"इस धरती पर आज तक सबसे ज़्यादा नाइंसाफियां और खूंरेज़ियां मज़हब के नाम पर ही हुई हैं."आपके पास बहुतेरे तर्क होंगे, दृष्टांत होंगे इस कथन से असहमत होने के. लेकिन इससे इंकार करना हकीकत से मुंह मोड़ने जैसा होगा. धर्म के दामन पर इतना ख़ून लग चुका है कि उसका हरा, भगवा, सफ़ेद या जो कोई भी रंग हो, लहू की लाली में दब चुका है. माना कि मानव सभ्यता की तमाम क़त्लोगारत सिर्फ धर्म के मत्थे नहीं मढ़ सकते, कुछ एहसान साम्राज्यवाद की लालसा का भी रहा है. लेकिन धर्म का शेयर निर्विवाद रूप से बड़ा रहा है, ये परम सत्य है. बदलते समय में जब लोकतांत्रिक व्यवस्थाएं वजूद में आईं, तो धर्म ने न्यायपालिका में ही ऐसे रास्ते ढूंढ लिए जो धर्म के नाम पर हत्या को जायज़ ठहराए. ऐसा ही एक विधिसम्मत रास्ता है कुख्यात 'ब्लास्फेमी लॉ'. ईशनिंदा क़ानून. जिसकी सबसे ज़्यादा प्रैक्टिस पाकिस्तान में है.

तहमीना दुर्रानी कि झकझोर देनेवाली किताब 'ब्लास्फेमी'. तहमीना नवाज़ शरीफ के भाई शाहबाज़ शरीफ की पत्नी है.
पाकिस्तान इस मामले में हर बार एक नई निचाई छूता है
पाकिस्तान की एक अदालत ने जेम्स मसीह नाम के एक ईसाई शख्स को मौत की सज़ा सुनाई है. उसपर आरोप था कि उसने Whatsapp पर अपने दोस्त को ऐसी कविता भेजी थी, जिससे इस्लाम का अपमान होता था. दोस्त को - यासिर बशीर को - दोस्ती से पहले मज़हब याद आ गया. भाई ने पुलिस में कंप्लेंट कर दी. इलाके की जनता भड़क गई. जेम्स की जान की प्यासी हो गई. उसे सरा-ए-आलमगीर का अपना घर छोड़ कर भाग जाना पड़ा. बाद में उसने पुलिस में सरेंडर कर दिया. घटना पिछले साल की है.सालभर मुकदमा चलने के बाद अब कोर्ट ने फैसला सुनाया है. मौत की सज़ा के अलावा तीन लाख रुपए का जुर्माना भी भरना होगा जेम्स मसीह को. उसके लॉयर अंजुम वकील लाहौर हाईकोर्ट में जाने की बात कर तो रहे हैं, लेकिन ये पूरा मामला ही भयानक चिढ़ पैदा करता है.

जिया उल हक, जिसने अपने मार्शल लॉ के दौरान पाकिस्तान पर ये क़ानून थोपा.
पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों पर इस क़ानून की तलवार हमेशा ही लटकी रहती है. दो साल पहले धर्मांध भीड़ ने लाहौर में ईसाइयों के करीब 125 घर जला दिए थे. किसी एक ईसाई शख्स पर अल्लाह की निंदा का आरोप था. 2015 में ही एक ईसाई दंपत्ति को भीड़ ने ज़िंदा जला डाला था. उनपर कुरआन की बेहुरमती (अपमान) का आरोप था. ये तो हुई जनता की मूर्खता. अदालतों ने, स्टेट ने भी कोई कम जहालत नहीं फैलाई है.
जनरल जिया-उल-हक़ ने 1986 में लागू किया था ये कानून. एक आंकड़े के अनुसार तब से अब तक तकरीबन 5000 लोगों पर ब्लास्फेमी का चार्ज लग चुका है. कईयों को सज़ा हुई, कुछेक को बरी कर दिया गया, तो कईयों को कोर्ट ट्रायल से पहले ही लोगों ने मार डाला.
लेकिन अल्पसंख्यकों से ज़्यादा मुसलमानों पर भारी गुज़रा है ये लॉ
एक तथ्य ये भी है कि इस डरावने क़ानून का शिकार सबसे ज़्यादा मुसलमान ही हुए हैं, अल्पसंख्यक नहीं. आम आदमी से लेकर मिनिस्टर तक.# हाल ही में मरदान यूनिवर्सिटी के छात्र मशाल ख़ान को लोगों ने पीट-पीट कर बेरहमी से दिया. उसपर आरोप था कि वो सोशल मीडिया पर ईशनिंदा वाला कॉन्टेंट पोस्ट करता था.
# शाहबाज़ भट्टी पाकिस्तान की सरकार में अल्पसंख्यक मंत्री थे. उन्हें 2011 में राजधानी में गोली मार दी गई. वो इस कानून की मुखालफत करते थे.
# ऐसा ही अंजाम पाकिस्तानी पंजाब के गवर्नर रह चुके सलमान तासीर का हुआ. वो ब्लास्फेमी लॉ के धुर विरोधी थे. उसे ख़त्म करना चाहते थे. उन्हें उनके ही बॉडीगार्ड ने मार डाला.

मशाल ख़ान, ईश्वर ने नहीं भीड़ ने मारा.
ये भी एक विडंबना ही है कि जो आदमी मनुष्यता की बातें करता था, वो तो कुत्ते की मौत मारा गया लेकिन जो उसका क़ातिल था, वो हीरो बन गया. सलमान तासीर ले हत्यारे मुमताज़ कादरी को फांसी होने के बाद लाहौर में दंगे छिड़ गए. उसके जनाज़े में 1 लाख से ज़्यादा लोग शरीक़ हुए. आज मुमताज़ कादरी की कब्र को पवित्र मज़ार सा बना दिया है लोगों ने. सलमान तासीर भुलाए गए. कट्टर धर्मांध समाज का सिस्टम इसी तरह काम करता है.

सलमान तासीर, लॉजिकल बात पर जान गंवानी पड़ी.
ईश्वर को कुछ कहना इतना अखरता क्यों है?
यूं ही एक याद ज़हन के किसी कोने से बरामद होती है. बचपन में जब ईश्वर के अस्तित्व पर यकीन पुख्ता था ,तबका किस्सा है. एक दिन किसी गलती पर मां ने कुटावा चढ़ा दिया. करीब ही एक मशहूर मज़ार थी. बाबा कमर अली दरवेश साहब की. बेहद मशहूर देवस्थान. मैं वहां पहुंचा और जी भर के अल्लाह को कोसा. एक 7-8 साल का बच्चा जितने अपशब्द जानता हो सकता है, वो सब बक डाले. मेरी निगाह में पालकों का बच्चों से ज़्यादा समर्थ होना नाइंसाफी थी और इसके लिए ज़िम्मेदार ईश्वर था. इससे और कुछ भले ही न हुआ हो उस बच्चे का गुबार निकल गया.
कमर अली दरवेश की वही दरगाह जहां इस आर्टिकल का लेखक अपने बचपन में अक्सर जाया करता था.
ईशनिंदा ऐसा ही एक सेफ्टी वॉल्व होना चाहिए. जो भक्त के अपने आराध्य के प्रति समय-समय पर उपजे गुस्से को रिलीज़ होने की राह दे सके. जिनकी आस्था होती है, उनकी उम्मीदें भी होती है. और उम्मीदें के साथ हताशा आनी ही आनी है. हताशा के किसी कमज़ोर लम्हे में कोई भी ईश्वर के खिलाफ़ बोल सकता है. इतनी सी बात पर फांसी चढ़ानेवाला समाज जहालत के एवरेस्ट पर ही बैठा मानिए.
निंदा न बर्दाश्त करने वाला ईश्वर सहिष्णु कैसे हो सकता है?
ईशनिंदा व्यक्तिगत अधिकार होना चाहिए. भई उसका ईश्वर है, जो चाहे कहे. ईश्वर के सर्वशक्तिमान होने का दावा ऐसे वक़्त न जाने कहां हवा हो जाता है. समर्थ, शक्तिशाली ईश्वर एक नश्वर प्राणी की निंदा से घिस थोड़े ही जाएगा? इत्ती बड़ी कायनात में एक शख्स ने क्या बोला इससे क्या फर्क पड़ना है उसे? ऐसी किसी निंदा से निपटने के लिए गुर्गों की मदद पर क्यों निर्भर होगा ईश्वर? वो कोई माफिया डॉन थोड़े ही है? लेकिन अंधी आस्था अगर तर्कों को स्थान देने लगी, तो दुनिया जन्नत न बन जाए! 'दयालु' ईश्वर के परम उपासक क्रूरता की हदें पार करते रहते हैं. अक्सर कानून के दायरे में रह कर. विडंबना कई-कई बार मर जाती होगी.
सलमान तासीर के हत्यारे मुमताज कादरी के जनाज़े में उमड़ी भीड़. (Image: Dawn)
कई बार तो ये कानून पर्सनल खुन्नस निकालने का टूल भी बन जाता है. अपने दुश्मन की किसी भी बात को, काम को तोड़-मरोड़कर ईशनिंदा के खांचे में फिट कर दो. बाकी काम हुकूमत कर देगी. ब्लास्फेमी लॉ पाकिस्तान की जम्हूरियत पर लगा सबसे बदनुमा दाग है. इससे वो जितना जल्दी पीछा छुड़ा ले बेहतर.
वैसे अपने मुल्क में ईश्वर की निंदा की कदरन छूट हासिल है. हालांकि दृश्य इधर भी बदलता नज़र आ रहा है. ईश्वर की बहुतायत होने की वजह से शायद उस मामले में कुछ कन्फ्यूजन हो लेकिन गाय के नाम पर कुछेक तो परलोक पहुंचाए ही जा चुके हैं. व्यक्तिपूजा भी अपने चरम पर है और लाशों पर ठहाके लगाने की बेशर्मी भी आम जनमानस के लहू में गर्दिश करने लगी है. दुआ कीजिए कि ऐसी हत्याएं जायज़ ठहराने का चलन अपने यहां न शुरू हो जाए.
अंधे भक्तों को ये बेहतरीन नज़्म भी ईशनिंदा ही लगेगी, वैसे है नहीं:
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