चूड़ा-नून खाकर इतना बड़ा कलेजा: पाबो देवी अपना झोला दिखाते-दिखाते एकाएक शरमा गईं. कुछ सूझा नहीं, तो सिर का पल्लू होठों में दबाकर हंसने लगीं. उन्हें अपने 'नेता' का संदेसा मिला था. खबर आई थी. दिल्ली आना है. आंदोलन में पहुंचना है. क्यों? अपना हक मांगने. कौन सा हक? जोतने को जमीन और झोपड़ी बांधने के लिए कुछ गज भर की जगह. और क्या? रोज़गार. ताकि घर के बच्चों को 25-50 रुपये की दिहाड़ी पर दूसरों के खेत में खुरपी न चलानी पड़े. माछ-कांकुड़ खाकर दिन न गुजारना पड़े. बस इतनी सी उम्मीद लेकर तीन दिन पहले पाबो देवी पोटली बगल में दबाए दिल्ली आने के लिए निकली थीं.

विशेष संसद सत्र के साथ-साथ इन मांगों को लेकर दिल्ली आए थे किसान.
...वरना घर पहुंचकर ही रोटी खाएंगे: बिहार के दरभंगा जिला में है पाबो देवी का गांव. उनके और पड़ोसी गांव को मिलाकर कुल 20 लोग दिल्ली आने के लिए निकले. 15 मर्द, पांच औरतें. सबके सब खेतिहर मजदूर. सबके पास अपनी पोटलियां. सबकी पोटलियां में ओढ़ने को शॉल और खाने को चूड़ा, नमक, मिर्च और प्याज. दरभंगा स्टेशन से बिहार संपर्क क्रांति की जनरल बोगी में ठुंसकर ये लोग दिल्ली पहुंचे. पाबो देवी के साथ आई एक महिला अपनी ऐड़ी की तरफ इशारा करके कहती हैं- ठारे ठारे आए, गोर दुख गया. मतलब, खड़े-खड़े आए तो पांव दुख गया. उनकी बातें सुनते वक्त मैं सोचती हूं. एक किसान आंदोलन से इतनी उम्मीदें? ये इतनी उम्मीदें लेकर आई हैं. जाएंगी, तो साथ क्या ले जाएंगी? वही शॉल. वही चूड़ा, नमक, मिर्च और प्याज. जैसे आते वक्त पूरे रास्ते यही खाती आईं, वैसे ही जाते वक्त भी यही खाकर पेट भरेंगी. अगर ये सब तब तक बचा रहा तो. वरना? वरना क्या, घर पहुंचकर ही रोटी खाएंगे.
क्या है जो इन अलग-अलग लोगों को जोड़ता है? 30 नवंबर को संसद मार्ग पर इस ग्रुप से मुलाकात हुई. ये सब दिल्ली में हुए किसान मार्च में शामिल हुए थे. देशभर के करीब 208 किसान संगठनों ने इस आंदोलन में शिरकत की. कुछ बेहद छोटे-छोटे संगठन, कुछ बहुत बड़े. किसान नेता स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशें लागू किए जाने की मांग कर रहे हैं. सरकार से कह रहे हैं कि 21 दिनों का विशेष संसद सत्र बुलाओ. जिसमें सिर्फ किसानों से जुड़े मुद्दों पर बात हो. 29 नवंबर को दिल्ली के ही रामलीला मैदान में जमा हुए सब लोग. अलग-अलग रंगों के झंडों के नीचे. अलग-अलग पार्टियों के. कुछ बिना पार्टी वाले भी. अलग-अलग राज्यों के. अलग-अलग जातियों के. अलग-अलग विचारधाराओं के. कोई खेतिहार मजदूर है. आपको पीली टोपियों वाले सिर भी दिखते हैं और सफेद मुसलमानी टोपी वाले सिर भी. सौ तरह के अलग-अलग नारे. किसी की शिकायत ये कि सरकार जबरन उनकी जमीन ले रही है. बिना सही मुआवजा दिए.

किसान अलग-अलग टोलियों में भले नज़र आए. लेकिन उनका मकसद एक था.
जिससे गुस्सा हैं, उसी से उम्मीद लगाए हैं: आपको यहां आकर पता लगता है. कि भारत में बस जाति-धर्म-भाषा की विविधता नहीं. संघर्षों और सपनों में भी बहुत वैरायटी है. किसी को खाने में पूड़ी मिली. किसी को नहीं मिली. फिर भी ये सब एक के पीछे एक पांत बांधकर पैदल-पैदल रामलीला मैदान से संसद मार्ग पहुंचे. पूरे अनुशासन में. सेंटर ने दिल्ली पुलिस को मुस्तैद किया हुआ था. जरूरत पड़े, तो आंसू गैस छोड़ने की भी पूरी तैयारी थी. जगह-जगह वॉटर कैनन तैयार थे. मगर इन किसानों-मजदूरों ने सत्ता को जोर दिखाने का मौका ही नहीं दिया. लोकतंत्र की खूबसूरती देखिए. सरकार के खिलाफ नारे लगाने वाले लोग संसद घेरने आए हैं. वो नाराज भी हैं सरकार से और उम्मीद भी उसी सरकार से कर रहे हैं. वो कह रहे हैं कि सरकारों ने उन्हें ठगा है. उनके लिए कुछ नहीं किया है. फिर भी वो उसी सिस्टम से आगे बढ़कर अपनी मांगों को संसद में पहुंचाना चाहते हैं.

सरकार ने पुलिस को चौकस किया हुआ था.
वन्स अ नेता, ऑलवेज़ अ नेता: संसद मार्ग पर आंदोलन का मंच लगा था. हमें कई सारे नेता दिखे यहां भाषण देते. फार्रुख अब्दुल्ला राम जन्मभूमि पर बोलते सुनाई दिए. जो कहा, उसका मतलब था कि राम मुसलमानों के लिए भी महापुरुष हैं. राहुल गांधी भी बोले. शरद यादव भी बोले. बोले तो अरविंद केजरीवाल भी. साफ था, विपक्ष आंदोलन के साथ जुड़कर 2019 के चुनाव की तैयारी कर रहा है. किसान नेता फूलकर कुप्पा होते भी दिखे. दिल्ली=सत्ता. उन्होंने सत्ता को दिखा दिया था कि उनके पीछे कितने लोग हैं. लोकतंत्र में अब जनबल के सिवा बचा ही क्या है?
किसान थे, बहुरुपिया नहीं जो भेष बदलकर आए हों: मगर इस पॉलिटिक्स से इतर 30 नवंबर को रामलीला मैदान से संसद मार्ग के बीच जो किसान-मजदूर जमा हुए थे, वो बहुत ईमानदार थे. जरूरतमंद थे. वो सच में बहुत मजबूर होकर अपने गांव-खेतों से निकलकर दिल्ली पहुंचे थे. वो नकली नहीं थे. न ही बहुरुपिया थे, जो बाकी दिनों में कुछ और हो जाते हों. हां, उनसे मिलने पहुंचे लोग जरूर नकली हो सकते हैं. उन दो पत्रकारों की तरह, जिन्हें मैंने सुबह रामलीला मैदान में देखा था. एक कोने पर ट्राइपॉड लगाए खड़े थे. उनमें से एक साथ एक बुजुर्ग को पकड़ लाया था. जिनकी कमर पर अगर वो बित्ते-दो बित्ते का गमछा नहीं होता, तो वो नंगे समझ लिए जाते. दोनों पत्रकारों ने उनके कंधे पर एक हरा गमछे जैसा कपड़ा रखा और उनकी तस्वीरें खींचने लगे. जैसे कभी डैनी बॉइल ने 'स्लमडॉग मिलिनेयर' में पखाना दिखाकर 'ये मारा' महसूस किया होगा, वैसा ही कुछ वो महसूस कर रहे थे. शायद उस फुटेज के लिए पीछे दफ्तर में उन्हें शाबाशी भी मिल जाए.

देशभर से आए किसान एक-दूसरे की भाषा भले न समझते हों लेकिन परेशानियां ज़रूर समझते हैं.
दिल्ली से चलती है योजना, बीच में कहीं खो जाती है क्या? संसद मार्ग पर एक कोने में पालघर से आए किसान गोल घेरा बनाकर बैठे थे. कुछ गा-बजा रहे थे. थोड़ी दूर पर यवतमाल के किसान थे. मुझे बिहार के सुपौल से आई महिलाओं का झुंड भी मिला. वो बता रही थीं. नहर के किनारे झोपड़ी बनाकर रह रहे हैं. भूमिहीन हैं, हमको घर बनाने के लिए जमीन चाहिए. वो जो एक चीज है 'प्रधानमंत्री आवास योजना', वो दिल्ली से निकलकर सुपौल के उस गांव तक क्यों नहीं पहुंची? कहां अटक गई? महिलाएं कह रही थीं- हमको शौचालय चाहिए. मैंने सोचा, हमको तो बताया गया है कि गांवों को खुले में शौच जाना बहुत पसंद है. मुझे एकाएक याद आया. सुबह रामलीला मैदान में उस खुले टेंट के अंदर एक जगह कई साड़ियां सूखती दिखी थीं. जैसे किसी ने नहाकर कपड़े सूखने के लिए फैलाए हों. क्या उसके पास एक एक्सट्रा जोड़ी साड़ी नहीं थी? या एक ही अच्छी साड़ी थी. जिसे पहनकर वो गांव से चली. और उसे ही पहनकर संसद पर पहुंचना चाहती है.

शायद महिलाओं के पास अच्छी साड़ी की एक ही जोड़ी थी.
लाल परी और उसकी जादुई छड़ी: ओडिशा से आई वो महिला उड़िया में जाने क्या कह रही थी, मुझे समझ नहीं आया. लेकिन भाषा से परे इंसानी हाव-भाव की भी तो एक बोली है. उसके साथ कुछ नाइंसाफी हुई थी शायद. उसी से जुड़ा कुछ कह रही थी वो. मगर किस उम्मीद में वो मुझे अपनी परेशानियां बता रही थी? शायद उसे मुझसे नहीं, मेरी मुट्ठी में बंद माइक से उम्मीद थी. मुझे कर्नाटक से आए किसान भी मिले. वो किसी स्पेशल ट्रेन में भरकर दिल्ली पहुंचे थे. बहुत कान लगाकर मैंने उनका जो नारा समझा, वो शायद ये था- साला मन्ना स्वामीनाथन वरदी जाड़ी माड़ी. मैंने मतलब पूछने की कोशिश की. लेकिन न मुझे कन्नड़ आती है, न उनको हिंदी-अंग्रेजी. हमारी वोकैबलरी में बस एक चीज कॉमन थी- स्वामीनाथन. क्या ये किसी जादू की छड़ी का नाम है? जिससे किसानों की सारी मुश्किलें खत्म हो जाएंगी. मैं उनसे पूछना चाहती थी कि स्वामीनाथन आयोग से वो क्या समझते हैं? मैंने तो आर्टिकल्स में पढ़ा है इसे. बौद्धिकों की भाषा में. उनके मुंह से, उनकी जुबान में इसे सुनकर शायद इस आयोग और उसकी सिफारिशों का एक अलग ही रूप समझ आ जाता मुझे.
कौन बनाता हिंदुस्तान? गाजीपुर से आए कुछ किसान गोल घेरा बनाकर बैठे थे. बोले, रेलवे जमीन छीन रही है. मुआवजा नहीं मिला है कोई. हम भी देखते हैं, कौन हमसे हमारा खेत छीनता है. उनके पीछे की तरफ एक तख्ती थी. लिखा था- कौन बनाता हिंदुस्तान, भारत का मजदूर किसान. इन किसानों ने मुझे एक लाल पर्चा थमाया. इसमें नीचे की तरफ लिखा था- 29 नवंबर की शाम को 'एक शाम किसानों के नाम' सांस्कृतिक कार्यक्रम रामलीला मैदान नई दिल्ली में आयोजित किया जाएगा व 30 नवंबर की सुबह रामलीला मैदान से किसान संसद के लिए कूच करेंगे. सुबह से शाम तक मेरे पास ऐसे कई पर्चे जमा हो गए थे.
आई रे मैया, बिन पानी कैसे जीयेंगे? तेलंगाना से आई औरतें भी मिलीं. मैं उनकी और वो मेरी भाषा से अनजान. अगर इंसान बोल नहीं सकता, तब एक-दूसरे से कैसे बतियाता? एक-दूसरे को कैसे समझता? मुझे लगता है कि मैं समझ गई थी उनको. उम्मीद, शिकायत. कुछ तो था, या दोनों थे. संगरूर से आए कुछ बुजुर्ग किसान भी मिले. मैं पंजाब के किसानों की मुश्किल जानती हूं. उनके यहां खेती ऐसे ही हो रही है, जैसे 'लाइफ सपोर्ट सिस्टम' पर रखा मरीज. मशीन हटाओ, तो मरीज मर जाएगा. हरित क्रांत के जमाने में जितनी फसल के लिए आधा किलो फर्टिलाइजर लगता था, आज 18 किलो लगता है. जानकार कहते हैं, 30-40 साल से भी कम वक्त में पंजाब की जमीन सूख जाएगी. पानी खत्म हो जाएगा? तब क्या भविष्य होगा? तब उगानेवाले क्या उगाएंगे और खाने वाले क्या खाएंगे?

वो जो दिल्ली का मशहूर दिल है, वो कहां गया? जहां ये किसान बैठे थे, उससे कुछ ही दूर पर कनॉट प्लेस आबाद था. जगमगाता-दमकता. चमकती दुकानें खुली थीं. बगल के दफ्तरों में काम करनेवाले लंच करके ऑफिस से बाहर आए थे. शायद टहलने. खाकर टहलना सेहत के लिए अच्छा होता है. जैसे मुंबई-नासिक किसान मार्च में मुंबईकर बाहर निकले थे, वैसा दिल्ली में नहीं हुआ. यहां किसानों को रोटी-बिस्कुट खिलाने आए बहुत कम लोग दिखे. शायद सरकार जितनी ठंडी है, उतने ही ठंडे दिलवाले हैं दिल्ली के लोग. जब संसद के अंदर सत्र के सत्र खाली धुल जाते हैं, ये तो तब भी बाहर नहीं आते. सरकार तो कोई भी हो, ठंडी ही होती है. विपक्ष में बैठकर वही लोग गरीब प्रेमी, किसान-मजदूर समर्थक हो जाते हैं.
मैं खबर लिख रही हूं, वो ट्रेन में चूड़ा-नून सानकर खा रही होंगी: किसानों के इस जमावड़े से फिलवक्त तो उनकी कोई उम्मीद पूरी नहीं हुई. इस आंदोलन का हासिल बस उनकी एकजुटता में दिख रहा है. पत्रकारिता सिखाती है, निष्पक्ष रहो. तटस्थ रहो. मगर आज मैं तटस्थ नहीं रह पा रही हूं. भावुक हो रही हूं. मैं चाहती हूं कि सारा देश भावुक हो जाए. क्योंकि पिज्जा खाए कि रोटी, गेहूं तो हर कोई खाता है. खाने वाला उपजानेवालों और खेतों में मजदूरी करनेवालों के दर्द से सर्द क्यों रहे? मैं चाहती हूं किसानों-मजदूरों को अनदेखा करने वाली सरकार गिर जाए. ताकि आगे आने वाली सारी सरकारें डरी रहें. मुझे उन औरतों का चूड़ा-नून याद आ रहा है. मैं सोच रही हूं. जब तक ऐसी औरतें और ऐसे आदमी हैं, कोई सरकार निडर होना अफॉर्ड नहीं कर सकती.
जो अनदेखा करेंगे, फिसल जाएंगे: शाम के वक्त कारवां उठ गया. मैं दरभंगा से आई औरतों से बात कर रही थी. बगल में एक सफाई कर्मचारी मोटी सींक वाली झाड़ू से कूड़ा बटोर रहा था. धूल उड़कर हम तक आ रही थी. कोई और वक्त होता, तो मैं सोचती. सुबह शैम्पू किया है, बाल गंदे हो रहे हैं. मगर उस वक्त मैं ये नहीं सोच पाई. मुझे बाईं तरफ गिरे केले के छिलके दिख रहे थे. शायद कई लोगों ने मिलकर खाया था. छिलके जमीन पर पड़े थे. बिखरे नहीं थे, एक जगह थे. जैसे मुट्ठी होती है. वहां से गुजरने वाला अगर उन्हें अनदेखा करके उनके ऊपर से गुजरे, तो फिसल जाएगा.

सड़क पर बिखरे केले के छिलके.





















