया गया. हमने इसका स्वागत किया. हां हमारा ओपिनियन था कि स्थायी समाधान हो. हमने युद्ध की थोड़ी आलोचना की, फिर चाहे पाकिस्तान से हो या फिर चीन से युद्ध की बात हो. हम पाकिस्तान परस्त कहलाए, विदेशी एजेंट कहलाए. आर्टिस्ट को बैन करने की बात आई तो हमने कहा हमारी कंट्री के हिसाब से ठीक नहीं. हमारी सरकार वहां की सरकार से निपट रही है. अगर क्रॉस बॉर्डर टेरेरिज्म पाकिस्तान की तरफ से जारी रहा, तो भारत सरकार sovereign है, तय करे वीज़ा पॉलिसी एंड ऑल. सरकार दबाव बना भी रही है. गली-मुहल्ले, बॉलीवुड-लॉलीवुड से क्यों निपटे सरकार? इतना कहना था कि फवाद ख़ान आ टपका. मैं न उसके सीरियल्स देखता, न फिल्में. मुझे पर्सनली उससे कोई लगाव नहीं है. लेकिन हां, मैं उससे नफरत भी नहीं करता. ये मेरे अपने वर्ल्ड व्यू की बात है. आप इसका दोष मेरी किताब, मेरे रहन-सहन, मेरी समझ को दे सकते हैं कि मैं पाकिस्तान क्या, चीन, अमेरिका, जर्मनी, ब्रिटेन, फ्रांस वग़ैरह किसी भी मुल्क से नफ़रत नहीं करता,  न ही वहां के लोगों से. हां अगर अमेरिकी हुकूमत अश्वेतों के ख़िलाफ़ है, पाकिस्तान में हिन्दू अल्पसंख्यकों का बुरा हाल है, उनपर ज़्यादती हो रही है, फ्रांस में मुस्लिमों पर सांस्कृतिक पाबंदी है, ब्रिटेन में कामगारों के पगार काट कर हाउस ऑफ़ कॉमन के सांसद अय्याशी कर रहे हैं. जर्मन हुकूमत, पनाह मांग रहे मुहाजिरों को सामान्यतः क्रिमिनल्स और रेपिस्ट बताकर एक आम सहमति बना रही है और चीन अपने चीनियों के साथ ही बर्बर है तो मैं इन सभी देश और वहां की सरकार की मज़म्मत ही नहीं, बल्कि हुकूमत से नफ़रत भी करता हूं.
ग़ुलाम अली ख़ान, राहत फ़तेह अली ख़ान और फवाद ख़ान ने अपने देश की निंदा क्यों नहीं की? इसका जवाब आदिल रज़ा ख़ान (एक ग़ैर सेलेब्रिटी भारतीय) से आखिर क्यों भाई? ज़्यादा शौक़ है तो उनके प्रोड्यूसर, डरेक्टर से पूछो. उससे भी जी नहीं भरे तो आमिर, सलमान, शाहरुख़, सैफ़ से पूछो. सब एक्टर्स हैं, बॉलीवुड से हैं, ज़्यादा जानते हैं उन सब की शख़्सियतों को.
इस बारे में मेरी समझ यही कहती है कि ज़ाहिर है वो कलाकार अपनी जगह है. लेकिन वो एक देश का बाशिंदा है. यहां अपने कमर्शियल इंटरेस्ट की वजह से है.  आज बॉलीवुड में है. 2 साल बाद का उसको खुद पता नहीं, वो क्यों परेशानी मोले. वो कलाकार कम डिप्लोमेट ज़्यादा होते हैं. सेफ गेम खेलते हैं. इंडिया उनके लिए सेफ़ कमर्शियल डेस्टिनेशन है. गुरु, ये दुनिया ही ऐसी है. सब कहते हैं. चाहे वो किसी भी देश का हो. बात अगर ऐसी ही है तो भाई कई सालों तक हमारे मौजूदा प्रधानमंत्री मोदी अमेरिका के लिए ऑफिशली एक क्रूर, निर्दयी बने रहे. वीज़ा तक नहीं दिया था.  इस बात के लिए उस वक़्त भारतीय मूल के लोगों ने अमेरिका की निंदा नहीं की. लेकिन यही जब मोदी वाहां पहुंचे तो भारतीय मूल के तक़रीबन 20 लाख लोगों ने घंटों नारे लगाए और तालियां बजाई.
ऐसा सेफ़ गेम सब बड़े लोग खेलते हैं. चाहे वो फ़िल्मी सितारे हों या खादीधारी पॉलिटिशियन. नफ़रत करने, किसको कहां रहना चाहिए, किस मौक़े पर क्या बोलना चाहिए. क्या राष्ट्रप्रेम है. क्या राष्ट्रद्रोह इसका ज़िम्मा छोड़ दिया है छोटे-छोटे लोगों पर. हम में से बहुत से अक्षरशः ये ज़िम्मेदारी बख़ूबी निभा भी रहे हैं. क़ानून तो हम बना नहीं सकते. इस बारे में इसलिए हमको फेसबुक, ट्विटर का झुनझुना दे दिया गया है. बजाते रहो, नफ़रत करो, अपनी मानसिक शांति और संतुलन खोते रहो इसी में उलझकर.
कहने को ये डिजिटल युग है. पर असल में ये है 'कलजुग'. बीच-बीच में कुछ न कुछ चलता ही रहता है. सानिया मिर्ज़ा ने पाकिस्तानी क्रिकेटर से शादी की तो दोस्तों के साथ मज़ाक में हमने भी कहा कि हमलोग क्या मर गए थे. लेकिन असल में मुझे क्या. वो कहीं भी शादी करे, किसी से भी करे. ये बात अगर सीरियसली मैंने कही तो सीधे पूछा गया. "क्या आप अपनी बहन-बेटी की शादी कर देंगे पाकिस्तान में". सवाल बेहद मुश्किल है. जवाब मैंने अपने वसुधैव कुटुम्बकम् का चोला उतारते हुए बड़ी ही सकुचाते हुए दिया. साहब बेटी-बहन इतनी दूर. वहां शांति नहीं, आए दिन धमाका. मन ख़राब हो जाएगा सो 'नहीं'. इतने में काउंटर सवाल कि फ़र्ज़ करो कि शांति ही शांति है वहां. मैंने झट से कहां "व्हाई नॉट". अगर कनाडा, अमेरिका, ब्रिटेन में बहन-बेटी ब्याह कर जाती हैं. लाहौर, कराची तो शांत है, फिर क्या दिक्कत. भाई साहब इतना सुनते ही वो नाराज़. पाकिस्तान परस्त का दबी ज़ुबान टैग लगा. मैं चुप. डिफेंड करने को कुछ नहीं. अब तो बस मैं और मेरे दिल में मेरे मादर-ए-वतन के लिए भरी पड़ी मुहब्बत से मुस्कुराने वाला उत्साह भर. कूटनीतिक मसले को मुहल्ले की पंचायत बना दिया गया है, जहां मेरा ज़र तेरी ज़मीन, यही सब चल रहा है. इतने वायलेंट तो हम वहां भी नहीं होते. सुबह लातम-जूतम, लेकिन शाम को मुहल्ले पर किसी दूसरे इलाके से मंडराते ख़तरे को साथ मिलकर निपटाने की तैयारी और फिर चाय. लेकिन यहां मंज़र कुछ और है. कोई युद्धपोत पर बैठा है तो कोई बुद्ध बना बैठा है. अब इन्हीं दोनों की आपस में लड़ाई है. बहुत ही गहरी खाई है. हल है तो सिर्फ हुकूमत के पास है. उसमें कभी आक्रोश है तो कभी वो बिल्कुल ख़ामोश है. लेकिन करना उसे ही है. इन सबके दरम्यान बीच-बीच में आपकी आपके मुल्क के प्रति लॉयल्टी टेस्ट का जो कॉम्पिटिशन चल रहा है, वो बेहद ख़तरनाक है. बरसों से एक समाज, एक थाली शेयर कर रहे दिल पट रहे हैं सिर्फ़ वतनपरस्ती पर शक के नाम से. ऐसे में किसी दुश्मन, किसी टैंक, किसी सबमरीन से आपको ख़तरा ही नहीं. आप ख़ुद ही काफ़ी हैं अपने मुल्क में अशांति फ़ैलाने के लिए. बची-खुची साझी विरासत की इस तहज़ीब को सुनसान खंडहर बनाने के लिए. जम्हूरियत की मुरझाती इस पौध को सुखाने के लिए. सरकारें वीज़ा बांट रही हैं और इंसानों के दिल भी.

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