अल्पसंख्यकों के लिये इंडिया एक मॉडल देश है. अपने आस-पास देखिये और आप जान जायेंगे. पर कहीं-कहीं दिक्कत भी है. हालांकि संविधान ने सबको बराबर अधिकार दिये हैं, पर कभी-कभी हम लोग सेकेंड क्लास सिटीजन की तरह महसूस करते हैं. हमारे असली मुद्दे अक्सर दब जाते हैं. हम लोग दंगे नहीं होने देंगे. इसके लिये हम लोग तैयार हैं. और हां, इंडियन मुस्लिमों को किसी से देशभक्ति के सर्टिफिकेट की जरूरत नहीं है. मालूम होना चाहिये कि इन्हीं लोगों की वजह से अतिवादी संगठन इंडिया में अपनी जगह नहीं बना पाये हैं.हालांकि बाद में उन्होंने ये भी कह दिया कि मैंने अल्पसंख्यकों की सामाजिक स्थिति के बारे में नहीं बोला था. पर अल्पसंख्यकों के बारे में अपनी राजनीति को लेकर जूझ रही बीजेपी के लिये संकट पैदा कर गया. अल्पसंख्यकों की स्थिति समझने के लिये बनी सच्चर कमिटी, रंगनाथ मिश्रा कमिटी, कुंडू कमिटी सबने टाइम टू टाइम ये बताया है कि भारत की सभी सरकारों ने अल्पसंख्यकों के लिये बहुत ज्यादा कुछ नहीं किया है. अभी भी अल्पसंख्यकों की स्थिति बहुत खराब है. इनमें भी मुसलमानों की स्थिति सबसे ज्यादा खराब है. नरेंद्र मोदी की सरकार को दो साल से थोड़ा ही अधिक समय हुआ है पर लव जिहाद, गो रक्षा , घर वापसी, सब मिलाकर मुसलमानों के मुद्दे पर ये सरकार घिरी हुई है. हालांकि नरेंद्र मोदी हमेशा कहते हैं कि मैं मुसलमानों के एक हाथ में कुरान और दूसरे में लैपटॉप देखना चाहता हूं. पर अगर मुख्तार अब्बास नकवी की बात को देखें तो इसमें कितनी सच्चाई है कि कभी-कभी माइनॉरिटीज सेकेंड क्लास सिटीजन की तरह महसूस करते हैं? महसूस करना भावनात्मक चीज है जो अक्सर दूसरों के व्यवहार से प्रभावित होती है. इस चीज को हम अपने आस-पास घटने वाली स्थितियों के माध्यम से समझ सकते हैं:
1.
बस में भीड़ है. सब लोग धकमपेल मचाकर किसी तरह खड़े हुये हैं. सामान कहीं का कहीं पड़ा हुआ है. उसी में नजर आता है कि फर्श पर एक बैग पड़ा हुआ है. जो जरूरत से ज्यादा जगह घेरे हुये है. एक आवाज आती है कि किसका है ये बैग? कोई जवाब नहीं आता. लोग थोड़ा पैनिक कर जाते हैं. एक और आवाज उठती है. फिर भी कोई जवाब नहीं आता. तभी बस रुकती है और एक दाढ़ी टोपी वाला आदमी गेट की तरफ भाग रहा होता है. उस आदमी को कुछ खयाल आता है और वो पीछे की तरफ मुड़ता है. पाता है कि सारे यात्री उसी की ओर देख रहे हैं. उस आदमी की आंखों में जो भय दौड़ता है! वो आदमी ताजिंदगी कभी भी उन नजरों को नहीं भूल सकता.2.
इंडिया के सर्जिकल स्ट्राइक की बात हो रही है. बहुत लोग बहुत खुश हैं. पर कुछ लोग शंका जता रहे हैं कि ये सर्जिकल स्ट्राइक हुआ ही नहीं है. वीडियो दिखाओ तब मानेंगे. अरविंद केजरीवाल, संजय निरूपम इनमें आगे हैं. पर क्या मीम अफजल ये सवाल उठा सकते हैं? या कोई भी मुसलमान क्या ये प्रश्न पूछ सकता है?3.
चाय की दुकान पर देश के बारे में बात हो रही है. गरमा-गरम बहस. राष्ट्रवाद, देशभक्ति, इंकलाब. सारे लोग चीख-चीख कर बोल रहे हैं. देश के लिये खून देने की बात हो रही है. पर कुछ लोग नहीं बोलना चाहते हैं. वहां से जाना चाहते हैं. क्या एक मुसलमान वहां से जा सकता है? बिना बोले. अगर बोलना चाहे, तो क्या किसी हिंदू की देशभक्ति पर शक कर सकता है?4.
ऑफिस में लंच टाइम है. सारे लोग एक जगह बैठे हैं. भारत के स्वच्छता अभियान की बात हो रही है. सुरेश, महेश, पीयूष, अरुण सभी अपनी बहादुरी के किस्से सुना रहे हैं. कि कैसे अपने मुहल्ले में गंदगी फैलाने वालों को नचा के छोड़ा. जब अनवर भी खुश होकर कुछ सुनाने की कोशिश करता है, तो सारे हंसने लगते हैं.5.
फिर जब भी इतिहास की बात होती है तो बाबर, औरंगजेब, टीपू सुल्तान और जयचंद की बात आने पर सफाई मुसलमान को ही क्यों देनी पड़ती है? उस वक्त वो चुप नहीं रह सकता. उसकी चुप्पी उसको महंगी पड़ सकती है.6.
जब पाकिस्तान की बात होती है तो हर मुसलमान संदेह के घेरे में अपने आप आ जाता है. अगर क्रिकेट की बात हो तो हर मुसलमान से उम्मीद की जाती है कि वो इंडिया का ही सपोर्ट करे. इंडिया के ही खिलाड़ियों की बड़ाई करे. शाहिद आफरीदी चाहे जितना प्रिय हो. हालांकि कोई हिंदू पाक खिलाड़ियों की बड़ाई तो कर ही सकता है. कभी-कभी पाक टीम की भी कर सकता है. गर मूड ठीक हो तो.ये चीज ज्यादातर मुसलमान समाज के ही साथ होती है. मन में बनी धारणाओं के आधार पर. कभी-कभी अनजाने में, कभी जान-बूझकर. तो मुख्तार अब्बास नकवी का ये कहना सही ही है. हालांकि इसके लिये कोई एक इंसान या पार्टी जिम्मेदार नहीं है.













