‘हम पनामा के लोग पनामा नहर के किनारे बैठकर अपने दुश्मनों की बहती हुई लाशें देखेंगे.’
वही तारीख, वही तरीका...36 साल पहले जब अमेरिका ने इस देश के नेता को पकड़ा था!
वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की तरह 36 साल पहले अमेरिका ने पनामा के भी नेता को उनके शहर से उठा लिया था. ये नेता थे मैनुअल नोरिएगा, जिन्हें गिरफ्तार के लिए अमेरिका ने 26 हजार सैनिक भेजे थे.


हाथ में बड़ा चाकू ‘माचेते’ लेकर मैनुअल नोरिएगा ने जब ये घोषणा की, उस समय अमेरिका से उनकी एकदम पक्की दुश्मनी हो गई थी. ऐसा नहीं था कि वह वेनेजुएला वाले निकोलस मादुरो की तरह हमेशा से अमेरिका विरोधी थी. वह तो पनामा में अमेरिका के ‘जासूस’ थे. दुनिया भर में मार्क्सवादी सरकारों के खिलाफ अमेरिकी अभियानों के अहम हथियार थे.
नोरिएगा उस समय सेंट्रल इंटेलीजेंस एजेंसी यानी CIA के एकदम विश्वस्त सहयोगी थे, जब जॉर्ज एच डब्ल्यू बुश इस अमेरिकी खुफिया एजेंसी के मुखिया होते थे. लेकिन फिर कुछ ऐसा हुआ कि एकदम फिल्मी अंदाज में उसी जॉर्ज HW बुश ने अपने पनामा वाले सहयोगी मैनुअल नोरिएगा को वैसे ही घर में घुसकर उठवा लिया, जैसे डॉनल्ड ट्रंप ने 3 जनवरी 2025 को वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को उनके बेडरूम से कैप्चर कर लिया था.
तारीख भी सेम थी. आरोप भी सेम ही थे. 3 जनवरी 1990 को पनामा के नेता मैनुअल नोरिएगा को अमेरिकी सेना ने वेटिकन के दूतावास से आत्मसमर्पण के बाद धर लिया और इसके बाद अगले दो दशक तक वो ड्रग तस्करी के आरोप में अमेरिका की जेल में बंद रहे.
नोरिएगा की कहानीइस कहानी की चर्चा आज हम इसीलिए कर रहे हैं क्योंकि जो दुनिया ट्रंप के वेनेजुएला इन्वेजन को लेकर हायतौबा मचा रही है, वो जान ले कि अमेरिका के लिए ये काम कोई नया नहीं है. ये काम 36 साल पहले भी किया जा चुका है.
हालांकि, ये कहानी सिर्फ ‘विरोध-विरोध’ की नहीं है. इसमें दोस्ती है. दोस्ती का इस्तेमाल है. दोस्ती में धोखा है. फिर दुश्मनी है. उसका खुला ऐलान है. टकराव है. सेना की चढ़ाई है. बड़े-बड़े स्पीकर हैं और उन पर बजते कनफोड़ू गानों से हारकर आत्मसमर्पण की विशुद्ध फिल्मी कहानी है और ये कहानी शुरू होती है साल 1968 से.
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, मैनुअल नोरिएगा पहली बार तभी चर्चा में आए थे. पनामा में तख्तापलट कर सत्ता में आए ओमार तोरिहोस ने नोरिएगा को सैन्य खुफिया एजेंसी का प्रमुख बना दिया था. नोरिएगा तोरिहोस के कई तरह से काम आते थे. चालाक तो वह थे ही. तोरिहोस के कई विरोधियों को ‘गायब’ कर देने का कमाल तो उन्हें आता ही था. इसके अलावा सेना के कई गोपनीय और भ्रष्टाचारी सौदों में भी उन्होंने अहम भूमिका निभाई थी. 1970 तक आते-आते नोरिएगा ने अपने पांव पनामा से बाहर भी फैलाए. इस वक्त तक वह अमेरिका की खुफिया एजेंसी CIA के हाथ-पैर बन गए थे.
अमेरिका की साम्यवादी सरकारों के खिलाफ जंग में भी नोरिएगा अहम ‘सिपहसालार’ थे. उनकी वजह से अमेरिका को पनामा में खुफिया चौकी (Listening Post) बनाने का मौका मिल गया. इसके अलावा अमेरिका के समर्थन वाली सेनाओं को मदद करने के लिए भी पनामा की धरती के इस्तेमाल की इजाजत दे दी गई.
तोरिहोस की मौतइसी बीच साल 1981 की एक घटना ने पनामा की राजनीति में एक बड़ा मोड़ ला दिया. एक विमान हादसे में राष्ट्रपति तोरिहोस की मौत हो गई. उनके बाद नोरिएगा पनामा के फैक्टो लीडर बन गए. फैक्टो लीडर यानी जो कागज में भले शासक न हो लेकिन उसके पास इतने अधिकार हों कि वही शासक जैसा आभास दे.
यहां से नोरियेगा और अमेरिका के संबंधों में विचलन शुरू होता है. वॉशिंगटन के सहयोगी होने के बावजूद उन्होंने पाब्लो एस्कोबार जैसे कोलंबिया के ड्रग माफियाओं के साथ हाथ मिला लिया. वह कोकीन की अमेरिका में तस्करी में सहयोग करने लगे. इतना ही नहीं, पनामा के बैंकों के जरिए ड्रग का काला धन सफेद भी करने लगे. इसके बदले में उन्हें करोड़ों की रिश्वत मिली. अमेरिका को ये सब बातें पता थीं लेकिन कम्युनिस्ट देशों से लड़ाई में नोरियेगा की अहमियत जानते हुए वो इन सब पर चुप्पी साधे बैठा रहा.
अमेरिका को हुआ शकअमेरिका ये सब बर्दाश्त कर ही रहा था कि तभी उसे पता चला कि नोरिएगा दूसरी खुफिया एजेंसियों को भी अपनी सेवाएं दे रहे हैं. ये बात बर्दाश्त के बाहर थी. अमेरिका ने नोरिएगा से दूरी बना ली. इतना ही नहीं हुआ. 1988 में अमेरिका के एक कोर्ट में नोरिएगा पर ड्रग तस्करी को लेकर आरोप भी तय हो गए. इसके अगले ही साल पनामा में चुनाव होने थे. इस चुनाव में तय था कि नोरियेगा हारेंगे और विपक्षी पार्टी जीतेगी. नोरिएगा ने ये चुनाव ही रद्द कर दिया. फिर 15 दिसंबर को पनामा की नेशनल असेंबली ने उन्हें 'मैक्सिमम लीडर' घोषित कर दिया.
इसके बाद नोरिएगा ने तत्काल अमेरिका और पनामा के बीच 'स्टेट ऑफ वॉर' का ऐलान कर दिया. वह मंच पर एक बड़ा चाकू माचेते लेकर पहुंचे और कहा कि ‘हम पनामा नहर से दुश्मनों की बहती हुई लाशें देखेंगे.’ इसके अगले ही दिन पनामा की सेना ने राजधानी में एक अमेरिकी को गोली मार दी. इस घटना का एक अमेरिकी नौसेना अधिकारी गवाह था. पनामा की आर्मी ने उसे भी बुरी तरह पीटा.
अमेरिका का पलटवारइस घटना से अमेरिका की सहनशक्ति जवाब दे गई. उस समय अमेरिका के राष्ट्रपति जॉर्ज एचडब्ल्यू बुश थे. वही बुश जिनके साथ नोरिएगा ने सीआईए में काम किया था. बुश ने इस घटना की प्रतिक्रिया में ‘ऑपरेशन जस्ट कॉज’ शुरू किया. 26 हजार अमेरिकी सैनिक पनामा भेजे गए. 20 दिसंबर 1989 को अमेरिकी सैनिक पनामा में घुस गए और नोरिएगा को खोजना शुरू कर दिया. अमेरिकी सेना के आगे पनामा की आर्मी ने घुटने टेक दिए लेकिन नोरिएगा उसे नहीं मिले.
पता चला कि भागते-भागते वह खुद को बचाने के लिए वैटिकन की एंबेसी में घुस गए हैं. अब अमेरिका की आर्मी दूसरे देश में तो घुस सकती है लेकिन दूतावास में घुसती तो कूटनीतिक नियम टूटते. नियमों को लेकर अमेरिका की इस चिंता पर बिडंबना भी आत्महत्या कर ले. खैर, सेना को दूतावास में घुसने की परमिशन नहीं मिली. ऐसे में सेना ने एक गजब का नाटकीय तरीका निकाला. शायद हॉलीवुड फिल्मों का असर हो कि ये आइडिया उनके दिमाग में आया. इस तरीके को साइकोलॉजिकल वॉरफेयर कहते हैं, जिसमें टारगेट पर मेंटल प्रेशर बनाया जाता है.
सरेंडर के लिए म्यूजिक का सहारासेना ने एंबेसी के चारों ओर बड़े-बड़े स्पीकर लगा दिए और तेज आवाज में गाने बजाने लगे. नोरिएगा को संगीत तो पसंद था लेकिन भीसमेन जोशी को सुनने वाले किसी व्यक्ति के पास बड़े बड़े डीजे लगाकर कोई चाहत फतेह अली खान का गाना बजा दे तो उसका क्या हाल होगा?
नोरिएगा के साथ यही हुआ. अमेरिकी सेना ने कई दिनों तक नोरिएगा को पब्लिक एनिमी का ‘फाइट द पावर’, वैन हेलन का ‘पनामा’, केनी लॉगिंस का ‘डेंजर जोन’ और टॉम पेटी का ‘रिफ्यूजी’ लगातार सुनाया. इन संगीत की खासियत ये थी कि ये काफी उत्तेजक और अराजक (Chaotic) थे. कई दिनों तक बिना रुके तेज म्यूजिक बजते रहने के बाद आखिरकार 3 जनवरी 1990 को नोरिएगा ने आत्मसमर्पण कर दिया. उन पर अमेरिका में ड्रग तस्करी का मुकदमा चला और सजा भी हुई. नोरिएगा करीब दो दशक अमेरिकी जेलों में रहे. बाद में साल 2017 में पनामा सिटी में अपने ही घर में नजरबंद रहते 83 साल की उम्र में उनकी मौत हो गई.
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