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'ससुराल वाले बर्तन धुलवाएंगे तो संतोषी मां बचाने आएंगी'

तब हम छोटे थे, जब पहली बार 'जय संतोषी मां' फिलिम देखी थी. सत्यवती के दुख में शामिल हो गए थे.

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फोटो - thelallantop
इस महीने हमने 'साड्डा सिनेमा डे' मनाया है. 1913 में 3 मई के दिन ही भारतीय सिनेमा की पहली फिल्म 'राजा हरिश्चंद्र' रिलीज हुई थी. हमने अपनी जिंदगी के फिल्मी किस्से आपसे शेयर किए थे. एक किस्सा आकांक्षा का था, जो छूट गया था. वो आज पढ़ लो.
फिल्मी किस्सों का जो ये कॉलम आप पढ़ रहे हैं, हम सोचते थे कि ये बघारना टीम के सीनियर लोग का काम है. लेकिन इस नए नवेले कॉलम के बारे में सरपंच ने हमसे भी पूछ दिया. और हम हो गए लुल. कौन सा किस्सा? कैसा किस्सा? फिर क्या, सरपंच जी ने मेरे सामने दोनों हाथ जोड़ लिए औऱ बोले, ‘जय संतोषी मां’. भरी मीटिंग में सब हम पर हंस रहे थे और हमारा क्या हालत हो गई थी ‘जय संतोषी मां’ फिल्म की सत्यवती जैसी. मन में मंदिर का घंटा बज रहा था. वही पिक्चर जो 1975 में आई थी और खूब चली थी. जिसने भी उसे देखा था, संतोषी मां का भक्त बन गया था. लो बजट की फिल्म थी. कहानी देखकर कोई डिस्ट्रीब्यूटर नहीं मिल रहा था फिल्म को. लेकिन जब सिनेमा हॉल में लगी तो कई दिन तक लगी ही रह गई. लोगों ने कई बार सिनेमा हॉल में जाकर देखी थी फिल्म. पिक्चर देखने क्या, साक्षात संतोषी मां के दर्शन करने जाते थे. संतोषी मां सत्यवती पर कृपा करती थीं इधर लोग हॉल में बैठे-बैठे ही मन्नतें मांगने लगते थे. हम नहीं थे उन्नीस सौ पचहत्तर  में. हमारी मम्मी ने बताया है हमको. बाद में फिल्म भी दिखाई और कई बार हमने खुद से भी देखी. और हम पर भी इस पिक्चर के बड़े एहसान हैं. न आती ये फिल्म, न हमारी मम्मी संतोषी मां की भक्त बनतीं औऱ न हमारे जब-तब अस्पताल पहुंचने पर संतोषी मां से चमत्कार करने की मन्नतें मांगकर हमको ठीक करतीं. हमने जब पहली बार ये फिल्म देखी थी, दस-बारह साल के होंगे. शायद और छोटे. बड़ा बुरा लगा था सत्यवती की हालत देखकर. कित्ती बुरी थीं उसकी जेठानियां. ऊपर से पति भी छोड़ के चला गया था. फटे कपड़े पहनती थी. खाने को भी नहीं मिलता था. और एक सीन में जब सत्यवती नारियल के खोखे में पानी के लिए गिड़गिड़ाती है, हमारा तो गला भर आया था. जब दूसरी बार फिल्म देख रहे थे तब तो बेचैन हो गए थे सत्यवती को बताने के लिए कि प्रसाद में खट्टा है. अरे! मत बांटो. अभी सब बेहोश हो जाएंगे. हमें क्या पता था कि फिल्म की शूटिंग होती है. स्क्रिप्ट लिखी जाती है, फिर स्क्रीनप्ले लिखा जाता. शेड्यूल बनता है, कॉस्ट्यूम डिजाइन होते हैं. शूटिंग के बाद पोस्ट प्रोडक्शन होता है जिसमें सब नकली- नकली चीजें जोड़ी जाती हैं. हम तो यही जान रहे थे कि बेचारी सत्यवती है, जिसकी जिंदगी में इतना दुख है. और संतोषी मां उसकी रक्षा करने आतीं हैं. संतोषी मां अपने सब भक्तों की रक्षा करती हैं. हमारी भी करेंगी. अगर ससुराल वाले हमसे बरतन धुलवाएंगे तो यही बूढ़ी औरत बनकर आएंगी संतोषी मां. बड़े ध्यान से इस बूढ़ी औरत को देखते थे, ताकि शादी होने तक याद रहे उनका चेहरा. इसी भेष में आएंगी संतोषी मां हमें बचाने के लिए. हम नहीं पहचान पाए तो? Cinema Banner फिल्मी किस्से: LOC कारगिल देखने गए थे, साइकिल देख आए फ़िल्मी किस्से: गोविंदा नौटंकी था, गोविंदा गांव था

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