'दी लल्लनटॉप' में इन दिनों हमारे नए साथी हैं सावज राज सिंह. वे हमारे साथ इंटर्नशिप कर रहे हैं. सावज भारत के पश्चिमी अंतिम सिरे, 'कच्छ का रण' से आते हैं और ढाई महीने पहले ही राजधानी आये हैं. वे इस शहर को अपनी नई नज़रों से निरख रहे हैं. हमने फ़ौरन उनसे जानना चाहा, देश की सुदूर सीमा से आने वाला एक नौजवान इस फ्लाईओवरों और मेट्रो वाले शहर में क्या नया देखता है, क्या नया पाता है. क्या पता, उनकी नज़रों से देखें तो हम शहरी बाशिंदों को भी इस पहचाने शहर की गलियों, बाजारों में छिपे किसी नए शहर का पता मिल जाए.
29 फरवरी की रात अपने जन्मदिन के दिन जब सिंधु-अरब सागर तट से यमुना तट आ गया तब लगा जैसे किसी भयानक, डरावने कब्रिस्तान में आ गया हूं. डरावनी भीड़, वाहनों का भयंकर शोर, जल्दी-जल्दी आसपास से गुपचुप गुजरते भावनाहीन चेहरे, चमचमाती सड़कें और तारों की तरह टिमटिमाती इमारतें. कोई परिचित चेहरा नहीं और न किसी चेहरे पर स्नेह भरा स्मित. जैसे किसी कब्रिस्तान में सारी प्रेतात्माएं जाग गईं हैं और भटक रही हैं चौतरफा. इतना सारा कोलाहल होते हुए भी हर दिल में एक अजीब सा सन्नाटा पसरा हुआ था. पारिवारिक वैचारिक मतभेद और मानसिक तनाव के चलते दिल्ली आया था तो सोचा था कि वहां रहकर कुछ काम कर लूंगा और साथ साथ मुख्यधारा के हिंदी साहित्य एवं कला को नजदीक से जान-समझ पाउंगा. पर यहां आते ही एकदम से दिल्ली शहर ने डरा दिया! पहली बार की ही मुलाकात में इस शहर ने अपने मिजाज़ के अनुरूप साफ-साफ धौंस जमाई मुझ अजनबी पर. मैं शुरू में तो अंदर से डरा हुआ था पर दिखावा इस तरह कर रहा था कि इस शहर को नाप कर छोडूंगा. इस आवारा, अकड़ू शहर को मुझे सहज तरीके से स्वीकार न करना और मुझसे भिड़ जाना मंहगा पड़ेगा. मैंने मन ही मन हुंकार भरी कि सांई मुझ सा अड़ियल ना देखा होगा कोई दूसरा. शुरुआत में तो रोड क्रॉस करने में दिक्कत, मेट्रो में सफर करने में दिक्कत, यहां के खाने से दिक्कत. फिर धीरे-धीरे डर निकलता गया और मैं शहर का अभ्यस्त होता गया. शायद दिल्ली शहर का भी अब अकडूपन छूट रहा था. शहर ने अब स्वीकार कर लिया था कि यह जिद्दी बच्चा यहां से जाने वाला नहीं है, और वो धीरे-धीरे मेरे लिए दिल के दरवाजे खोल रहा था. हां, खाने से अब भी कुछ दिक्कतें थीं. यहां का मसालेदार खाना हजम नहीं होता. और एक डर बना रहता कि बाहर गया और पेट में इमरजेंसी दबाव आया तो शरीर महोदय की पूरी सरकार हिल जायेगी और बेज्ज़ती होगी सो अलग! एक और मुश्किल थी. दिशाएं. पता ही नहीं चल पाता था कौन सी दिशा पूर्व या पश्चिम है, कौन सी उत्तर और दक्षिण. किसी से रास्ता पूछता और वो बताता पूर्व में, मैं पश्चिम की ओर चल देता. पर धीरे-धीरे अब सब सामान्य हो रहा है. मैं महानगरीय तहज़ीब और तमीज सीख रहा हूँ और एक दिन 'सो कूल' वाला शहरीपन भी आ ही जायेगा. मैं कभी स्कूल, कॉलेज नहीं गया था तो शैक्षणिक संस्थान और सिस्टम देखने के लिए बड़ी उत्सुकता थी. दिल्ली यूनिवर्सिटी मेरे रहने के स्थान के काफी पास है तो अक्सर वहां जाना होता रहा है. इन सबको देख समझकर व्यक्तिगत रूप से मैं मानता हूं कि दिल्ली यूनिवर्सिटी में फैशन है, जबकि जेएनयू पैशन है. दिल्ली यूनिवर्सिटी से आप आकर्षित हो सकते हैं जबकि जेएनयू आप पर गहरा असर छोड़ता है. समूचे शैक्षणिक संदर्भ में मुझे गुजरात से दिल्ली मीलों आगे दिख रहा है. पहले पहल प्रसिद्ध स्थापत्य, कला वाली जगहें घूमा. विविध संग्रहालय घूमे, बाग-बगीचे देखे और ग्राहकों से भरे बाजार देखे. पर कमबख्त गंवई दिल जा अटका स्लम क्षेत्रों पर और मन जा भटका जीबी रोड के वेश्यालयों में. 'मजनू का टिल्ला' की संकरी, बदबूदार गलियों में गूंजती खूबसूरत स्त्रियों की तीखी-खट्टी गालियाँ जैसे किसी आम्रवाटिका में कोकिल का टहुकना हो जो आमों में मिठास भर देता हो. पहाड़गंज में मजदूर का शराब पीकर, टुन्न होकर सारी दुनिया का सुल्तान बना फिरना हो. मंदिर, मस्जिद से ज्यादा पवित्र जीबी रोड की किसी वेश्या से स्नेहिल प्रसाद पाना हो. हालांकि जीबी रोड जाने में शुरुआत में डर लगता था. वहां के बारे में कुछ सुन रखा था तो कहीं न कहीं मगज में एक पूर्वाग्रह भी था. पर कुछ दिनों बाद मैं उनसे सहज हो गया और वो मुझसे. वहां की हर एक गणिका की एक कहानी है और हर कहानी हमारे समाज के खिलाफ एक आरोपपत्र है. अक्सर दिल्ली दुनिया को जनपथ, राजपथ या कनॉट प्लेस, हौज़ खास वाली अपनी देह ही दिखाती है. लेकिन उसका दिल तो इन्हीं स्लम क्षेत्रों में धड़कता है. और अब तो कमबख्त दिल्ली से दिल्लगी सी हो गई है.


















