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क्या मोदी सरकार अमीरी-गरीबी का भेद बताती ऑक्सफैम की रिपोर्ट को स्वीकार कर पाएगी?

देश के 1 फीसदी रईसों के पास देश की कुल 40% से ज्यादा संपत्ति

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ऑक्सफैम की रिपोर्ट में सामने आए चौकाने वाले खुलासे

11 जनवरी को मध्यप्रदेश के इंदौर में हुए Global Investors Summit के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि इंटरनैशनल मॉनेटरी फंड IMF, ग्लोबल इकॉनमी में भारत को एक ''ब्राइट स्पॉट'' की तरह देखता है. भारत G 20 देशों में सबसे तेज़ी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्थाओं में से एक होगा. भारत निवेशकों के लिए सबसे अच्छी मंज़िल है. G 20 की बात चली है, तो भारत के G 20 शेरपा और नीति आयोग के पूर्व सीईओ अमिताभ कांत का आज आया ट्वीट भी देख लेते हैं. वो लिखते हैं,
''7 साल पहले प्रधानमंत्री मोदी ने ''स्टार्ट अप इंडिया'' की शुरुआत की. तब 471 स्टार्ट अप थे. आज हमारे 88 हज़ार से ज़्यादा स्टार्ट अप है. भारत आज तीसरा सबसे बड़ा स्टार्ट अप ईकोसिस्टम है."

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माने देश में पैसा आ तो रहा है. लेकिन ये पैसा जा कहां रहा है? क्या देश की आय बढ़ रही है, तो सभी की आय बढ़ रही है? या फिर चंद लोग अमीर होते जा रहे हैं, और बाकी गरीब? ऐसे ही सवालों के जवाब देती एक रिपोर्ट आई है, जो कहती है कि भारत के 70 करोड़ लोगों से ज़्यादा पैसा सिर्फ 21 लोगों के पास जमा है.

''सरवाइवल ऑफ द फिटेस्ट'' का सिद्धांत कहता है कि जो सबसे फिट होगा, उसी का वजूद बाकी रहेगा. लेकिन ऑक्सफैम इंडिया की रिपोर्ट - Survival of the Richest: The India Supplement कहती है कि सरवाइवल में आगे ''फिट'' नहीं, ''रिच'' हैं. माने पैसे वाले. और ये सिर्फ सरवाइव नहीं कर रहे, इनके चलते जो रिच नहीं हैं, वो पिसे जा रहे हैं. भारत में अमीरों के अमीर होने और गरीबों के और गरीब होते जाने की बात इसी रिपोर्ट में कही गई है. इस रिपोर्ट की बारीकियों में जाने से पहले ये समझना ज़रूरी है कि ऑक्सफैम है क्या.

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ऑक्सफैम का नाम आया है Oxford Committee for Famine Relief से. द्वितीय विश्वयुद्ध का दौर था. अप्रैल 1941 में ग्रीस पर एक्सिस पावर्स - माने नात्ज़ी जर्मनी और इटली का कब्ज़ा हो गया. ये ग्रीस को लूटने लगे. ग्रीस में जमी जर्मन सेना का मनोबल तोड़ने के लिए मित्र देशों ने ग्रीस का हुक्का पानी बंद कर दिया. और रसद की सप्लाई पर रोक लग गई. नतीजे - ग्रीस में भयंकर अकाल पड़ गया. 1941 से 1944 तक चले इस अकाल ने तकरीबन 3 लाख लोगों की जान ले ली.

ग्रीस में जो हो रहा था, पूरी दुनिया को पता था. लेकिन नात्ज़ियों के खतरे के आगे अकाल में मर रहे लोगों की सुध कौन लेता. इसी पागलपन के बीच ब्रिटेन के ऑक्सफोर्ड शहर में कुछ समाजसेवी और शिक्षाविद मिले और ऑक्सफैम की स्थापना की. ताकी ब्रिटेन की सरकार पर दबाव डालकर ग्रीस तक अनाज की सप्लाई दोबारा शुरू कराई जा सके. तभी से OXFAM दुनिया भर में आपदा राहत और गरीबी उन्मूलन का काम कर रहा है. दुनियाभर के अलग अलग देशों में कुल 20 ''OXFAM'' बने हुए हैं. मसलन ऑक्सफैम अमेरिका, ऑक्सफैम ऑस्ट्रेलिया आदि. भारत वाले संगठन का नाम है ऑक्सफैम इंडिया. हम आज इसी संगठन द्वारा जारी रिपोर्ट की बात करने वाले हैं.

आर्थिक विषमता एक ऐसा विषय है, जिसे खबरों की दुनिया में ड्राय टॉपिक कहा जाता है. क्योंकि लोग इसमें रुचि नहीं लेते. इसीलिए हम आपको ऑक्सफैम इंडिया की रिपोर्ट में दर्ज  किलर फैक्ट्स से अवगत कराना चाहते हैं. ये नाम हमने नहीं, ऑक्सफैम ने ही दिया है. गौर कीजिए -

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- देश के 1 फीसदी रईसों के बाद देश की कुल 40% से ज्यादा संपत्ति है. जबकि नीचे 50% लोगों के पास सिर्फ 1% संपत्ति है. ये साल 2021 के आंकड़े हैं.
- ऊपर के 10 फीसदी लोगों के पास देश की कुल संपत्ति का 72% हिस्सा है. बाकी के 90 फीसदी लोगों के पास सिर्फ 28 फीसदी.
- साल 2020-21 में सरकार की तरफ से कॉरपोरेट घरानों को 1 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा की छूट दी गई, जो मनरेगा के लिए जारी किए गए बजट से ज्यादा है.
- देश की कुल 64% GST नीचे के 50% लोग भर रहे हैं, 31% GST बीच के 40% लोग जमा करते हैं, जबकि टॉप के 10% लोगों का GST में योगदान सिर्फ 4% ही है.
- अगर देश के सभी अरबपतियों की कुल संपत्ति का सिर्फ 2% टैक्स लगा दिया जाए तो सरकार को 40 हजार करोड़ रुपये ज्यादा मिलेंगे, जिससे अगले 3 साल तक कुपोषण दूर करने की दिशा में काम किया जा सकता है.
- अगर देश के टॉप 10 अमीर लोगों पर एक बार 5% का टैक्स लगा दिया जाए तो उससे सरकार को 1 लाख 37 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा मिलेंगे. जो स्वास्थ्य, आयुष आदि मंत्रालयों के बजट से भी ज्यादा होगा.
- भारत की आधी आबादी, जिसकी देश की संपत्ति में कुल हिस्सेदारी 3 फीसदी है, उसकी आमदनी साल 2020 में 13% कम हो गई.

ऑक्सफैम की रिपोर्ट बताती है कि दुनिया में सबसे ज़्यादा गरीब भारत में बसते हैं. इनकी संख्या करीब 22 करोड़ 89 लाख है. और इन गरीबों की मुश्किलें क्रमशः बढ़ती ही गई हैं. केंद्र सरकार ने खुद सुप्रीम कोर्ट को बताया था, कि भारत में पांच साल से नीचे के बच्चों की मौतों में 65 फीसदी कुपोषण की वजह से थीं. ये 1947 के नहीं, 2022 के आंकड़े हैं. माने गरीब इतने गरीब हैं, कि अपने बच्चों तक के खाने-पीने का इंतज़ाम नहीं कर पा रहे. पैसे और कुपोषण के बीच संबंध को एशियन डेवलपमेंट बैंक की रिपोर्ट से भी समझा जा सकता है. ADB ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि जब विकासशील देशों में महंगाई 1 फीसदी बढ़ती है, तब कुपोषण आधा फीसदी बढ़ जाता है और शिशु एवं बाल मृत्यु दर माने इंफेंट एंड चाइल्ड मोर्टैलिटी रेट 0.3 फीसदी बढ़ जाता है.

लगातार गरीबों की बात हुई, तो हमने ऑक्सफैम के सीईओ अमिताभ बेहार से ये पूछा कि सरकार कोरोना काल से ही गरीबों को मुफ्त राशन दे रही है. तब सरकार की नीतियों की आलोचना कैसे की जा सकती है. इसपर अमिताभ बेहार ने कहा,

"बहुत मसलों पर सरकार को नई नीति की जरूरत है. स्वास्थ्य सेवाओं में निवेश की जरूरत है, लेकिन कोरोना काल में स्वास्थ्य मंत्रालय का बजट पहले से कम रहा." कॉर्पोरेट टैक्स में

ये सामान्य सी बात है कि जब पैसा कम होगा, तब सबसे पहले आदमी पेट भरने के बारे में सोचेगा. समस्या ये है कि गरीबों के पास पैसा कम है, लेकिन उन्हें खाने के लिए ज़्यादा पैसा खर्च पड़ता है. वर्ल्ड बैंक कहता है कि भारत में सबसे गरीब 25 फीसदी लोग अगर 100 रुपए कमाते हैं, तो उन्हें 53 रुपए सिर्फ खाने पर खर्च करने पड़ते हैं. वहीं सबसे अमीर 25 फीसदी लोग 12 रुपए से भी कम में काम चला लेते हैं. गरीबों के पास पैसा इतना कम है, कि जब कोई समस्या आती है, मसलन घर पर कोई बीमार पड़ता है, तो घर का रहा-सहा बजट भी ध्वस्त हो जाता है. मार्च 2022 में विश्व स्वास्थ्य संगठन WHO ने एक रिपोर्ट जारी की थी. इसके मुताबिक भारत में 17 फीसदी परिवार स्वास्थ्य पर खर्च करते करते तबाह हो रहे हैं.

इसका एक परिणाम हताशा भी होता है. 2021 के लिए नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो NCRB के आंकड़े बताते हैं कि रोज़ औसतन 115 मज़दूर आत्महत्या कर रहे थे. एक आम समझ है कि पैसा जाति या लिंग नहीं देखता. इसीलिए हमें लगता है कि आर्थिक विषमता में जाति या भूगोल का कोई एंगल नहीं होता होगा. अगर आपको भी ऐसा लगता है, तो आपको अमिताभ बेहार कहते हैं,

"भारत में गैर बराबरी को आर्थिक आसमानता के आधार पर नहीं देखा जा सकता. सामाजिक असमानता को भी समझना होगा. देश के 100 अरबपतियों में सिर्फ 7 महिलाएं हैं, इनमें से भी 2 महिलाएं ऐसी हैं जिन्हें ये संपत्ति उनके परिवार से मिली है. पुरुषों के मुकाबले महिलाओं की आय कम है."

अब आ जाते हैं मिडिल क्लास पर. मिडल क्लास की शिकायत है कि सब अमीर और गरीब की बात करते हैं, उसकी तरफ किसी का ध्यान नहीं रहता. ऑक्सफैम की रिपोर्ट भारत के मिडिल क्लास की पतली होती हालत के बारे में भी बताती है. इसके मुताबिक भारतीय मिडिल क्लास अपनी आय का 25 फीसदी से भी ज़्यादा सिर्फ लोन चुकाने में खर्च कर रहा है. ऐसे में जब भारतीय रिज़र्व बैंक महंगाई को काबू करने के लिए रेपो रेट बढ़ता है, तो एक अनचाहे असर के रूप में पहले से चल रहे कर्ज़ महंगे हो जाते हैं. आम लोग बैंक की जकड़ से बाहर नहीं निकल पाते. जबकि बीते 6 वित्त वर्षों में बैंक्स ने तकरीबन 11 लाख करोड़ रुपए के कर्ज़ बट्टे खाते में डाले हैं. इस रकम का बड़ा हिस्सा भारी भरकम लोन से बना है. न कि छोटे कर्ज़, जो कि आम लोग लेते हैं.

इन्हीं आंकड़ों के आधार पर ऑक्सफैम इंडिया भारत के टैक्स ढांचे में बदलाव की वकालत कर रहा है. दलील ये है कि धनी लोगों पर टैक्स बढ़ाया जाए और निचले तबकों पर असर डालने वाले परोक्ष टैक्स मसलन GST और वैट को कम किया जाए. हमने अतीत में देखा है कि लोकतांत्रिक मूल्य, प्रेस की स्वतंत्रता आदि पर जब किसी रैंकिंग एजेंसी की रिपोर्ट में भारत सरकार पर सवाल उठाए जाते हैं, तो सरकार का जवाब होता है कि रिपोर्ट भारत की सच्चाई को ठीक से बयान नहीं करती.

ऑक्सफैम की रिपोर्ट पर हमने अर्थशास्त्री शरत कोहली से भी बात की. हमने उनसे पूछा कि आर्थिक उदारीकरण के वक्त कहा गया था कि इससे उद्योगों को फायदा मिलेगा, करोड़पति बनेंगे और ये लाभ धीरे धीरे नीचे की आबादी को भी मिल जाएगा. ऐसा क्यों नहीं हुआ. क्या सरकारी नीतियों में खामी रह गई. उन्होंने क्या कहा, सुनिए -

"आर्थिक उदारीकरण की वजह से कुछ लोगों की काफी फायदा हुआ और बाकी लोग पीछे रह गए. नौकरियों के नए अवसर पैदा नहीं हो पाए और सिर्फ कुछ लोग ही अच्छी शिक्षा हासिल कर पाए, जिस वजह से रोजगार के अवसर भी कम हैं."  

शरत कोहली ने हमें ये भी बताया कि आर्थिक विषमता सिर्फ भारत में ही नहीं है. ये फिनॉमिना, दुनिया के दूसरे देशों में भी देखने को मिलता है.

आर्थिक विषमता एक ऐसा विषय है, जिसपर प्रायः राय बंटी रहती है. एक धड़ा मानता है कि जो मेहनत करता है, सफल हो जाता है. ऐसे में सरकार को हर किसी की गरीबी के लिए ज़िम्मेदार नहीं बताया जा सकता. फिर बड़े उद्योगपति ही वो लोग हैं, जो बड़े बड़े उपक्रम लगाते हैं, जिनमें युवाओं को रोज़गार मिलता है. लेकिन अतीत के हमारे अनुभव बताते हैं कि जब जब आर्थिक असमानता एक स्तर से ऊपर बढ़ी, तब तब समाज में असंतोष पनपा और क्रांतियां हुईं. आज का भारत भी एक क्रांति के नतीजे में ही जन्मा है. जब हमने उपनिवेश को यहां से उखाड़ फेंका. ऐसे में नए भारत की ये ज़िम्मेदारी है कि वो जब आगे बढ़े, तो सभी को लेकर बढ़े. और इसके लिए ज़रूरी है कि सभी को अच्छी शिक्षा और स्वास्थ्य मिले. और ये काम सरकारों के ज़रिये ही संभव है. इसके लिए संसाधन जुटाना, उन संसाधनों का प्रबंधन करना भी सरकार की ही ज़िम्मेदारी है. इन संसाधनों में किसे कितनी हिस्सेदारी देनी है, ये आप दर्शक तय करें. 

वीडियो: दी लल्लनटॉप शो: अमीरी-गरीबी का भेद बताती ये रिपोर्ट क्या मोदी सरकार स्वीकार कर पाएगी?

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