उन्होंने इस प्रस्ताव की वजह बताते हुए कहा, 'संविधान सभा की बहसों के दौरान बाबा साहब आंबेडकर ने सोशलिस्ट शब्द का विरोध किया था. पूरी संविधान सभा सहमत थी इसलिए इस शब्द के इस्तेमाल की ज़रूरत नहीं थी. इमरजेंसी के दौरान राजनीतिक फायदे के लिए इसे प्रस्तावना में जोड़ा गया. तत्कालीन सोवियत यूनियन के दबाव में और लोगों का ध्यान भटकाने के लिए.'

राकेश सिन्हा ने कहा कि हम संरक्षणवाद के लिए 1950 और 60 के दशक की चीजों को नहीं फॉलो कर सकते. फोटो: India Today
समाजवाद माने सबकी भागीदारी
जो सोशलिज़्म या समाजवाद को मानता है, वो सोशलिस्ट या समाजवादी होता है. समाजवाद शब्द की जड़ें लैटिन शब्द Sociare में हैं, जिसका मतलब होता है साझा करना. रोमन में इसके लिए और टेक्निकल शब्द है- Societas. समाजवाद का मतलब भी इसी के इर्द-गिर्द है. ये एक आर्थिक-सामाजिक फिलॉसफी है जो समाज में सभी लोगों की बराबरी की बात करती है. संसाधनों पर बराबर हक. संसाधन पर कुछ ही लोगों का कब्जा ना हो. सबकी भागीदारी हो. यही समाजवाद का मूल विचार है. सोशलिज़्म शब्द उछाला गया हेनरी डी सेंट-साइमन की तरफ से. यूटोपियन सोशलिज़्म के फाउंडर्स में से एक. ये शब्द Individualism या व्यक्तिवाद को काउंटर करने के लिए दिया गया.

रैडिकल सोशलिज़्म में पूंजीवाद के ख़िलाफ हिंसक लड़ाई की बात की जाती है. सांकेतिक फोटो.
अलग-अलग तरीके के समाजवाद
समाजवाद कई तरीके का होता है. कम्युनिज़्म या साम्यवाद भी समाजवाद का ही एक रूप है लेकिन थोड़ा उग्र. दोनों आर्थिक आधार पर क्लास खत्म करने की बात करते हैं. पूंजीवाद के ख़िलाफ़ दोनों ही हैं. लेकिन कम्युनिज़्म हिंसक क्रांति का समर्थन करता है. समाजवाद हिंसा का समर्थन नहीं करता है. भारत में डेमोक्रेटिक सोशलिज़्म या लोकतांत्रिक समाजवाद है. यहां समाजवादियों का उद्देश्य रहा है कि लोकतंत्र में भागीदारी करते हुए सरकार की नीतियों को समाजवादी तरीके से सबके लिए लागू कराया जाए. विनोबा भावे, जयप्रकाश नारायण, राममनोहर लोहिया भारत में समाजवादी रहे हैं. इसके अलावा फेबियन समाजवाद, गिल्ड समाजवाद, सिंडिक समाजवाद भी होते हैं.

महात्मा गांधी (बाएं) के साथ विनोबा भावे (दाएं)
भारत के संविधान में 'सोशलिस्ट' शब्द
साल 1976. इंदिरा गांधी की सरकार. इसी साल 'सोशलिस्ट' शब्द 42वें संशोधन से संविधान की प्रस्तावना में जोड़ा गया. इसके साथ 'सेक्युलर' शब्द भी जुड़ा. पहले प्रस्तावना में Sovereign Democratic Republic लिखा था. बाद में इसे Sovereign, Socialist Secular Democratic Republic कर दिया गया लेकिन ऐसा नहीं है कि ये शब्द जुड़ने से पहले संविधान सोशलिस्ट और सेक्युलर नहीं था. संविधान सभा में इस शब्द पर खूब बहस भी हुई थी. प्रोफेसर केटी शाह 'सेक्युलर, फेडेरलिस्ट और सोशलिस्ट' जैसे शब्दों को में प्रस्तावना जोड़ने के पैरोकार थे. हालांकि सबकी सहमति इस बात पर थी कि भारत एक सेक्युलर देश होगा. सोशलिस्ट शब्द पर आम राय नहीं थी. इन शब्दों को प्रस्तावना में नहीं रखा गया. आज़ादी के बाद की नीतियों में जवाहरलाल नेहरू की ही परछाईं दिखती थी. 1917 की रूसी क्रांति के बाद नेहरू पर सोशलिस्ट विचारों का प्रभाव था. लेकिन उन्होंने मिक्स्ड इकॉनमी का फॉर्मूला अपनाया था. माने पूरी तरह सरकार का संसाधनों पर नियंत्रण नहीं होगा.

मूल प्रस्तावना में ये शब्द नहीं था.
फिर आईं इंदिरा गांधी
1964 में नेहरू नहीं रहे. उनके बाद प्रधानमंत्री बने लाल बहादुर शास्त्री. 1966 में उनका निधन हो गया. इसके बाद आती हैं नेहरू की बिटिया और तब 'गूंगी गुड़िया' तक कही जाने वाली इंदिरा गांधी. कांग्रेस में पुराने 'चावलों' का दबदबा था. इंदिरा को जगह बनानी था. ऐसे में इंदिरा के समर्थन में आए कई नेता जो समाजवादी थे. इन नेताओं को 'यंग तुर्क' कहा जाता था. एक दस सूत्रीय प्रोग्राम बनाया गया. प्रजा सोशलिस्ट पार्टी (PSP) के अपने साथियों के साथ चंद्रशेखर ने इसे ड्राफ्ट किया. पुरनिहों के आगे इन नए चेहरों की ज़्यादा चलने लगी. इनके ग्रुप को 'जिंजर ग्रुप' कहा जाता था. लेकिन कई रैडिकल समाजवादी भी थे. 1969 से 1976 तक इंदिरा गांधी के कई फैसलों में समाजवाद का असर रहा. हालांकि वो खुले तौर पर समाजवादी नहीं थीं. लेकिन उनके प्रधान सचिव पीएन हक्सर लेफ्टिस्ट थे.

इंदिरा गांधी की सरकार के कई फैसलों में समाजवाद की झलक थी. इसकी आलोचना भी हुई. फोटो: India Today
समाजवादी असर वाले फैसले
तब के कई फैसलों में बैंकों और इंश्योरेंस का राष्ट्रीयकरण, आयात-निर्यात व्यापार का राष्ट्रीयकरण, अनाज को पब्लिक में बांटना, आर्थिक शक्ति के केंद्रीकरण को रोकना, अर्बन इनकम और प्रॉपर्टी पर लगाम, लैंड रिफॉर्म और प्रिवी पर्स जैसी चीजें खत्म करना शामिल है. 26 जून, 1975 को इमरजेंसी लगी. कहा जाता है कि गुस्से को काउंटर करने के लिए इसी दौरान 42वां संविधान संशोधन हुआ. इसमें 'सोशलिस्ट' और 'सेक्युलर' शब्द जोड़े गए. इसे बहुत से लोग इंदिरा का राजनीतिक खेल भी बताते हैं और तुष्टिकरण कहते हैं. उनके कई फैसलों में भी सोशलिज्म की झलक दिखी. जबकि वो नेहरू की तरह सोशलिस्ट नहीं थीं. हालांकि इन सबका बहुत फायदा नहीं हुआ. ग्रोथ रुक गई. इसके बाद ग्लोबलाइजेशन का दौर आया और समाजवाद हांफने लगा.
'सबका साथ-सबका विकास'
प्रधानमंत्री मोदी की ही पार्टी के सांसद आज भले 'सोशलिस्ट' शब्द को हटाने की मांग कर रहे हों लेकिन पीएम मोदी 'सबका साथ-सबका विकास' की बात कहते हैं. बहुत सी चीजें आपके इर्द-गिर्द होती हैं, जो डेमोक्रेटिक सोशलिज्म का ही हिस्सा हैं लेकिन सीधे तौर पर इस शब्द का इस्तेमाल नहीं होता. एक वेलफेयर स्टेट में सरकार को ऐसी योजनाएं चलानी होती हैं, जिसका लाभ अंतिम आदमी तक पहुंचे. जिसे महात्मा गांधी सर्वोदय कहते थे. जैसे- पेंशन देना, राशन देना, मुफ्त इलाज इस तरह की योजनाएं तो होती ही हैं. 'सबका साथ, सबका विकास' का निचोड़ यही है.
बाल ठाकरे और इंदिरा गांधी के समय शिवसेना और कांग्रेस की दोस्ती के ये किस्से आपने नहीं सुने हो
























