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ऐड में सिर्फ 'दहेज़' नहीं, ये ब्लंडर भी, अक्षय और नितिन गडकरी कैसे चूक गए?

गाड़ी में छह एयरबैग की वकालत करने वाला सरकारी ऐड आया है. इसकी काफी आलोचना हो रही है.

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ऐड का स्क्रीनशॉट. (फोटो: सोशल मीडिया)

अक्षय कुमार और नितिन गडकरी (Akshay Kumar-Nitin Gadkari) आलोचना के घेरे में है. वजह है, छह एयरबैग (Six Airbag) की वकालत करता एक ऐड. जिसे नितिन गडकरी ने ट्वीट किया. ट्वीट में लिखा,

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"6 एयरबैग वाले गाड़ी से सफर कर जिंदगी को सुरक्षित बनाएं." 

इधर सोशल मीडिया पर ये विज्ञापन लोगों को दहेज़ को बढ़ावा (Promoting Dowry) देता हुआ दिखा.  

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क्या है वीडियो में?

आज़ादी के अमृत महोत्सव वाले लोगो के साथ वीडियो शुरू होता है. एक बेटी विदा हो रही है. घर वाले रो रहे हैं. अक्षय कुमार पिता के पास जाकर कहते हैं 

"घर की गुड़िया, पापा की परी जा रही है, ऐसी गाड़ी में बेटी को विदा करोगे तो रोना तो आएगा न!" 

बदले में लड़की के पिता, गाड़ी के अनेकानेक फीचर गिना देते हैं. अक्षय का सवाल आता है, "पर एयरबैग तो दो हैं न, छह क्यों नहीं." 

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आगे एक्सीडेंट होने पर मात्र आगे के एयरबैग खुलने का ख़तरा बता, समझाया जाता है कि पीछे म्यूजिक सुनते-सुनते बेटी और जमाई दोनों के टाटा बाय-बाय होने का डर दिखाया जाता है. तत्काल गाड़ी बदली जाती है और अक्षय कुमारीय चुहल के साथ कहा जाता है, "अब क्यों रो रहे हो, अब तो सुरक्षित है." 

सारा बवाल गाड़ी में बेटी को विदा करोगे वाली बात पर है. सम्मुख दिखता है कि बेहतरीन फीचर्स से लैस गाड़ी में पिता, बेटी को विदा करता है. 'गाड़ी में बेटी विदा करना' भाव है या क्रिया है, इस पर विद्वान लोग बहस कर सकते हैं लेकिन आम भाषा में दहेज़ की गाड़ी को जैसे 'कार में विदा करना' कहते हैं. लोगों ने वही बात पकड़ी. ये दहेज़ से जुड़ी, उसी शब्दावली का हिस्सा है. जिसमें कहा जाता है, 'हमें दहेज़ नहीं चाहिए लेकिन आप अपनी बेटी को जो देना चाहें' या 'हम कुछ मांग नहीं रहे, लेकिन आपका जैसा संकल्प हो.'

सोशल मीडिया पर लानत-मलानतों का दौर चला सो चला. विरोधी पार्टियों ने भी सरकार को घेरा.

पूछा गया, ये ऐड किसने पास कर दिया.

लेकिन वीडियो में एक नहीं कई समस्याएं हैं.

1. क्या जान-बूझकर दहेज़ देना दिखाया गया?
एक आम समझ की बात और चलन है कि जिस गाड़ी में दुल्हन विदा होती है, वो अमूमन लड़के वाले सजवा कर लाते हैं. खर्चीली शादियों में अक्सर ये अन्य कारों से महंगी, बड़ी, बेहतर ब्रांड की कार होती है, जो कई बार बुकिंग के जरिए भी लाई जाती है और इसे लड़के वाले ही लाते हैं. तो यहां लड़की के पिता से कार की डीटेल्स क्यों पूछी जा रही हैं? यदि आपकी मंशा 'लड़की के पिता ने कार दी' दिखाने की नहीं थी, तो उससे सवाल क्यों?

लिखित नियम नहीं है लेकिन अलिखित और बेहूदा चलन ये है कि अगर विदाई लड़की के घर वालों की दी कार में हो रही है तो उसे जिस भी तरीके से घुमा कर कहें, दहेज़ ही कहा जाएगा.

2. ये स्क्रिप्ट चेक किसने की?

देश के केन्द्रीय मंत्री एक वीडियो ट्वीट करते हैं. आज़ादी के अमृत महोत्सव की सजावट के साथ. देश के सरकारी विज्ञापनों के प्रमुख चेहरे अक्षय कुमार ऐड में एक्टिंग कर रहे हैं. फिर भी ऐसा वीडियो, जिसकी मंशा पर सवाल उठ जाएं. सबसे ज़्यादा आलोचना भले ये दोनों झेल रहे हैं, लेकिन निश्चित रूप से ये दोनों ऐसे लोग हैं, जिनकी सबसे ज़्यादा जिम्मेदारी और वीडियो प्रोडक्शन में सबसे कम हस्तक्षेप रहा हो. बाकायदा एक एजेंसी या विभाग ने स्क्रिप्ट, लिखी, देखी, चेक की और अधिकारियों से अप्रूवल लिया होगा. उसके बाद भी इतनी लचर स्क्रिप्ट. समस्या ये नहीं है कि वीडियो में दहेज़ को बढ़ावा दिया जा रहा है या नहीं, लेकिन ऐसा होता दिख रहा है और ये कई सरकारी लेवल और सरकारी लोगों से फ़िल्टर होने के बाद दिख रहा है.

3. बेटी गुड़िया नहीं होती.

साल 2022 चल रहा है. पिछली सीटों में सीट बेल्ट लगाना ज़रूरी बनता जा रहा है, गाड़ियों में छह एयरबैग आम करने की कोशिश की जा रही है. विज्ञान की तरक्की के इस दौर में अक्षय कुमार एक सरकारी ऐड में बेटी के पिता से बात करते हुए कहते हैं. 'घर की गुड़िया, पापा की परी जा रही है.' जो साल चल रहा है, अब तक ये कहा जाना भी क्लीशे हो चुका है कि बेटी गुड़िया नहीं है. खेल की चीज नहीं है. या गुड़िया शब्द के साथ जितनी भी पैट्रिआर्की घिरी चली आती है, उससे कहीं आगे निकल जाने का समय भी निकल गया है. फिर भी अक्षय कुमार कह रहे हैं. सरकारी विज्ञापन चल रहा है. छह एयरबैग के साथ आप एक्सीडेंट्स में बच सकते हैं लेकिन सतह के नीचे बहती दहेज़लोलुपता और सरकारी ऐड में लीचड़ स्क्रिप्ट्स से नहीं.

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