उनके ट्वीट के साथ बीजेपी के राजस्थान अलवर के सांसद योगी बालकनाथ के ट्वीट का स्क्रीनशॉट भी लगा हुआ था. उन्होंने भी बढ़चढ़ कर देवनिंदा कानून बनाने की मांग कर डाली है. लोगों ने अपनी ट्वीट में पीएम मोदी को भी टैग किया. देश जहां ईशनिंदा कानून हैं आइए नजर डालते हैं उन देशों पर जहां ईश निंदा पर सख्त कानून हैं.
पाकिस्तान हमारा पड़ोसी देश, धर्म के आधार पर ही बना है. इसलिए वहां पर ईशनिंदा को लेकर सख्त कानून हैं. ब्रिटिश राज के दौरान बनाया गया ये आम क़ानून था. इसके तहत अगर कोई व्यक्ति जानबूझकर इबादत करने की किसी वस्तु या जगह को नुकसान पहुंचाता है या फिर धार्मिक सभा में खलल डालता है तो उसे दंड दिया जाएगा. अगर कोई किसी की धार्मिक भावनाओं का अपमान बोलकर या लिखकर या किसी भी तरह से करता है तो वो भी गैरक़ानूनी माना होगा. इस क़ानून के तहत पहले एक से 10 साल तक की सज़ा दी सकती थी, जुर्माना भी लगाया जा सकता था. साल 1980 की शुरुआत में पाकिस्तान की दंड संहिता में धार्मिक मामलों से संबंधित अपराधों में कई धाराएं जोड़ दी गईं. इन धाराओं को दो भागों में बांटा गया- जिसमें पहला अहमदी विरोधी क़ानून और दूसरा ईशनिंदा क़ानून शामिल किया गया. 1982 में एक और धारा में कहा गया कि अगर कोई व्यक्ति कुरान को अपवित्र करता है तो उसे उम्रकैद की सज़ा दी जाएगी. साल 1986 में अलग धारा जोड़ी गई और पैगंबर मोहम्मद की ईशनिंदा के लिए दंडित करने का प्रावधान किया गया. इसमें मौत या उम्रकैद की सज़ा की सिफारिश की गई.
सजा - 10 साल की सजा से लेकर मृत्युदंड तक

पाकिस्तान में ईशनिंदा के कानून काफी सख्त हैं. फ़्रांस में जब इस्लाम धर्म को मानने वालों की धार्मिक भावनाओं पर एक टीचर ने ठेस पहुंचाई तो एक इस्लामिक कट्टरपंथी ने उसकी हत्या कर दी. हत्या का विरोध तो दूर पाकिस्तान में लोगों ने फ्रांस के राजदूत को ही बाहर भेजने की मांग कर डाली थी.
ईरान इस्लामिक क्रांति से पहले ईरान भी बाकी दुनिया की तरह एक तरक्की पसंद देश था. लेकिन इस्लामिक क्रांति के बाद यहां भी धर्म आधारित कानून चलन में आए. ईरान की इस्लामिक क्रांति (इन्क़लाब-ए-इस्लामी) सन् 1979 में हुई. इसके बाद ईरान को एक इस्लामिक गणराज्य घोषित कर दिया गया. इसके कारण पहलवी वंश का अंत हो गया. आयतुल्लाह ख़ोमैनी ईरान के प्रमुख बने. ईरान का नया शासन एक धर्मतन्त्र है, जहां सर्वोच्च नेता धार्मिक इमाम (आयतुल्लाह) होता है. लेकिन शासन एक चुना हुआ राष्ट्रपति ही चलाता है. 2012 में ईरान में नए सिरे से लाई गई दंड संहिता में ईशनिंदा के लिए नई धारा जोड़ी गई. इसके तहत धर्म को न मानने वाले और धर्म का अपमान करने वाले लोगों के लिए मौत की सज़ा तय की गई है.
नई संहिता की धारा 260 के तहत कोई भी व्यक्ति अगर पैगंबर-ए-इस्लाम या किसी और पैगंबर की निंदा करता है तो उसे मौत की सज़ा दी जाएगी.
सजा - मृत्युदंड
मिस्र मिस्र में 2014 में बड़ा आंदोलन हुआ. इसे अरब स्प्रिंग कहा जाता है. इसमें बड़े स्तर पर युवाओं ने सरकार विरोधी आंदोलन किए. अरब जगत में हुई इस क्रांति ने कई इस्लामिक देशों को अपनी चपेट में लिया. सोशल मीडिया ने इस आंदोलन ने बड़ा रोल निभाया. परिणाम यह हुआ कि मिस्र के संविधान में 2014 में हुए अरब स्प्रिंग (सरकार विरोधी प्रदर्शनों) के बाद संशोधन किया गया. इसके बाद से इस्लाम को मिस्र का राष्ट्रीय धर्म का दर्जा दिया गया और अन्य धर्मों को अवैध माना गया. मिस्र की दंड संहिता की धारा 98-एफ़ के तहत ईशनिंदा पर प्रतिबंध है. इस क़ानून का उल्लंघन करने वालों को कम से कम 6 महीनों और अधिकतम 5 साल तक की सज़ा हो सकती है.
सजा - 6 महीने से 5 साल तक की सजा

अरब क्रांति, जैस्मीन क्रांति या ट्विटर क्रांति. ट्यूनीशिया से शुरू हुई और पूरे अरब वर्ल्ड में फैल गई. (साभार: एपी)
सऊदी अरब सऊदी अरब में इस्लामी क़ानून शरिया लागू है. इस शरिया क़ानून के तहत ईशनिंदा करने वाले लोग मुर्तद यानी धर्म को ना मानने वाले घोषित कर दिए जाते हैं. इसकी सज़ा मौत है. 2014 में सऊदी अरब में दहशतगर्दी से निबटने के लिए नया क़ानून बनाया गया, जिसमें स्पष्ट तौर पर कहा गया है -
''नास्तिकता का किसी भी रूप में प्रचार करना और इस्लाम के बुनियादी सिद्धांत जिन पर ये देश स्थापित है, उनके बारे में सवाल उठाना दहशतगर्दी में आता है.''इसी तरह के सख्त कानून कतर, सूडान और तुर्की जैसे मुस्लिम बहुल देशों में भी हैं. वो देश जहां किसी भी धर्म की निंदा पर सख्त कानून हैं दुनिया में ऐसे कई देश हैं, जहां किसी भी धर्म की निंदा को लेकर सख्त कानून बनाए गए हैं. इसमें इंडोनेशिया और मलेशिया खास हैं. इसका कारण यह है कि ये देश भले ही मुस्लिम बहुल जनसंख्या वाले हैं लेकिन यहां पर दूसरे धर्मों की निंदा करना भी ईशनिंदा की श्रेणी में आता है.
इंडोनेशिया दुनिया की सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी वाले देश इंडोनेशिया में सरकारी नज़रिए के मुताबिक सिर्फ़ एक ख़ुदा पर यक़ीन किया जा सकता है. 1965 में तत्कालीन राष्ट्रपति सुकर्णो ने देश के संविधान में इशनिंदा के क़ानून को जोड़ने के लिए धारा ए-156 के मसौदे पर हस्ताक्षर किए थे, लेकिन ये लागू हुआ राष्ट्रपति सुहार्तो के शासनकाल में 1969 में. देश में क़ानूनी तौर पर अभिव्यक्ति की आज़ादी है, लेकिन धर्मों पर टिप्पणी की सख़्त मनाही है. इसके अलावा नास्तिकता और इसके प्रचार पर भी पूरी तरह पाबंदी है. यहां सिर्फ इस्लाम ही नहीं ईसाइयत, हिंदू धर्म, बुद्ध मत और कन्फ्यूसिज़्म से अलग होना, या इन धर्मों का अपमान करना, सभी को ईशनिंदा माना गया है.
सजा - 5 साल
मलेशिया पाकिस्तान की तरह यहां के ईशनिंदा कानून के पीछे ब्रिटिश राज है. ब्रिटिश शासन में जैसे कानून पाकिस्तान में बनाए, वैसे ही मलेशिया के लिए भी बनाए. हालांकि मलेशिया कट्टर इस्लामिक देश नहीं है. यहां पर बाकी धर्म को लेकर भी काफी खुलापन है. लेकिन धर्म की निंदा पर सख्त कानून हैं. मलेशियाई दंड संहिता की धारा 295, 298 और 298-ए ईशनिंदा से जुड़ी हैं. इनके तहत किसी (इस्लाम या कोई और) भी धर्म के धर्मस्थल का अपमान करना, धर्म के आधार पर समाज में फूट पैदा करना या लोगों को उत्तेजित करना, जानबूझकर किसी भी व्यक्ति की धार्मिक भावनाओं को चोट पहुंचाना अपराध है.
सजा - 3 साल की सजा या जुर्माना

मलेशिया में सिर्फ इस्लाम ही नहीं किसी भी धर्म वालों को आहत करने पर सख्त सजा का प्रावधान है. (फोटो-Khairel Anuar Che Ani)
क्या भारत में ईशनिंदा जैसा कोई कानून है? हमारे यहां ईशनिंदा तो नहीं लेकिन धार्मिक भावनाओं को आहत करने पर कानून में सजा का प्रावधान है. इसकी जड़ें भी ब्रिटिश साम्राज्य से आई हैं. ब्रिटिश राज में लगभग हर उस देश में ईशनिंदा का कानून था, जहां पर उनका राज था. इनमें पाकिस्तान और मलेशिया जैसे देश शामिल हैं. इंडियन पीनल कोड (IPC) की 295ए में धर्म की निंदा करने या भावनाएं आहत करने से जुड़े प्रावधान हैं. इस कानून को ही पाकिस्तान और मलेशिया में ज्यादा सख्त बना दिया गया है, और बेहद सख्ती से लागू किया जाता है. भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 295A के अंतर्गत वह कृत्य अपराध माने जाते हैं, जहां कोई व्यक्ति भारत के नागरिकों के किसी वर्ग की धार्मिक भावनाओं को आहत करने की जानबूझकर कोशिश करता है, बुरे आशय से उस वर्ग के धर्म या धार्मिक विश्वासों का अपमान करता है या ऐसा करने की कोशिश करता है.
भारत के कानून और कट्टर ईशनिंदा कानूनों में फर्क इतना है कि भारत का कानून किसी भी धार्मिक भावनाओं को आहत करने के पीछे की मंशा की भी जांच करता है. अगर कोर्ट में 'जानबूझकर' और 'बुरे आशय' की बात सिद्ध नहीं हुई तो इस धारा में केस साबित नहीं किया जा सकता.
सजा - 3 साल तक या जुर्माना
दुनिया भर में अमेरिका, चीन, कनाडा और कुछ यूरोपीय और अफ्रीकी देशों को छोड़कर बाकी जगह कमोबेश धार्मिक भावनाओं को लेकर कानून हैं. बस फर्क सिर्फ इतना है कि उन्हें लागू करने और सजा देने के तरीके क्या हैं. फिलहाल सख्ती के हिसाब से पाकिस्तान और सऊदी अरब के ईशनिंदा कानून सबसे सख्त हैं.






















