1. कैंसर एक छोटे से दाने से शुरू होता है जिसको लोग सीरियसली नहीं लेते. फिर आपको कैसे ये ख़याल आया कि डॉक्टर के पास जाना है?
जी, जैसा आपने कहा, और जैसा कि मैंने अपनी कविता में लिखा भी है कि एक चने या छोले जैसी गांठ से ये शुरू होता है. गायनेकॉलजिस्ट को दिखाया भी, तो उन्होंने कहा, ये तो बस एक गांठ है. 40 की उम्र पार करते ही औरतों के शरीर में 70 गांठे हो जाती हैं. फिर भी मुझे अंदर से अजीब लगता रहता. जब दोबारा दिखाने गई, तो भी गायनेकॉलजिस्ट के ही पास गई थी. भला हो उनकी नर्स का, जिसने कहा आप सीधे ओंकॉलजिस्ट के पास जाइए. अंत में वहीं जाना है. तब मैंने महसूस किया कि हम औरतें, चाहे वो कितनी भी पढ़ी-लिखी हों, ब्रेस्ट या यूट्रस के मामले में सीधे गायनेकॉलजिस्ट के पास ही जाती हैं. बल्कि सही समय में अगर ओंकॉलजिस्ट के पास जाएं तो इलाज जल्दी शुरू हो सकता है.2. आपने मेमोग्राफी पर लिखा है कि स्तन महज मांस के लोथड़े जैसे होते हैं उस मशीन में. उस दर्दनाक एक्सपीरियंस के बारे में बताइए.
मेमोग्राफी होना एक नॉर्मल प्रोसेस है. आपको इस तरह की कोई तकलीफ होगी तो मेमोग्राफी होगी ही. लेकिन वो प्रोसेस बहुत पेनफुल होता है. जैसे चक्की के दो पाट हों, उनके बीच स्तनों को रख दिया जाए. लेकिन इसका होना जरूरी है. दर्द का परिणाम अगर अच्छा हो तो उसके सहने में कोई बुराई नहीं है. लेबर पेन को ही ले लीजिए. जितना ज्यादा होता है उतनी ही जल्दी बच्चा बाहर आता है.3. आपके जैसी सोशल, कॉन्फिडेंट और कामकाजी औरत पर जब 'मरीज' का टैग लग जाता है, तो दिमाग पर कैसा असर पड़ता है?
बहुत सारी क्रियाएं-प्रतिक्रियाएं शामिल रहती हैं. इन्फेक्शन का खतरा रहता है तो बाहर नहीं जाना है. बाहर का कुछ खाना-पीना नहीं है. सिनेमा देखने भी नहीं जा सकते. मैं जो एक पैर बाहर, एक भीतर के साथ जीने वाली औरत, 10 महीने घर में कैसे रहूंगी. ये सोचकर ही डर गई थी. लेकिन फिर उसी में से मैंने रास्ते निकाले. घर है, तो घर को ही अपना वर्कप्लेस बना लिया. काम के चक्कर में मैं कितने दिनों से कुछ पढ़ नहीं पा रही थी. तो जमकर पढ़ाई की. लिखा. इतनी कविताएं लिखीं कि उनका कलेक्शन आ गया छपकर. तो अगर किसी को भी कैंसर जैसी बड़ी बीमारी है जिसमें घर पर रहना पड़े, तो इतना क्रिएटिव काम करो कि मालूम ही न पड़े समय कैसे कट गया.4. इन्हीं क्रिएटिव दिनों का एक बच्चा है आपका रूम थिएटर. उसके बारे में कुछ बताएं.
मैं लिटरेचर और थिएटर, दोनों को हमेशा साथ-साथ चलाती हूं. समझ नहीं आ रहा था कि अपनी इस नई जीवनशैली में थिएटर को कैसे वापस लेकर आऊं. तब रूम थिएटर के बारे में सोचा. और सोचा कि मैं लोगों से मिलने नहीं जा सकती, तो क्या हुआ, वो तो मुझसे मिलने आ सकते हैं. थिएटर आर्टिस्ट्स को पैसे नहीं मिलते. उनके पास रिसोर्सेज नहीं होते. रूम थिएटर में हमने ये जाना कि स्क्रिप्ट, डायरेक्शन और एक्टर अच्छे हों तो कम से कम रिसोर्सेज में भी अच्छा थिएटर किया जा सकता है. ये बेसिक चीजें हैं दाल, रोटी, सब्जी की तरह. ये अच्छे हों तो सलाद, चटनी, अचार न भी हो तो चलता है. थिएटर अभिव्यक्ति का माध्यम है. तो आप जो कहना चाहते हैं वो पहले कहें. बाकी की सजावट तब हो जाएगी जब आपके पास रिसोर्सेज होंगे. इस थिएटर में देखने वाले और परफॉर्म करने वाले इतने करीब होते हैं कि दोनों के बीच एक रागात्मक संबंध पैदा हो जाता है. और इसके थ्रू हमने बहुत सारे कवियों और कहानीकारों को तैयार किया. और धीरे-धीरे ये थिएटर मोबाइल हो गया. अलग अलग शहरों में जाने लगा.5. कीमोथेरेपी से बाल चले जाते हैं. मैं भी बाल कटवाने जाती हूं तो वो लोग पूछते हैं कि बाल क्यों कटवा रही हो. एक लंबे समय से ऐसा माना जाता है कि घने लंबे बाल ही औरत को पूरा करते हैं. उसकी सुंदरता का पर्याय हैं. इस पर आपकी क्या राय है?
मैं ये मानकर चलती हूं कि औरतों की सुंदरता को एक भोगवादी नजरिये से एस्टैबलिश किया गया है. इसे किसी औरत ने नहीं बनाया. इसे एक पुरुष सोच ने बनाया और औरतों की सोच को उसी तरह ढाल दिया. पुरुष ने औरतों को सिखाया कि मेरी आंख से देखो. अगर तुम मुझे सुंदर लगती हो तो सुंदर हो. साड़ी पहनना या छोटी बिंदी लगाना अगर मुझे देखने में सुंदर लगता है, तो इसी में तुम्हारी सुंदरता है. हमारे यहां लड़कियां इंटरव्यू देने जाती हैं तो पढ़ाई पर ध्यान नहीं देतीं. इस बात पर देती हैं कि मैं कैसी लग रही हूं. कितनी गोरी दिख रही हूं. मुझे तो समझ में नहीं आता ऐसी कौन सी कंपनी है जो लड़कियों का गोरापन देखकर उनको नौकरी दे देती है. हम सब इस उपभोक्तावाद की गिरफ्त में हैं, जिसने ये मानक तय कर दिए हैं. इसी को मार्केट भुना रहा है. कीमो से जब मेरे बाल जाने लगे, पहले तो खोपड़ी में सर्दी लगती थी इसलिए बाल कवर करती रही. बाद में मैंने कहा जैसी हूं, वैसी ही रहूंगी. उसी तरह गंजे सर के साथ हर जगह गई. खूब सजती थी. लिपस्टिक, बिंदी, वो सबकुछ जो मुझे अच्छा लगता है.चूंकि हम ब्रेस्ट कैंसर की बात कर रहे थे, ये मान लिया जाता है कि औरत का सबसे प्यारा अंग ब्रेस्ट है. वो चले गए तो औरत कैसे रहेगी. ये भी एक भोगवादी नजरिया है. औरतों को एक मादा के रूप में देखने का नजरिया है. मैं ऐसे लोगों से एक सवाल पूछती हूं. आपके शरीर में 5 अंग हैं, हाथ हैं, पैर हैं, आंख हैं, नाक है, और ब्रेस्ट हैं. अगर किसी एक को गंवाकर आपकी जान बच सकती है, तो आप इनमें से किसको खोना मंजूर करेंगे? लोग झट से कहते हैं ब्रेस्ट. क्योंकि बाकी अंगों के मुकाबले इसकी उपयोगिता नहीं है. इसलिए ब्रेस्ट के जाने पर दुखी होने का कोई मतलब नहीं है.
6. मैंने आपके आर्टिकल्स से जाना कि आपके पति अजय जी ने आपका खूब साथ दिया. दूसरे पुरुषों को उनसे क्या सीखना चाहिए?
एक परिवार में कैसे रहते हैं, किस तरह परिवार की केयर करते हैं, ये उनसे सीखना चाहिए. मैं लकी हूं वो मेरे पति हैं. एक परिवार के तौर पर हम चारों- मैं, मेरी दो बेटियां और मेरे पति, सबकी अलग आइडेंटिटी है. किसी की पहचान किसी और के नाम से नहीं होती. हर पुरुष ये सीखे कि औरत उनकी पत्नी होने के पहले एक स्वतंत्र इंसान है.वीडियो:
https://www.youtube.com/watch?v=yiP1aZxXF5A
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