सबके मुंह पर मानो ताला जड़ दिया गया था. महान्ति घर की बुढ़िया, जो ताजा मछली में भी कीड़ा फेंक देने को अपना काम मानती है, उसके मुंह पर भी इतना बड़ा ताला! साड़ी की किनारी को दांतों से दबाए, पल्लू को सिर पर खींच अड़ोसी-पड़ोसी औरतें एक दूसरे पर एक चढ़ी, पीठ पर सिर रख ध्यान से परिडा घर के आँगन-द्वार को निहार रही हैं. दृश्य इतना विरल, इतना न्यारा है कि अपने अनुभव से तुलना करने का कोई प्रतिमान उनके पास नहीं है.
एक कहानी रोज़: 'झूठ का पेड़'
'एक कहानी रोज़' में आज पढ़िए गौरहरि दास की कहानी.


''मैं कह नहीं रही थी...’’ किसी शान्त पोखरी में नन्हा बच्चा फेंकने जैसा कुछ नई ब्याहता ने कहा, पर उसे अपना वाक्य पूरा करने का अवसर नहीं मिला. ऐसी महत्त्वपूर्ण घटना के बारे में पहली टिप्पणी देने का गौरव कुछ खास होता है, उसे कोई हाथ से जाने नहीं देना चाहता.
''तू क्या कह रही थी री?’’ प्रधान के घर की बड़ी बहू चौंक गई. नई ब्याहता बहू को गड़बड़ा देने के लिए इतना ही काफी था, पर उनकी आशंका सच नहीं हुई. नई ब्याहता ने कहा, ''मैं कह रही थी, परिडा घर की बहू की बड़े-बड़े लोगों से जान-पहचान है. मेरी बात तो किसी ने सुनी नहीं. जो भी हो, है तो भुवनेश्वर की बेटी!’’
महान्ति घर की बुढ़िया अब चुप न रह सकी. इसके बाद चुप रहना तो मानो देशद्रोह सरीखा अपराध होता. उसने कहा, ''क्यों री, किसने कब ऐसा कहा था? सभी उसे बड़बोली कहते हैं. फिर आज क्यों भली बन रही है?’’ ''अच्छा, ठीक, उधर देखो!’’ ये सारी बातें तो बाद में किसी और दिन भी हो सकेंगी, पर सामने घट रही घटना मानो फिर कभी घटित न होगी, ऐसी धारणा देती एक किशोरी सबको परिडा घर के आँगन में हो रही घटना की ओर आकर्षित कर रही है.
पाटपुर गाँव के सिर पर है परिडा घर. सनातन के बाप-दादा गाँव में अपने पैतृक घर में रहते थे. शायद सनातन भी वहीं अपना जीवन बिता देता, पर तुलसी ने ऐसा करने नहीं दिया. सनातन की धर्मपत्नी होकर इस गाँव में आने के अगले दिन से ही पुराने जमाने के घर को लेकर असंतुष्टि जाहिर करना शुरू कर दिया. चारों ओर से बन्द दीवारें, तेल सने चीकट दरवाजे और झरोखे, कनखजूरे, तेलिया कीटों से भरपूर छप्पर, तुलसी के पेट का भात बाहर निकाल लाए. सनातन ने स्वीकारा कि रेवेन्यू इंस्पेक्टर जैसे सरकारी अफसर की बेटी तुलसी की ऐसी प्रतिक्रिया स्वाभाविक थी. तुलसी अपने नये ट्रंक और बैग में अन्य सामान के साथ दर्जन भर नये सपनों की पोटली भी लेकर आई थी. उसने एक-एक कर सब रख दिया सनातन के सामने. एक से बढ़कर एक, अगला पहले से भी अधिक सुन्दर.
उसने तुलसी के पाउडर सज्जित मुखड़े को निहार स्कूल के दिनों में पढ़े हुए नाटक के संवाद को याद करते हुए कहा, ''लंबे पेड़ की तरह गगनस्पर्शी स्वप्न देखने से क्या होगा? मिट्टी तले की जड़ें मजबूत होनी चाहिए.’’ सनातन ऐसा कहने के बाद स्वयं अद्भुत आत्मविभोरता से रोमांचित हो उठा, क्योंकि उसे विश्वास था कि ऐसा मूल्यवान वाक्य इस गाँव के किसी पति ने अपनी नवपरिणीता पत्नी से कभी नहीं कहा होगा.
अपनों से दूर अपरिचित परिवेश में आने के बाद भी सिनेमा के नायक-नायिका जैसे गीत की आगे-पीछे की पंक्तियाँ पहले से जानते होते हैं, उसी तरह तुलसी ने जब सनातन से कहा कि आकाश को छुआ नहीं जा सकता, यह जानते हुए भी पेड़ बढ़ता है, नहीं तो बीज बना माटी में पड़ा रहता है, सुनकर सनातन रोमांचित हो उठा था. उस रात पुन:-पुन: रोमांचित सनातन सुबह होते ही निर्णय ले चुका था कि मंत्री की पर्याय जैसी धर्मपत्नी यदि कोई है तो वह है उसकी पत्नी तुलसी. ये बातें लेकिन बहुत पहले की हैं. इसके बाद नाना प्रकार के कई नए कारण दिखा सनातन पाटपुर गाँव के सिरे पर स्थित इस डीह पर चला आया था. भाई चाह रहे थे कि इस जगह धान-मिल बिठाएँगे. डीह गाँव के सिर और बाजार चौक के आसपास होने के कारण यहाँ धान-मिल लगने से खूब चलेगा, इस पर सनातन भी राजी हो गया था, पर तुलसी का प्रस्ताव उसके लिए बाकी परिवार के निर्णय की अपेक्षा अधिक महत्त्वपूर्ण था.
सनातन ने जब यहाँ घर बनाया तो यह जगह सुनसान पड़ी थी, पर अब आसपास दूसरे लोगों ने भी मकान बना लिये हैं. सनातन के घर के चारों ओर नारियल पेड़, बाड़ी की ओर ताल, आँगन में कुआँ और तुलसी चौरा है. ''बड़े डील-डौल वाला दिखाई देता है बेटा! ये राजा है कि मंत्री री?’’ ''और क्या राजा रह गए हैं देश में? राजा का पद तो कब का उठ चुका. ये मंत्री हैं.’’ एक किशोरी ने कहा. ''राजा का पद यदि उठ गया तो मंत्री पद कैसे रहा री?’’
महान्ति घर की बुढ़िया ने उसकी बात को नापसन्द करने के अन्दाज में पूछा था, पर किशोरी चुप न रह सकी, ''पहले जिन्हें राजा कहा जाता था, अब उनको मंत्री कहते हैं. देश स्वाधीन हुआ तो राजे-रजवाड़ों का शासन भी उठ गया. देखती नहीं हो, ये क्या राजा की तरह मुकुट पहने हुए हैं?’’ उसने उलटा जवाब दिया. और कोई वक्त होता तो महान्ति घर की बुढ़िया चुप रहने वाली न थी. स्कूल जाने वाली इस छोरी को जरूर दो-चार तो सुना ही देती, पर आज उसके पास समय नहीं था. वह अपनी चौंध-भरी आँखों को परिडा घर की ओर लम्बा कर घट रही घटनाओं को देख रही थी.
परिडा घर के आँगन में घटित हो रही घटनाओं का यदि कोई धाराप्रवाह विवरण देता तो इस प्रकार देता : 'न कहा, न बोला, हठात् मंत्री की गाड़ी आकर सनातन परिडा के दरवाजे पर रुकी. खबर देने का मतलब कहाँ रहा? मंत्री के साथ सनातन परिडा के परिवार का गहरा सम्बन्ध है, सभी जानते हैं. सनातन परिडा की पत्नी तुलसी देवी पहले भी बार-बार आस-पड़ोस, बन्धु-बान्धव और जान-पहचान वालों को यह जानकारी देती आई है. मंत्री की गाड़ी आ पहुँचने पर सनातन दौड़ा और मंत्री को सत्कारसहित ले आया. तुरन्त पेड़ से नारियल उतारे गए और मंत्री के साथ आने वाले ड्राइवर, पुलिस, प्राइवेट सेक्रेटरी—सभी ने नारियल पानी पिया.’
मंत्री और उनके सहयोगियों के घर के भीतर जाने की घटना से सनातन और तुलसी जितने खुश हुए, अपने-अपने घर-आँगन से यह दृश्य देख रहे पड़ोसी उतने ही दुखी. इसके बाद का दृश्य नहीं देख पाना उनके दु:ख का कारण था. तुलसी के पैर जमीन पर नहीं पड़ रहे थे. सैकड़ों बार ऐसे विवरण उसने पास-पड़ोस, पोखरी घाट और ब्याह-शादी में दिये होंगे! 'फलाने मंत्री के साथ हमारी रिश्तेदारी है, पुलिस डी.जी. हमारे घर आते हैं, कलेक्टर की पत्नी मेरी बुआ की बेटी है.’ ऐसी महत्त्वपूर्ण खबर बहुत बार वह पाटपुर गाँव के लोगों को अयाचित रूप से दे चुकी है, किन्तु दु:ख की बात है कि गाँव के एक भी आदमी ने उसकी बात पर कभी विश्वास नहीं किया. उलटे आँखें मिचमिचाकर हँसी को दबा उसे निहारते रहते मानो सच में वह उन्हें कहानी सुना रही हो! औरों की क्या कहे तुलसी, उसके खुद के सनातन ने भीे उसकी बातों पर कभी विश्वास नहीं किया.
जब भी ऐसी कोई बात तुलसी ने कही, सनातन ने अविश्वास करने की भंगिमा में उसके पास से हटकर पूछा है, 'क्या सच में? मुझे पहले बताया नहीं, क्यों?’ पर तुलसी विचलित नहीं हुई. जब महान्ति घर की बुढ़िया अपने मैके की जमींदारी, प्रधान घर की नई ब्याहता अपनी बारहमासी खेती, दास घर की लड़की अपने बाप-भाई के ट्रैक्टर से खेती और महापात्र घर की बहू उसके दहेज के सन्दूक को ससुराल के लोगों के सामने खोले जाने की बात करती है तो वह भी कहती है, 'मंत्री तो हमारे बन्धु हैं! छोटे-बड़े अफसरों की बैठकें और कहकहेबाजियाँ तो हमारे घर चलती ही रहती हैं.’ कहने के बाद वह किसी को ताकती नहीं. कहीं किसी की ओर ताकने पर कहीं उसकी बात पूरी न हो सकी तो? इसी आशंका से ग्रस्त हो बिना किसी से कुछ कहे वह वहाँ से उठकर चली जाती.
उसकी बातों को लोग सुन भर लेते हैं, पर उन पर विश्वास कोई नहीं करता. सभी कहते हैं, 'सनातन की पत्नी गपोड़ी है, आसमान से चुनकर आने जैसी बातें करती है. बाप ने तो जमीन-बाड़ी की माप-जोख में इधर-उधर कर भुवनेश्वर में मकान बना लिया और बेटी मंत्री से रिश्ता बता रही है!’ आठ साल गुजर गए. इस तरह लोगों की बातें सुनती आई है तुलसी. हाट से लौटते हुए सनातन ने भी सुना है. घर लौटकर कहा भी है तुलसी से, 'ये सब कहने की जरूरत क्या है? जो सुनता है, हँसता है.’
नागिन की तरह चिहुँक उठती तुलसी. सनातन के चेहरे पर एकटक आँखें टिका पूछती, 'केवल मैं ही झूठी हूँ? और तुम तो बड़े सच्चे हो, नहीं?’ सनातन इतना भर सुन लेने के बाद चुप हो जाता, मानो साँप ने सपेरे का सम्मोहन-मंत्र सुन लिया!
मंत्री कुछ पूछने जा रहे थे, तभी एक और जीप आकर सनातन के घर के सामने ठहरी. देखने वाले पड़ोसी एक बार फिर सनसना उठे. सारी घटनाएँ क्या आज ही यहाँ एक साथ घटेंगी? पड़ोसी एक और बात भी सोच रहे थे. उस बात के लिए वे बहुत दुखी भी थे. न सिर्फ प्रायश्चित्त कर रहे थे, बल्कि महसूस कर रहे थे कि तुलसी के प्रति उनका व्यवहार कतई ठीक नहीं रहा. जिस बहू पर पाटपुर गाँव के बच्चों, बूढ़ों, औरतों—सबको गर्व होना चाहिए, उसके प्रति वे पिछले आठ बरस से अन्याय करते आ रहे हैं. ऐसा व्यवहार कर उन्होंने केवल परिडा घर की बहू तुलसी का ही अपमान नहीं किया, बल्कि अपने-अपने भविष्य पर भी कुठाराघात किया है. मंत्री चाहें तो कितना कुछ हो सकता है! इस गाँव का भाग्य बदल सकता है—उनका अपना भी भविष्य बन सकता है. इस गाँव के बेकारों को नौकरी मिल जाएगी. गाँव के रास्ता-घाट की तस्वीर बदल जाएगी. बाढ़, अकाल से पीड़ित पाटपुर गाँव सुन्दर हो सकता है. इतने सारे सुयोग अपनी मूर्खतापूर्ण बातों से खो दिये हैं. तुलसी क्या ये सब भूल सकेगी?
मंत्री जितनी बार कुछ पूछने के लिए मुँह खोलते, तुलसी तब-तब कुछ-न-कुछ परोसकर उन्हें बोलने न देती. मैके से लाए पानदान में तुलसी द्वारा परोसे गए लौंग-खोसे दो सादा पान उठा मंत्री ने जीप में आए मोटे व्यक्ति की ओर देखा. मोटे व्यक्ति ने कान-सिर सहलाते 'ये लीजिए’ कह कागज की एक पुड़िया मंत्री के हाथों में थमा दी तो मंत्री गले में पड़े तिरंगे अंगवस्त्र को ठीक करते हुए उठ खड़े हुए.
अपनी जगह से मंत्री के खड़े होते ही इतने समय तक निस्तब्ध रहा तूफान भी उठ गया. सब-के-सब तत्काल उठ खड़े हुए और चाबी वाले खिलौने की तरह जाकर गाड़ी में बैठ गए. अब आगे जीप और पीछे मंत्री की गाड़ी. मंत्री ने दोनों हाथ जोड़कर सनातन, तुलसी, देखने वालों, यहाँ तक कि समीप के नारियल पेड़, फूल-पौधों और रास्ते के किनारे की घास-झाड़ियों तक को नमस्कार किया और धूल उड़ाती गाड़ियाँ पाटपुर से छूमंतर हो गईं.
मंत्री के जाते ही तुलसी की व्यस्तता बढ़ गई. गाँव भर के लोग एक साथ उसके नदी तटवाले घर के आँगन में जमा हो गए. पहले तो सनातन ने घर की काठ चौकियों और प्लास्टिक की कुर्सियां लाकर अतिथियों को सत्कारपूर्वक बिठाने की चेष्टा की, पर जल्दी ही वह समझ गया कि इतने अधिक दर्शनार्थियों के समावेश के लिए उचित व्यवस्था करना असम्भव है. हालाँकि इसके बारे में गाँव के लोग कतई चिन्तित न थे. वे सब सनातन का समय भी नष्ट नहीं करना चाहते थे. वे तो तुलसी की सामान्य ढंग से देखा-देखी भर करना चाह रहे थे.
तुलसी लटई की तरह खाली घर से बाहर और बाहर से घर में घूम रही थी. वेश को सँभालने के दौरान ही वह कह रही थी, 'बाद में बात करेंगे, अभी तो व्यस्त हूँ. जिसकी जो भी शिकायत है, वह कागज पर लिखकर दे दो. जो करने की जरूरत है, करूँगी.’ वह फिर से साड़ी बदलने भीतर चली जा रही थी. पाटपुर गाँव में मंत्री के दौरे की ही चर्चा थी. तुलसी के परिवार से मंत्री की इतनी घनिष्ठता की बात तो कभी किसी ने कल्पना में भी न सोची थी. दूसरों की बातें तो दूर, पंचायत के सरपंच, पुलिस चौकी के सब-इंस्पेक्टर और उच्च प्राथमिक विद्यालय के हेडमास्टर तक इससे अनजान थे. सरपंच इतना भर जानते थे कि मंत्री चाँदबाली के नए अस्पताल का उद्घाटन करने आ रहे हैं, पर चाँदबाली-भद्रक के बीच पाटपुर गाँव में मंत्री के इस व्यक्तिगत कार्यक्रम का सुराग भी नहीं लगा था उनको.
मनुष्य के जीवन में कभी दस मिनट कितने कम होते हैं, कभी कितने अधिक, इस तरह के दार्शनिक चिन्तन में सनातन डूबा हुआ था. उसके चालीस साल के जीवन में ऐसी एक भी घटना कभी नहीं घटी थी. पढ़ाई, नौकरी की तलाश, हर ओर से निराशा, असफल हो गाँव वापस लौट आना और फिर भाइयों से अलग हो गाँव के सिरे पर मकान बनाकर रहने जैसे खींचतान और उतार-चढ़ाव भरे जीवन में ऐसा आश्चर्यजनक मुहूर्त तो कभी न आया था. उस दस मिनट ने न केवल उसके घटनाहीन जीवन को अर्थमय बनाया था, बल्कि इसी में वह अपने टूटे-बिखरे से दिखाई देते भविष्य को एक बार फिर सँवार लेने की सम्भावना भी देख रहा था.
मंत्री यदि चाहे तो वह क्या नहीं कर सकता? नौकरी, ठेकेदारी, राजनीति— ऐसा क्या है, जिसकी उसमें योग्यता नहीं? वह बी.ए. तक पढ़ा है, टै्रक्टर चला सकता है, अस्सी किलोमीटर की स्पीड से मोटरसाइकिल भी दौड़ा सकता है. जो लोग पाटपुर के सर्वेसर्वा बने बैठे हैं, उनसे वह किस गुण में कम है?
ढेरों सपने देखे हैं सनातन ने : भुवनेश्वर या कटक में उसका एक बँगला हो, बँगले के सामने कार. वह और उसकी पत्नी कार में बैठ घूमने जाएँ. बेटा पढ़ता अंग्रेजी स्कूल में. घर में फोन, टीवी, फ्रिज और ढेरों सामान हो. वह रहता उसी घर में, पर बीच-बीच में पाटपुर घूमने आकर रौब गाँठता, पर ये केवल सपने बने रहे. तुलसी के कहे अनुसार अंकुरित न हो सकने वाले बीज की तरह मिट्टी में दबा पड़ा रहा. उसके भीतर माटी की छाती चीरने का सामर्थ्य न रहा. वह बीज से अंकुरित नहीं हुआ. मिट्टी में रहकर आकाश को छूने जैसी हरियाली बात वह मात्र सोचता रहता. सोचते-सोचते रात बीत जाती.
तुलसी तब भी आँगन से लौटी न थी. वही एक सवाल! घुमा-फिराकर सब उससे पूछ रहे थे, 'मंत्री आपके क्या होते हैं—मामा या मौसा, भाई या जीजा?’ मंत्रियों से जैसे टीवी और अखबार वाले पूछते हैं, वैसे ही वे उससे पूछ रहे थे, पर तुलसी तो बस हल्की-सी मुस्कान से इतने सारे लोगों के सवालों के जवाब दे रही थी, कुछ बोलने की उसे फुर्सत ही कहाँ थी!
महान्ति घर की बुढ़िया, प्रधान घर की नई ब्याहता, महापात्र घर की स्कूल में पढ़ने वाली लड़की, गाँव के चौक-रास्तों को खेल का मैदान समझने वाले लड़के, महादेव के पुजारी, हमेशा व्यस्त रहने वाले गोविन्द साहू के साथ-साथ स्कूल के मैदान, पंचायत पोखरी और मन्तेई नदी के घाट—सभी मंत्री के दौरे की ही चर्चा कर रहे थे. उसी के भीतर वे अपने-आपको खोजने की चेष्टा भी कर रहे थे. भविष्य के खाते में इस घटना को कैसे और कितनी जल्दी खुद से जोड़ा जा सकता है, इस बारे में उद्यम भी कर रहे थे.
वह दिन इसी तरह से बीत गया. सनातन आशा कर रहा था कि अगले दिन भीड़ कम हो जाएगी, पर तुलसी वैसा नहीं सोच रही थी. अनुमान तुलसी का ही सही निकला.
अगले दिन उनके घर आनेवालों की संख्या बढ़ गई, पर मंत्री के यहाँ होने के समय उपजे कौतूहल और आज के कौतूहल के बीच बड़ा अन्तर था. बीते कल जैसे सभी एक साथ मंत्री को देखने के लिए उठ आए थे, आज वैसी हड़बड़ी नजर न आ रही थी, बल्कि हर कोई तुलसी और सनातन से अकेले में मिलना चाहता था. उनकी भाव-भंगिमा की तरह पहनावे में भी दिखावटीपन नजर आ रहा था. हँसते-मुस्कराते, नमस्कार कर वे लोग चले आ रहे थे और 'एक जरूरी बात में तुम्हारी मदद चाहता हूँ’ कहकर न जाने कितने छोटे-बड़े कामों की जिम्मेदारी सौंप रहे थे.
तुलसी यह भी ध्यान दे रही थी कि उनके घर आनेवालों में कोई भी खाली हाथ न आ रहा था. आते समय वे पास की दुकान से मिठाई या चाकलेट भी लाकर उनके बेटे को बुलाकर उसे थमा दे रहे थे. वे बच्चे के सिर के बालों को सहला देते और 'यह बड़ा होकर माँ-बाप का नाम रौशन करेेगा’ कहते हुए बहुत उत्साह से पेश आ रहे थे. अपनी बात कहते वक्त तुलसी और सनातन को इतना सम्मान दे रहे थे कि रह-रहकर वह उकता रहा था, पर सही समय पर तुलसी उसे उकताहट से बाहर निकाल लाती.
अतिथि के चरित्र के हिसाब से चेहरा भी बदल रहा था. पहले आसपास के लोग पैदल चलकर, नहीं तो साइकिल में आ रहे थे, धीरे-धीरे वह स्कूटर और मोटर साइकिल में बदला और हफ्ता पूरा होते-होते हर रोज दो-तीन जीप और कार सनातन के घर के सामने आकर ब्रेक मारने लगीं.
सनातन ने पूछा तो जाना, उनमें कोई इंजीनियर, कोई डॉक्टर, कोई कृषि अफसर तो कोई ठेकेदार होता. उनमें से कई तो सनातन से इस ढंग से बात करते, मानो पुरानी जान-पहचान हो और लौटते समय मिठाई के साथ एक-एक लिफाफा भी उसकी खटिया पर भूल जाने की तरह छोड़ जाते.
पहला लिफाफा कसकर पकड़े सनातन आँगन में दौड़ा था, पर चील की तरह उसके हाथ से लिफाफा झपटते समय सनातन की आवाज से पीछे घूमकर देखते उस सज्जन की आँखें तुलसी की आँखों से जा टकराई थीं. दोनों एक साथ मुस्करा दिए और भद्र इंजीनियर ने उत्साह भरी भंगिमा से 'जब भी कुछ दरकार हो, मुझे खबर दीजिएगा मैडम!’ कहा और चले गए.
'मैडम!’ चौंक पड़ा था सनातन और तुलसी के हाथों से लिफाफा छीन उसके अन्दर क्या है, देखना चाहा था. शून्य से ताश की दो पत्तियाँ प्रकट करने की तरह तुलसी ने दिखाया—एक हजार वाले दो नोट! सनातन दो कदम पीछे हट गया था. हजार वाले नोट इससे पहले उसने न तो देखे, न ही छुए थे. उसके घर की पुरानी और परिचित खाट, चौकी, कपड़े-लत्ते, बासन-कुशन—सब कुछ नए दिखे. एक अबोध की तरह वह तुलसी का मुँह देखता रहा. उसके यों देखने का मतलब जैसे वह समझ गई हो, तुलसी बोली, 'हमने तो किसी से माँगा नहीं. इतना परेशान क्यों हो रहे हो? सोच लो कि लॉटरी लगी है.’ कहकर वह नोट लेकर घर के अंदर चली गई.
सनातन सन्तप्त हो उठा. अपने सन्तप्त भाव का कारण वह तुलसी को कह भी न पा रहा था. दूसरे यदि तुलसी से फायदा उठा रहे हैं तो उसे क्यों सीधे-सीधे फायदा नहीं हो सकता? यह था उसके सन्तप्त होने का कारण, पर जब भी वह राजधानी जाने की बात करता, तुलसी नकार देती थी. कहती, 'समय आने पर वह खुद कहेगी.’ तुलसी की लोकप्रियता दिनोंदिन बढ़ रही थी.
अब कोई उसका परिहास भी नहीं करता था, बल्कि आदर और मर्यादासहित रहते. किसी का सरपंच, चेयरमैन या एम.एल.ए. से परिचय होता है, पर यहाँ तो सीधे मंत्री से परिचय! यह केवल गहरे मैत्री-संबंधों के चलते ही सम्भव है. भाग्यशाली व्यक्ति की किस्मत में ही ऐसा राजयोग होता है. सनातन से कई लोग ईर्ष्या करते थे, पर वे लोग डरते भी बहुत थे. इसे सनातन भी अनुभव करता था.
दुकान पर पहुँचते ही दुकानदार गोविन्द साहू सबको छोड़कर पहले सनातन को पूछता और चाय-पानी पिलाकर सामान तौल देता. सनातन के हाथ से पैसा लेते समय वह खेद व्यक्त करता, मानो सचमुच सनातन उस पर दया कर रहा है! चौकी का सब-इंस्पेक्टर बिना कारण नमस्कार करता और चौकी पर बुलाकर 'छेना-मुडुकि’ और समोसा खिलाया करता. गाँव के स्कूल के हेडमास्टर भी सनातन को देखते ही पढ़ाई बन्द कर देश के भविष्य को लेकर चर्चा शुरू कर देते और अपना विचार व्यक्त करते हुए कहते, 'सनातन
जैसे योग्य व्यक्ति के समाज में रहते भी अयोग्य व्यक्तियों के हाथों में शासन होने के चलते ही आज देश की यह दशा हुई है.’ गाँव के सरपंच दिन में दो मर्तबे जैसे भी हो, सनातन से मिलकर जाते. साथ ही 'तुलसी से नमस्ते कह दीजिएगा’ कहना भी न भूलते. पास के बाजार का मिठाईवाला, गाँव के युवक संघ का सेक्रेटरी और गाँव में आए ब्लॉक ऑफिस के बाबू लोग सनातन के साथ बातचीत का अवसर मिलते ही स्वयं को कृतकृत्य अुनभव करते.
सनातन अपने भाग्य के बदलाव को लेकर जितना उल्लसित हो रहा था, राजधानी जाने के लिए तुलसी द्वारा मना किए जाने को लेकर उतना ही सन्तप्त हो रहा था. शायद यों ही कुछ समय और बीत जाता, पर एक दिन युवक संघ का सेक्रेटरी भाड़े की कार का इन्तजाम कर सनातन के पास मंत्री को 'चीफ गेस्ट’ बनाकर लाने के वास्ते मदद माँगी. सनातन उसकी उपेक्षा न कर सका.
युवक संघ के सेक्रेटरी ने हालाँकि तुलसी से भी अनुरोध किया था, पर तुलसी ने 'मैं जाऊँ या ये जाएँ, बात एक ही है’ कहते हुए सनातन की ओर देखा. सनातन ने उल्लसित हो उत्तर दिया, ''नहीं-नहीं, दोनों क्यों जाएँगे?’’ अन्त में युवक संघ का सेक्रेटरी राजी हो गया, पर 'फंक्शन में आप अवश्य ही हमारी गेस्ट रहेंगी’ कहकर वह सनातन के साथ चला गया. तुलसी बेटे को स्कूल ले जाने के लिए निकल रही थी, तभी अँधेरा-सा करते हुए काले मेघ घिर आए. ''बादलों का तो कहीं नाम भी न था,’’ कहते तुलसी ने आकाश की ओर निहारा. गहरे काले मेघ घिर रहे थे. इसी के साथ धूल-भरी आँधी और बवंडर भी उठे. देखते-देखते सूखे पत्ते चक्कर काटते हुए आकाश में उड़ने लगे. तुलसी वापस घर के भीतर चली आई. बहुत देर बाद आँधी थमी तो वर्षा शुरू हो गई. वर्षा भी ऐसी, मानो घड़े में पानी डाला जा रहा हो! उस समय उसने सनातन के बारे में सोचा, 'अच्छे से सकुशल लौट आएँ वह.’
मेघाच्छन्न पाटपुर के रास्ते में पानी और कीचड़ भरा है. अर्जुनबाआजी पोखरी में मेढक टर्रा रहे हैं. बेटा सो गया है. तुलसी की आँखों में नींद उतर आई थी, पर सनातन खाली इधर-उधर करवटें बदल रहा है. उसे नींद नहीं आ रही. रात आधी बीत चुकी है. कुछ देर बाद तुलसी ने पूछा, ''क्या हुआ? मंत्री से भेंट नहीं हो सकी?’’ सनातन कुछ कहने की इच्छा नहीं हो, इस अन्दाज में बोला, ''भेंट न होती तो अच्छा होता.’’ ''इसीलिए तो तुम्हें मना कर रही थी.’’ ''तो क्या...?’’ ''अरे, इतनी जोर से क्यों बोलते हो? मंत्री से भेंट के समय युवक संघ का छोकरा भी क्या तुम्हारे साथ था?’’ ''क्यों...?’’ ''जो पूछ रही हूँ, वह बताओ न?’’ तुलसी ने कहा. ''नहीं था.’’ ''बच गए...’’ तुलसी ने राहत की साँस ली. ''क्या बच गए? इतना बड़ा झूठ क्यों बोल रही थीं?’’ ''कौन-सा झूठ...?’’ ''तुम नहीं जानतीं? तुम्हें सब पता है, पर...’’ ''दूसरों को जताने-दिखाने भर के लिए हैं सारी बातें. मेरी ओर से कुछ भी न था. मैं और करती भी तो क्या?’’ सनातन बिस्तर से उठा. लालटेन को तेज कर तुलसी की ओर देखा. वहाँ न तो कोई चिन्ता थी, न ही कोई उद्वेग. वह कतई विचलित न थी. वह फिर सोने की चेष्टा करने लगा. तुलसी ने पूछा, ''क्या हुआ, बताओ न?’’ ''मंत्री ने पहचाना ही नहीं. कई मर्तबे बताने के बाद बोले—रथ शर्मा ज्योतिषी का घर समझकर उस दिन भूल से हमारे घर पहुँच गए थे. एस.डी.ओ. की गाड़ी पीछे रह जाने के चलते ड्राइवर घर नहीं पहचान पाया.’’ तुलसी हँस पड़ी. चिड़चिड़ाता-सा सनातन पूछ बैठा, ''इसमें हँसने जैसी क्या बात है?’’ तुलसी ने कहा, ''सो जाओ. इतने दिनों बाद मुझे जताने-दिखाने के लिए कुछ मिला है. उसे गड़बड़ाने की तुम्हें कोई जरूरत नहीं.’’ ''तो क्या इतना बड़ा झूठ जीती रहोगी?’’ ''जब मैं कहती फिरती थी कि ये सब सच है, तब तो मेरी बात का कोई विश्वास नहीं कर रहा था. आज अगर तुम कहोगे कि ये सब झूठ है, तो भी कोई विश्वास न करेगा!’’ सनातन ने एक बार फिर तुलसी की ओर देखा. नींद से बोझिल उसका चेहरा उसे रहस्यमय लग रहा था.
'झूठ का पेड़' ओड़िया के प्रसिद्ध कथाकार गौरहरि दास की बहुचर्चित कहानियां हैं.
साहित्य अकादमी के कार्यकारी मंडल के सदस्य रहे गौरहरि दास ओडिशा के समुद्र तटीय जनपद भद्रक के एक गांव में सन् 1960 में पैदा हुए. साहित्य में पी-एच.डी. और पत्रकारिता में एम.ए. कर ओडिशा की प्रतिष्ठित पत्रिका 'कथा' के सम्पादक, दैनिक 'संवाद' के फीचर सम्पादक और 'संवाद मीडिया संस्थान' के प्राचार्य हुए.
ओडिशा में इनके सोलह कहानी-संग्रह, पांच उपन्यास, पांच निबन्ध-संग्रह, तीन यात्रा-वृत्त और पत्रकारीय लेखन के कई संग्रह छपे हैं. अंग्रज़ी में 'लिटिल मंक एंड अदर स्टोरीज़' तथा 'मथुरा का मानचित्र तथा अन्य कहानियां और 'दूर आकाश का पंछी' प्रकाशित हैं.
प्रकाशक -राधाकृष्णा प्रकाशन ,अंसारी रोड ,दरियागंज ,नई दिल्ली
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