डायरेक्टरेट जनरल ऑफ जीएसटी इंटेलिजेंस (DGGI) ने हाल ही में देश के कई क्रिप्टो एक्सचेंजों पर छापा मारा था. फिलहाल इनकी फीस और मार्जिन को कमाई का आधार बनाकर लाइबिलिटी तय की गई है और टैक्स जमा कराने को कहा गया है. जानकारों की मानें तो आम कमोडिटी एक्सचेंजों की तर्ज पर फीस और मार्जिन से टैक्स वसूलने का मतलब है कि सरकार क्रिप्टो एजेंसियों के काम को 'सर्विसेज' मानकर चल रही है, जिस पर 18 पर्सेंट जीएसटी लगता है. लेकिन कुछ क्रिप्टो एजेंसियां इस पर कानूनी सफाई मांग रही हैं. चूंकि किसी भी कानून में क्रिप्टो करेंसी का कहीं जिक्र नहीं है और न ही इसका व्यापार किसी तरह के मौजूदा ट्रेड से मेल खाता है, ऐसे में अब यह मसला जीएसटी काउंसिल या सरकार के शीर्ष स्तरों तक जाता दिख रहा है. क्रिप्टो पर टैक्स का पेच? क्रिप्टो करेंसी की खूबी इसका प्राइवेट वेल्थ होना है. इसे कोई दूसरा न देख सकता और न जब्त कर सकता है. फिलहाल सरकार के लिए यह पता करना भी मुश्किल है कि यह किन-किन हाथों से गुजरी है. इनकम टैक्स कानून के तहत असेसमेंट, जब्ती या रिकवरी तब तक संभव नहीं, जब तक करेंसी मालिक खुद डिक्लेयर न करे कि उसने कितना इनवेस्ट किया है या विभाग उपलब्ध साक्ष्यों से यह साबित न कर दे. ऐसे में शॉर्ट टर्म या लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन भी तय नहीं हो सकता.
जहां तक जीएसटी जैसे अप्रत्यक्ष करों की बात है, अगर क्रिप्टो करेंसी को गुड्स मानकर चलें तो इसका वैल्युएशन संभव नहीं है. अभी ज्यादा से ज्यादा सिर्फ ऑपरेटर्स यानी एक्सचेंजों तक ही पहुंचा जा सकता है. उनकी फीस और मार्जिन को सर्विसेज बताकर 18 पर्सेंट जीएसटी तो लगा दिया गया है, लेकिन यहां भी कई पेच हैं. ट्रांजैक्शन फीस सेंडर्स यानी किसी को करेंसी बेचने वाले की तरफ से चुकाई जाती है. लेकिन रेसिपिएंट का पता नहीं चलने से सप्लाई ऑफ सर्विसेज का निर्धारण सही नहीं हो सकता. सबसे बड़ी समस्या यह है कि अगर कोई रेसिपिएंट या कोई क्रिप्टो एक्सचेंज देश के बाहर है, तो मौजूदा कानूनों के तहत यहां टैक्सेशन और भी मुश्किल हो जाएगा. क्या कहते हैं एक्सपर्ट? जाने-माने जीएसटी कंसल्टेंट और पीएचडी चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (PHDCCI) की इनडायरेक्ट टैक्स कमिटी के चेयरमैन बिमल जैन ने 'दी लल्लनटॉप' को बताया-
"एक डिजिटल करेंसी, जो ब्लॉकचेन इनक्रिप्शन यानी कोडेड तकनीक से संचालित होती है. जहां यही तय नहीं है कि इसे गुड्स मानें या सर्विसेज. ट्रेड वैल्यू और प्लेस ऑफ सप्लाई जैसी मूलभूत सूचनाएं नदारद हैं. यानी कौन, कितना, किससे खरीद रहा है और किसको, कहां बेच रहा है, कुछ भी पता नहीं. ऐसे में टैक्सेबिलिटी अंधेरे में तीर मारना जैसा ही है. आप शेयर ट्रेडिंग करते हैं. सिक्योरिटीज टैक्सेबल भले न हों, लेकिन एक्सचेंज और ब्रोकरेज हाउस के डेटा के जरिए प्रोसेसिंग या ट्रांजैक्शन फीस और टैक्स तो लगता ही है. यह सब होता है, क्योंकि शेयर मार्केट रेग्युलेटेड है. जब तक क्रिप्टो करेंसी का रेग्युलेशन नहीं होगा. उससे वाजिब टैक्स वसूली संभव नहीं है."बिमल जैन ने क्रिप्टो करेंसी के व्यापार की तुलना फर्जी चिटफंड और पिरामिड स्कीमों से की. जहां एक आदमी दूसरे से और दूसरा तीसरे से पैसा वसूलता रहता है, इस भरोसे के साथ कि आगे बहुत रिटर्न मिलेगा. लेकिन एक दिन उसका मुखिया या कंपनी ही भाग जाती है. उन्होंने बताया कि अगर सरकार ने इसे बैन या रेग्युलेट नहीं किया तो सबसे बड़ा खतरा युवा पीढ़ी के फंसने का है. नई जेनरेशन रातोंरात रिटर्न कमाने के चक्कर में क्रिप्टो में निवेश कर रही है. इसकी कोई गारंटी नहीं कि आगे वाला अपनी वित्तीय लाइबिलिटी पूरी करता रहेगा.

जीएसटी की सांकेतिक तस्वीर
बिजनेस मॉडल पर सवाल क्रिप्टो करेंसी का व्यापार एक ऐसे कंप्यूटर नेटवर्क पर आधारित है, जहां हर टर्मिनल अपने आप में सर्वर का काम करता है. इसे पीयर टु पीयर (Peer to peer) प्लैटफॉर्म भी कहते हैं. DGGI ने क्रिप्टो एक्सचेंज WazirX से टैक्स और पेनल्टी के तौर पर 50 करोड़ की वसूली की है. लेकिन जांच के दायरे में आए Unocoin जैसे एक्सचेंजों को अभी टैक्स और पेनल्टी का फाइनल नोटिस नहीं दिया जा सका है.
इन एक्सचेंजों की शिकायत है कि सरकार यह तय नहीं कर पाई है कि उन्हें किस बिजनेस मॉडल के तहत ट्रीट किया जाए. किसी पर ई-कॉमर्स मार्केट प्लेस वाले रूल लगाए जा रहे हैं तो किसी को ब्रोकरेज रेग्युलेशन के तहत चार्ज किया जा रहा है. लेकिन जीएसटी अधिकारियों के हवाले से आई रिपोर्टों में कहा गया है कि खुद इन एक्सचेंजों का बिजनेस मॉडल एक जैसा नहीं है. मसलन, वजीरएक्स जैसे एक्सचेंज पीयर टु पीयर (Peer to peer) डील कराते हैं और इसके एवज में कमीशन चार्ज करते हैं. उन्होंने इसी को अपनी इनकम बताई है. लेकिन यूनोक्वॉइन (Unocoin) और क्वॉइनस्विच कुबेर (Coinswitch Kuber) जैसे एक्सचेंज ब्रोकर या एग्रीगेटर्स के तौर पर काम कर रहे हैं. ये यूजर्स से उनके मुनाफे पर एक तय रकम चार्ज करते हैं.
अधिकारियों के मुताबिक इस मॉडल की जांच और रेग्युलेशन की ज्यादा जरूरत है. चूंकि जीएसटी कारोबार के वैल्यू एडिशन पर लगता है, ऐसे में यह हर उस स्टेप पर लगना चाहिए जहां मुनाफा कमाया गया है. यह तब संभव है, जब करेंसी को एक टैक्सेबल गुड्स या कमोडिटी माना जाए. वह भी तब, जब सरकार इसे मान्यता दे या रेग्युलेट करे.

सांकेतिक तस्वीर
कैसे होता है क्रिप्टो कारोबार? क्रिप्टो करेंसी को आप मोटे तौर पर किसी छोले-भटूरे की दुकान वाला टोकन समझ लीजिए या थोक बाजारों में व्यापारियों और आढ़तियों के बीच चलने वाली हुंडी. यानी एक कागज की पर्ची, जिसका यों तो कोई मोल नहीं, पर लेने और देने वाले की नजर में यह सैकड़ों, हजारों या लाखों की हो सकती है. हुंडी की सबसे बड़ी ताकत यह है कि इसे न तो कोई चोर लूट सकता है, न पुलिस पकड़ सकती है और न कोई अथॉरिटी टैक्स लगा सकती है. हुंडी की कीमत दो लोगों के बीच ही समझी जाती थी. लेकिन क्रिप्टो करेंसी के लेनदार और देनदार बेशुमार होते हैं. जो चीज इसे सबसे ज्यादा अलग बनाती है, वह है इसके चलन की तकनीक.
तकनीकी भाषा में कहें तो यह ब्लॉकचेन आधारित नेटवर्क से प्रसारित होने वाला एक डिजिटल डॉक्युमेंट है, जिस पर हर लेन-देन का सिग्नेचर होता है. हर ट्रांजैक्शन अपने आप में एक ब्लॉक होता है. असल में ब्लॉकचेन एक सॉफ्टवेयर प्रोटोकॉल है. ठीक वैसे ही जैसे हमारे ईमेल के लिए SMTP (Simple Mail Transfer Protocol) होता है. यह चेन बताती है कि कब करेंसी किसके हाथ से निकलकर किसके पास गई. ब्लॉकचेन फाइल किसी एक कंप्यूटर के बजाय पूरे नेटवर्क में रहती है. इस चेन में एक नया ब्लॉक जोड़ना ही, क्रिप्टो माइनिंग कहलाता है.
क्रिप्टो करेंसी खरीदने-बेचने के लिए आपको इस नेटवर्क से जुड़ना होगा. यहीं आपकी मदद करते हैं, क्रिप्टो एक्सचेंज. यहां आप ठीक वैसे ही एक खाता खुलवाते हैं, जैसे शेयरों के लिए डिमैट या ट्रेडिंग अकाउंट. फर्क सिर्फ इतना है कि ये एक्सचेंज सेल्फ रेग्युलेटेड हैं. यानी सरकारी नियम-कानूनों से परे. जैसा कि हम ऊपर बता चुके हैं कि कैसे इन एक्सचेंजों का बिजनेस मॉडल अलग-अलग है. ऐसे में इनकी फीस भी मोटे तौर पर तीन तरह की होती है- एक्सचेंज फीस, नेटवर्क फीस और वॉलेट फीस. फिलहाल टैक्स एजेंसियां इसी फीस को कमाई मानकर इनकी टैक्स लाइबिलिटी तय कर रही हैं.











